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व्यंग्य : दोस्ती इंतकाम लेती है

मैं फोन उठाने को उन्हें जितना आगे कर रहा था, वे डर के मारे उतना ही पीछे हट रहे थे।

व्यंग्य : दोस्ती इंतकाम लेती है
अशोक गौतम-
कल तक जो मेरे मरे हाथ अपने किसी भी दोस्त का फोन आते ही हाथ का खाना हाथ में तो थाली का खाना थाली में छोड़ देते थे, आज लंबी तान के सोए होने के बाद भी ज्यों ही गांव से अपने बचपन के लंगोटिए दोस्त का फोन आया तो मैं तो डरा ही, पर मेरे हाथ फोन उठाने से मुझसे भी अधिक डरे। मैं फोन उठाने को उन्हें जितना आगे कर रहा था, वे डर के मारे उतना ही पीछे हट रहे थे।
अपने खुदा को हाजिर नाजिर मान कर कहता हूं कि पहले तो मन किया कि उसका फोन ही न उठाऊं, पर बरसों की दोस्ती की मन ने याद दिलाई तो मैंने अपने हाथों को उसका फोन उठाने को कड़ा आदेश दिया तो उन बदतमीजों ने पराए से होने का नाटक करते मेरा मन रखने को फोन उठाया तो दूसरी ओर से गांव के लंगोटिए दोस्त की मानसून के बैरी होने के बाद भी वैसी ही मस्ती भरी आवाज, और बच्चे, क्या हाल हैं? फोन उठाने में देर क्यों कर दी? पहले तो तू फोन की पहली घंटी बजते ही फोन उठा लिया करता था। भाभी, बच्चे कैसे हैं? तेरी सेहत कैसी है? सब ठीक तो है न?
उसने आधी ही सांस में कई सवाल कर डाले तो मैं कल तक उसका फोन पर उछलने वाला आज भीतर तक कांप गया। कुछ देर तक अपने को रिलेक्स करने के बाद मैंने उससे ऐसे कहा, जैसे कोई मेरा गला घोंट रहा हो, ठीक हूं। बोल, कैसे याद किया?
बोलना क्या यार, तुझे तो पता है हम तुझे याद ही तब करते हैं, जब तेरी जरूरत पड़े। शहर में तू ही एक अपना है न पूरे गांव वालों का। असल में बापू कुछ ज्यादा ही बीमार हो गए हैं। यहां के सरकारी अस्पताल के कंपोडर ने कहा है कि इन्हें शहर दिखा लो, वहां बच जाएं तो बच जाएं। गांव में तो अब भले चंगे भी मरने को बेताब हैं। सो सोच रहा हूं कि तुम वहां किसी अपनी पहचान के सरकारी डॉक्टर बापू के लिए बात कर रखते तो..।
पर यार..। पर पुर कुछ नहीं! मैं सुबह आ रहा हूं बस, गांव से कुछ लाना तो नहीं? वह फोन काटने को हुआ तो मैंने उससे मरते हुए से कहा, पर यार असल में बात ये है कि..।
क्या बात हो गई? पहली बार तू उखड़ी-उखड़ी बातें क्यों कर रहा है? शहर में सब तो ठीक है न?
तो मैंने अपनी पूरी जिंदगी की हिम्मत बटोरते कहा, हो दोस्त! सब ठीक तो है पर दोस्ती.., सच कहूं दोस्त, जबसे हाई प्रोफाइल दोस्तों की दोस्ती काम हो जाने के बाद इंतकाम लेने लगी है, लोअर क्लास दोस्त होने के चलते मुझे भी अपने दोस्तों से अपने दुश्मनों से भी अधिक डर लगने लगा है। अब तो दोस्तों को छोड़ दुश्मनों की दुश्मनी पर विश्वास करने के दिन आ गए मेरे दोस्त। कल को हमारे तुम्हारे बीच कुछ ऐसा वैसा हो गया तो गांव के सरपंच को तो तुम जानते ही हो। वह तो वैसे भी हाथ मुंह धोकर हमारे पीछे पड़ा रहता है। दोस्त! मैं तुम्हारे लिए सब कुछ कर सकता हूं पर..। आज से मुझसे सब कुछ करने की उम्मीद रखना पर किसी भी नाते किसी भी प्रकार की सहायता की उम्मीद मत रखना।
उनके पीछे तो पूरी सरकार ढाल बनकर खड़ी है पर मेरे साथ तो तुम जानते ही हो मेरे दोस्त कि ऐन वक्त पर मेरी बीवी भी नहीं होती, दम घुटने के बाद भी मैं उससे और बात करना चाहता था पर पता नहीं कैसे मेरे हाथ की उंगलियों ने बड़ी चालाकी से फोन काटने के बदले दोस्ती का स्विच स्विच ऑफ ही कर दिया।
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