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व्यंग्य : बाढ़ और अफसर

हाथों में कुछ करने की जुंबिश होती है, लेकिन कहीं बाढ़ की आहट नहीं।

व्यंग्य : बाढ़ और अफसर
सुरजीत सिंह
जिस अफसर के पास बाढ़ राहत का जिम्मा हो और उस साल बाढ़ नहीं आए तो अफसर की मन:स्थिति बिन पानी मछली की तरह हो जाती है। वे खुद बाढ़ ग्रस्त हो जाते हैं। पिछले साल अकाल राहत का जिम्मा था, तो बाढ़ आ धमकी। इस साल मौसम विभाग की भविष्यवाणी पर भरोसा कर बाढ़ राहत महकमा हथिया लिया, तो सूखे के हालात बन रहे हैं। हाथों में कुछ करने की जुंबिश होती है, लेकिन कहीं बाढ़ की आहट नहीं।
आखिर वे अफसर हैं, बिना बाढ़, सूखा, भूकम्प, तूफान के कैसे अफसरियाएं! दफ्तर से बाहर दौरों का बहाना नहीं बन पा रहा। कुर्सी पर धंसे हैं और पुराने दिन याद आ रहे हैं, वे कहीं टूटे हुए तटबंध पर खड़े हैं। आंखों के सामने दूर तक पानी ही पानी फैला हुआ, उनकी अनंत भौतिक लिप्साओं की तरह। दूरबीन से बाढ़ को कभी पास लाते हैं, कभी दूर। दृश्य मन में गुदगुदी मचाने वाला है। उन्होंने एक बुलबुले की हलचल को चुल्लू में भरा। वजनदार महसूस हो रहा है।
बाढ़ में भी कितना अलौकिक सौन्दर्य होता है, यह कोई उनसे पूछे। वे भी तरसे काव्यमयी होने लगे। मन में विचार प्रवाह की पहली लहर उठी। उन्हें ध्यान आया, डूबी हुई झोंपड़ियों के जरा-जरा से दिखते सिरों ने कैसे उनके भीतर एक कवि पैदा कर उनके काव्य कौशल को उभार दिया था। उन्होंने जीवन की पहली कविता भी लिखी थी, जलराशि में उत्तंग शिखर पर जैसे तरुणी के बालों का जूड़ा! उससे झरती बूंदें। वाह, वाह, गजब का सौन्दर्यबोध!
वे अधिक देर तक काव्यमयी बने नहीं रह सके। गर्मी से जी हलकान होने लगा। ठण्डा मंगाकर गला तर किया, फिर यादों की गली में निकल लिए। मौसम विभाग को कोसते हुए बीते क्षण याद करने लगे, कैसे जब उन्हें बाढ़ राहत महकमा मिला था, तब पत्नी ने घर पहुंचते ही आरती उतारी। तिलक लगा मनौतियां मांगी, शायद बुरे दिन टल गए।
अब तो हमारे घर में भी बाढ़ का पानी होगा। बहुत दिन रह लिए सूखे से पीड़ित। अजी, अब तो बाढ़ में गहरे डूब कर मुआयना करना। सूखे मत आ जाना और फिर शर्माते हुए हौले से, जरा याद रखना पिछली साल के वादे। जितना हो सके, बाढ़ का पानी घर भी लाना। छत पर बने स्वीमिंग पूल में डालेंगे। सुना है बाढ़ के पानी में बड़ी बरकत होती है। मनीप्लांट तेजी से बढ़ते हैं। इतनी बरकत तो गंगा के पानी से भी अर्थपूर्ण बात होठों तक आकर आंखों से व्यक्त हुई।
ऐसा पानी कभी खत्म नहीं होता। हमेशा यूज करते रहो। रियल, वॉव, कुछ लॉकर में भी रखेंगे। बचा-खुचा नाते-रिश्तेदारों में बांट देंगे। अफसर की आंखों में बाढ़ उतर आई। दिमाग के किनारों से लहरें टकराने लगीं। वादे एक-एक कर याद आने लगे। उफ्! बड़े सताने लगे। मुझे कुछ करना होगा। आखिर जिम्मेदार अफसर हूं। बाढ़ राहत की इतनी बड़ी जिम्मेदारी है, फिर भी कुछ ना कर पाऊं तो लानत है अफसर होने पर। कितने कार्य पेंडिंग पड़े हैं-बेटे को विदेश भेजना है। बिटिया के हाथपीले कर दूंगा।
बाढ़ के पानी से पीलापन गाढ़ा असर छोड़ता है। ऐसा पिछली बाढ़ों में डूब आए अफसर बताते हैं। और हां, फुफेरे, ममेरे, चचेरे, मौसेरे सहित जितने भी ऐरे-गेरे हैं, उन पर भी बाढ़ के छींटे मारने हैं। सबको बुला लूंगा। बाढ़ के पानी में हाथ बंटाएंगे। मौका भी है, दस्तूर भी है और बाढ़ भी है। वे आर्द्रता फील करने लगे। सिगरेट सुलगाई। उष्णता बढ़ी, तो फ्लैश बैक से बाहर निकले, लेकिन सामने तो सब कुछ साफ था। न बाढ़ थी, न कहीं आसार। उनका मुंह सूख गया। शरीर बेजान, जैसे सदियों से कुपोषित हो। वे अतिशय सूखेपन की चपेट में आ गए।
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