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व्यंग्य: बीमार होने का गौरव

श्मशान दूर था और घी नदारद वरना कई लोग तो वहीं अपनी चिता सजा लेते।

व्यंग्य: बीमार होने का गौरव
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मैं दुखी हूं, अमूमन लोग अपनी बीमारी को लेकर दुखी होते हैं, मैं इसलिए दुखी हूं क्योंकि सालों से मुझे जुकाम तक नहीं हुआ। यह मेरे लिये घोर चिंता और निराशा का विषय है। बीमार न होने का भारी मलाल है। ऐसे में जब दो दिन पहले मुझे दो तीन छींक आई तो मेरी बांछें खिल गर्इं, मुझे पूरा यकीन था कि हो न हो मैं बीमार पड़ने वाला हूं।
वह बडे आदमी हैं, उनकी हर बात में बड़प्पन है। स्टेट्स की तरह उनकी बीमारी भी कद्दावर है। परसों वह मेरे सामने अपनी कद्दावर बीमारी की गौरव गाथा बता रहे थे, ‘डॉक्टर खान को तो जानते हैं आप! न्यूरो सर्जरी के मामले में इंटरनेशनल कंसल्टेंट हैं। एक विजिट का ‘दस लाख’ लेते हैं।’ वह बोल रहे थे और मैं दीनता में दबा जा रहा था। दस लाख रुपए खर्च करने का जिक्र वह ऐसे कर रहे थे गोया उनके पैर का जूता चोरी हुआ हो। उनकी बीमारी के सामने मेरा स्वस्थ मनोबल रेत की तरह ढह रहा था। मुझे अपने बीमार न होने पर शर्म आ रही थी।
मैं दुखी हूं, अमूमन लोग अपनी बीमारी को लेकर दुखी होते हैं, मैं इसलिए दुखी हूं क्योंकि सालों से मुझे जुकाम तक नहीं हुआ। यह मेरे लिये घोर चिंता और निराशा का विषय है। बीमार न होने का भारी मलाल है। जिस प्राइवेट फर्म में मैं काम करता हूं-वहां अकसर ‘संडे’ कुंभ के मेले में खो जाता है। लिहाजा छुट्टी के लिए कभी किसी को ‘मलेरिया’ हो जाता है तो किसी का ‘कजिन’ अचानक ‘क्रिटिकल’ होकर आईसीयू पहुंच जाता है। कई लोगों की ‘शुगर’ ने बढ़कर उन्हें ‘राहत’ पहुंचाई है। मैं उनकी समृद्ध बीमारी देखकर कितनी हीन भावना से ग्रस्त हूं।
ऐसे में जब दो दिन पहले मुझे दो तीन छींक आई तो मेरी बांछें खिल गर्इं, मुझे पूरा यकीन था कि हो न हो मैं बीमार पड़ने वाला हूं। मैंने चोधरी के सामने अपनी खुशी जाहिर की, ‘लगता है-सर्दी लग गई! मलेरिया भी हो सकता है।’ ‘दांत मत फाड़ अर ठंड रख। छींकना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है। बीमारी ता भले अर शरीफ आदमी कू लग-जा। कदी ‘फिल्म’ में अमजद खान डैनी, रजा मुराद, अमरीशपुरी अर गुलशन ग्रोबर कू बीमार होते देखा? जानते हो उन्ने बीमारी क्यूं न लगी। क्योंकि बीमारी कदी बीमारी कू नहीं पकड़ती। तमैं बीमारी क्यों लगन्गी, तम तो उन्हीं में से एक हो।’
मैं फिर निराश हो गया। मैं बीमार होना चाहता हूं, पर बीमारी, नेता में नैतिकता की तरह गायब है। कल पड़ोस के कुरैशी साहब अपनी बीमारी के बारे में डींग मार रहे थे, ‘पूरे चेकअप में पचासी हजार रुपए खर्च हुए, दरअसल डॉ. खुराना शहर के नंबर वन कार्डियोलॉजिस्ट हैं। उनकी कंसल्टेंसी फीस इतनी है।’ मेरा कलेजा बैठ गया-इतनी तो मेरी चार महीने की तनख्वाह होती है। डरते डरते पूछा, ‘क्या आपकी किडनी फेल हो रही है?’
‘अरे नहीं, मुझे दरअसल शुगर है। शुगर बढ़ जाए तो किडनी और हार्ट पर अटैक करती है। चेकअप तो जरूरी होता है। पैसे को क्या देखना, पैंसा उन्हें शुगर जैसी बड़ी बीमारी थी, मुझे तो महज दो तीन दयनीय किस्म की छींक आई थी। उनकी बीमारी के सामने मेरी बीमारी इतनी दीनहीन लग रही थी कि मुझे अपने जुकाम के बारे में बताते हुए शर्म आ रही थी। ऐसा लग रहा था गोया मैं चंदा मांगने आया हूं।
बड़ा आदमी ऐसे ही बड़ा नहीं होता, उसकी बीमारी में भी बड़प्पन छुपा होता है। वह अपने नुकसान होने का बयान ऐसे करता है जैसे कुतुबमीनार गिरवी रखकर आया हो, ‘कुंडली उलट गई है-सोना छू लूं तो माटी बन जाए। ‘रीयल स्टेट’ में हाथ लगाया, प्रॉपर्टी के दाम गिर गए। दो करोड़ का लॉस हुआ। अब ट्रांसपोर्ट कंपनी खड़ा करने की सोच रहा हूं।’
वह बोल रहे थे, मेरा दिल डूबा जा रहा था। दो करोड़ का लॉस होने की बात वह ऐसे कर रहे थे गोया सायकल ‘पंचर’ हो गई हो। मैंने अपने आप पर लानत भेजा, आखिर कब बनूंगा मैं बड़ा आदमी। वह दो करोड़ का लॉस उठाकर भी दमक रहा है। यहां माचिस तक जेब से गिरी कि ऐसी मुरदार शक्ल लेकर खड़ा हूं गोया मेरा टाइटेनिक जहाज डूब गया हो।
बडेÞ आदमी की बड़ी बात! वह ड्राइविंग सीट पर बैठे या पिछली सीट पर, उसके रुतबे में फर्क नहीं आता। वह फुटपाथ का पाजामा पहन ले तो पाजामे का गे्रड बढ़ जाता है, और अगर मैं शो रूम का सूट पहन कर निकलूं, तो चौधरी यही कहेगा, ‘फुटपाथ ते उठा कर लाया है के?’
बड़े आदमी की बड़ी बात, उनकी बीमारी से भी बड़प्पन टपकता है। मिठाई और दवा डिस्ट्रीब्युशन का एक साथ कारोबार करने वाले गुप्ता जी उस दिन अपने बाप की स्टैंडर्ड बीमारी के बारे में गुणगान कर रहे थे, ‘पर्किंसन की प्रॉब्लम थी, इंडिया के डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। अब अमेरिका ले जा रहा हूं। पिता जी को ग्राहक के अलावा भीड़ पसंद नहीं, प्लेन चार्टर्ड कराना पडेÞगा। करोड़ों का खर्च है, पार्किंसन के मामले में पैसे का क्या मुंह देखना। दिस इज पार्ट आॅफ लाइफ-यू नो?’ वह बोल रहे थे और मैं बगैर कैलकुलेटर के जोड़ रहा था कि कितना खर्चा होगा। उनकी मंहगी बीमारी के बोझ से मुझमें हीनता आ रही थी।
नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए, पूरा व्यंग्य -
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