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व्यंग्य : टिकट-टिकट-महाविकट

तीन अक्षर का यह शब्द महान अपने अंदर कितना-कितना आंधी-सुनामी और तूफान वगैरह-वगैरह समेटे रहता है।

व्यंग्य : टिकट-टिकट-महाविकट
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सिर्फ एक अदद टिकट पाने की खातिर तन-मन और धन से कुर्बान। बस येन केन प्रकारेण मिल भर जाए यह अनमोल खजाना, फिर तो अपनी खुशकिस्मत सी हो चुकी मुट्ठी में है सारा जमाना। हर तरफ हरियाली ही हरियाली और बहारें चलायमान सी दिखने-प्रतीत होने लग पड़ती हैं, यह तो पक्का मान कर चलिए भाई।
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भाई लागों... एक होता है ‘टिकट’। अब आप चाहे मानो या न मानो, पर इस नाचीज का दिल दीवाना यह मानने को मजबूर हो चला है कि यह होता है बड़ा विकट। तीन अक्षर का यह शब्द महान अपने अंदर कितना-कितना आंधी-सुनामी और तूफान वगैरह-वगैरह समेटे रहता है, यह काबिले-गौर बात हो जाती है। अब यदि इसको थोड़ा और ‘पतला’ करके समझना है तो इस पर निगाह-ए-करम कर लीजिए। भाई लोगों, दावे से अर्ज करता है यह नाचीज कि इस मामले में आपका अहसास लोहा-लाट हो जाएगा। अब टिकट भइया अपने चाहे जिस रूप में हो, खासुल-खास ही होते हैं। फिर चाहे वह एक सुपरहिट फिल्म का खिड़की तोड़, टिकट बुकिंग विंडों से निकला हो या बेशकीमती सी हो चुकी रेल यात्रा के लिए अंधाधुंध रेलम पेल वाली रिजर्वेशन की भीड़ का हो या फिर अति महान शक्ल-ओ-सूरत ले चुके चुनाव लड़ने की हरी झंडी का हो।
सिर्फ एक अदद टिकट पाने की खातिर तन मन व धन से कुर्बान। बस येन केन प्रकारेण मिल भर जाए यह अनमोल खजाना, फिर तो अपनी खुशकिस्मत सी हो चुकी मुट्ठी में है सारा जमाना। हर तरफ हरियाली ही हरियाली और बहारें चलायमान सी दिखने-प्रतीत होने लग पड़ती हैं, यह तो पक्का मान कर चलिए भाई। मिल गया तो वाह-वाह, बल्ले-बल्ले और तमाम अच्छे दिनों का आभास, और अगर नहीं मिला, कट गया, या फिर किसी ‘अतिरिक्त प्रतिभाशाली’ बंदे ने धन, बल वगैरह से विहीन कर दिया, तो गई भैंस पानी में। यानी कि दिल के अरमां बिचारे खालिस आंसुओं में बह गए।
फिर तो बस टिकट-हाय टिकट, आह टिकट-बदमाश टिकट आदि का रोना, छाती कूट-कूट कर दहाड़े मारना, कोसना, गरियाना या आत्महत्या तक कर लेने का शौर्यपूर्ण कार्य भी किया जा सकता है, इस कू्रर जालिम टिकट-विरह में। अब यह टिकट महान भोतिक रूप में चाहे कागज का रंग-बिरंगा छोटा सा एक टुकड़ा हो, या फिर न दिखने वाली एक हरी झंडी के रूप में हो, टिकट ही होता है, शुद्ध खालिस और सोलह आने खरा टिकट।
इसी टिकट दि ग्रेट के लिए न जाने कैसे-कैसे जतन, अजब-गजब तथा विचित्र किंतु सत्य सरीखे स्वांग कैसे-कैसे दंद-फंद करने पड़ते हैं! यह मुआ टिकट किसी का भी सगा नहीं होता है, चंचल चित्त सरीखा इधर-उधर सरकता-फिसलता रहता है, और न जाने कौन सी राह पकड़े, इस नतीजे पर पहुंच पाना अगर इस दौरे-ए-जहां में असंभवव नहीं तो बेहद कठिन अवश्य ही हो चला है। भला कोई इसमें इंकार कर सकता है।
प्राण जाए, वचन जाए, नियम-सिद्धांत, उसूल वगैरह भाड़-चूल्हे में जाएं, पर टिकट न जाए, इसी मूल-अंत्र को बेहद मजबूती से पकड़े-जकड़े दोपाया जीवों की एक बड़ी और निरंतर बढ़ती सी भीड़ को आसानी से देखा जा सकता है चहुंओर। ऐसा इसलिए कि न तो मौकों की कोई कमी है और न ही सीजन की चटख होती हरियाली में कोई कमी है, और अब तो बारहों मासी सा हो चुका माहौल भी अमूमन अपने शबाब पर बना रहता है बंधुओं।
टिकट संग्राम के कुरुक्षेत्र में लुटे-पिटे और घायलों को जहां आसानी से देखा जा सकता है। एक ओर जहां टिकट के दर्द की कराह और रुदन को महसूस किया जा सकता है, तो वहीं दूसरी ओर टिकट-वाह टिकट के तरो-ताजा और चमकते-महकते जलवों को भी देखा-सुना और महसूस किया जा सकता है। यानी कि टिकट देव अपने सारे रूपों का फ्री-स्टाइल सा प्रदर्शन कर देते हैं, लोकतंत्र के विशाल वटवृक्ष की बरगदी छांव में। और मजे की बात तो यह देखिए कि भाई लोगों की बात यहीं पर ही खत्म नहीं हो जाती है।
यहां तक का हो तक भी गनीमत, पर टिकट के सदाबहार से हो चुके चरित्र का एक रंग यह भी देखिए जनाब कि कभई-कभी मिल जाने के बावजूद भी संतुष्टि न होकर असंतुष्टि की डिग्री में इजाफा हो जाता है। कारण यह कि जहां का रिजर्वेशन चाहते थे, वहां का नहीं मिला, बल्कि दूसरी जगह का मिल गया। यानी कि टिकट चाहिए अगर नई दिल्ली की, तो पुरानी दिल्ली से ही काम चलाना पड़ेगा। अब इस मामले में क्या किया जा सकता है इइया, सब टिकटीय माया और तिलस्म की दुनिया का खेल है, इसके भांति-भांति प्रकार के चमत्कारिक रंग क्या-क्या शेड्स न दिखा दें।
यानी कि सब टिकटीय-जादू की धूप-छांव और उतार-चढ़ाव का खेल है भइया। हाथ लगने पर हर तरह के रिएक्शन का उतना-उतना ही चांस होता है, जितना कि न मिलने पर कहर बरपने की भांति-भांति प्रकार की स्थितियों का होता है। इसलिए तो चाहते न चाहते हुए भी इस दुनिया के लोकतंत्रीय मेले-ठेले में यही कहना पड़ जाता है कि ‘हाय टिकट-आह टिकट’ और साथ ही साथ वाह टिकट-यकीनन ही तू है बड़ा महाविकट।
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