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अभिषेक अवस्थी का व्यंग्य : किसान रैली में पहुंचे माखन का दर्द

चार सौ रुपए प्रति बीघे के हिसाब से जो अकाउंट पेई चेक के नाम पर जो उपहास मिला है, उसकी शिकायत करूंगा।

अभिषेक अवस्थी का व्यंग्य : किसान रैली में पहुंचे माखन का दर्द

मेरा समझदार किंतु भोला किसान मित्र माखन भी पहुंचा था तथाकथित किसान रैली में, माफ कीजिएगा, कहना ठीक होगा कि राजकुमार की रीलॉन्चिंग में। उसने मुझे भी बुलाया था, किंतु हर मध्यमवर्गीय भारतीय की भांति मेरे पास फुरसत न थी। इस देश में प्राइवेट नौकरी करने वाले मिडिल क्लास आदमी के लिए एक अदद रविवारीय छुट्टी किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होती। मेरी किस्मत में ऐसा कोई वरदान नहीं लिखा हुआ है। छुट्टी के दिन बॉस की निजी सर्विस में व्यस्त था, यानी मेरा सनडे फनडे न होकर इसबार भी गम-डे था।

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माखन ने मेरी व्यथा भलीभांति समझी। कहने लगा-मित्र, मन तो मेरा भी नहीं था आने का। इतनी धूप में ट्रेन मे ठुंस-ठूंसा कर आना कोई आसान काम तो है नहीं। मैंने पूछा कि भाई, जब मन नहीं था क्यों आए? वह रुआंसा होकर बोला-क्या करूं! फसल तो चौपट हो गई।खाली-पीली चारपाई में पसरे रहने से अच्छा था कि किसान रैली में शिरकत कर आवें। घरवालों ने भी कहा कि राजकुमार विदेश से तपस्या उर्फ चिंतन उर्फ मंथन करके आए हैं। जब किसान यहां मर रहे थे, अपनी फसल को मरते देख उन्हें हृदयाघात हो रहा था, तो वे किसानों के वास्ते ही तो परदेस में कुछ विपशयना टाइप करने गए होंगे।

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अवश्य ही उन्हें कोई ज्ञान मिला होगा। संभवत: किसानों के लिए कोई हितकारी विदेशी धन टाइप लाए होंगे! यह भी हो सकता है कि पिछले दस वर्षों में जो कमाया हो, वो आज किसानों में लुटा दें। आखिर किसान रैली है। उल्टा सीधा कैसा भी होगा, हल तो हल ही होगा। विदेशी धन सुनते मेरे मुंह से निकला- मतलब कालाधन! वह बोला- न जी न, कालाधन तो दूसरी पार्टी लाने वाली है न! सुना है वो भी दिल्ली के पालम में लैण्ड हुए मगर खाली हाथ ही आए। माखन आगे कहता है-मैंने सोचा था कि बरबाद हुई खेती की कुछ भरपाई होगी।

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चार सौ रुपए प्रति बीघे के हिसाब से जो अकाउंट पेई चेक के नाम पर जो उपहास मिला है, उसकी शिकायत करूंगा। मगर यहां तो मांजरा ही कुछ और निकला। सर्मथकों ने सारा फोकस राजकुमार की रीलॉन्चिंग में ऐसे लगा दिया जैसे नासा का कोई रॉकेट दुरुस्त करके पुन: प्रक्षेपित कर रहे हों। मैंने उत्सुकतावश पूछा कि क्या रॉकेट लॉन्च हुआ? माखन बोला- हां किसी तरह फुस्स-फुस्स करते हो ही गया। इस दफे लॉन्च में तो साइलेन्सर भी शोर मचाकर रीलॉन्चिंग के ढोल पीट रह था। पिछले दस वर्षों की खामोशी टूट गई थी। उसी दौरान गाना भी चला दिया गया-खामोशियां.. एक साज हैं..।

दर्द छुपाए मुस्कुराते माखन से मैंने कहा-प्यारे दोस्त, ये रैली तो भूमि-अधिग्रहण कानून के विरोध में थी। तुम्हारी बरबाद हुई फसल की भरपाई के लिए तो वैसे भी नहीं थी। वह बोला- आशा मुझे भी नहीं थी, लेकिन फिर भी कुछ मिलने की लालसा में चला गया। हर बार की तरह छला गया। रामलीला मैदान में वही सियासतलीला शुरू हो गई। वो खराब हम अच्छे। वो झूठे हैं हम सच्चे हैं। मेरे मन ने तो भैया यही कहा कि सब टुच्चे हैं, एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। किंतु वहां मौजूद बड़े-बड़े पगड़ीधारक किसानों के नारों के समक्ष मेरी आवाज मैदान में घूमते हुए धरातल में अधिग्रहीत कर ली गई।
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