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व्‍यंग्‍य: आखिरी सवाल, आपने कैसा थर्ड क्लास सवाल पूछ लिया जाते-जाते!

आप को मेरे भारतीय होने पर कोई शक है?

व्‍यंग्‍य: आखिरी सवाल, आपने कैसा थर्ड क्लास सवाल पूछ लिया जाते-जाते!

और मेरा अब आपसे आखिरी सवाल, मेरा इंटरव्यू लेते पत्रकार ने हंसकर कहा तो मैंने चैन की इतनी लंबी सांस ली कि उसकी अनुगूंज कन्याकुमारी से कश्मीर तक सुनाई दी। असल में जनता अपने कारण उतनी परेशान नहीं रहती जितनी हम लोगों की वजह से परेशान रहती है। ये पत्रकार लोग भी सत्ता में आते ही इतना परेशान करके रख देते हैं कि मत पूछो! ये हुआ तो क्यों हुआ? और जो ये नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? करें कुछ तो भी मुश्किल और कुछ न करें तो मुश्किल ही मुश्किल! ‘तो मेरा अब आपसे ये आखिरी सवाल है कि आप भारतीय हैं कि नहीं?’ आखिरी सवाल, हम भारतीय हैं कि नहीं?

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सुनकर कुछ देर के लिए तो मेरे शरीर में मेरी रूह न होने के बाद भी रूह तक कांप उठी। अरे, मैंने सबकुछ सोचा पर ये तो आज तक सोचा ही नहीं कि मैं भारतीय हूं कि नहीं? और अगर मैं भारतीय हूं तो क्यों हूं? और जो मैं भारतीय नहीं हूं तो क्यों नहीं हूं? शुक्र धंधे का कि तभी कॉर्मशियल ब्रेक हो गई और मुझे सोचने का तनिक मौका मिल गया। कॉर्मशियल ब्रेक खत्म हुई तो तब तक मैं काफी सहज हो गया। एंकर ने फिर गंभीर होकर पूछा मानो इस देश में मात्र वही एक भारतीय हो और शेष सारे यलोकार्डिए, तो मेरा अब आपसे आखिरी सवाल कि आप भारतीय हैं कि नहीं? और जो आप भारतीय हो तो क्यों हो, और जो आप भारतीय नहीं हो तो क्यों नहीं हो?

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तो मैंने पूरी शिद्दत से अपनी पूंछों पर ताव देते मुस्करा कर, अपने पार्टी अध्यक्ष का स्मरण कर कहा क्यों? आप को मेरे भारतीय होने पर कोई शक है? अरे साहब! ये भी आपने कैसा थर्ड क्लास सवाल पूछ लिया जाते-जाते! मेरा सारा इंटरव्यू गुड़-गोबर कर दिया आपने! पूछना ही था तो पूछते कि क्या हम चोर हैं? हम चोर हैं तो क्यों हैं? और जो चोर नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं? क्या हम भ्रष्ट हैं? भ्रष्ट हैं तो क्यों हैं? जो भ्रष्ट नहीं तो क्यों नहीं हैं? क्या हम बेईमान हैं? हैं, तो क्यों हैं? नहीं हैं, तो क्यों नहीं हैं? क्या हम झूठे हैं? क्या हम चरित्रहीन हैं? चरित्रहीन हैं तो क्यों हैं? चरित्रहीन नहीं तो क्यों नहीं हैं? क्या हम जनता की बोटी-बोटी बेचने की ताकत रखते हैं? रखते हैं तो हममें ऐसा क्या खास है जो हममें ऐसा करने की ऊर्जा बनाए रखता है?

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अरे साहब, अपने देश में हम ही इकलौते भारतीय नहीं, इस देश में तो जो घुसपैठिए दोपहर को अपने कॉलर खड़े किए पधारते हैं, अपनी धरती पर कदम रखते ही विशुद्घ भारतीय हो जाते हैं। इस धरती पर पांव धरते ही वे भूल जाते हैं कि हम ये थे, कि हम वो थे? कि हम ये हैं कि हम..। ‘तो अब चलते-चलते एक छोटा सा सवाल बेसवाल, आपका न्यूनतम साझा प्रोग्राम जनता को उल्लू बनाने का है क्या?’ ‘देखिए साहब!

हम उल्लुओं का एक तो उल्लू नहीं बनाते! उल्लू बनाने का मजा तो तब है जब किसी बुद्घिजीवी की बुद्घि को वाट लगाया जाए, उसे अपने आगे पीछे घुमाया जाए! हमारा न्यूनतम साझा प्रोग्राम ये है कि उन्हें कुर्सी की टांग पकड़ कुर्सी के साथ अपनी फोटो खिंचवानी है और हमें उनके हाथों में कुर्सी की टांग पकड़वा उस पर अकड़ कर बैठ अपनी मटन-बिरयानी चलानी है। कुछ पूछना है और?’ ‘नो सर! हमारे स्टूडियो में आने पर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। तो दर्शकों! ये थे हमारे आज के खास मेहमान!

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