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व्यंग्य: आरक्षण का हार्दिक मुद्दा

मुल्क में वैसे तो किसी चीज की कमी नहीं है। सब कुछ तो है यहां। भरपूर आबादी है।

व्यंग्य: आरक्षण का हार्दिक मुद्दा

मुल्क में वैसे तो किसी चीज की कमी नहीं है। सब कुछ तो है यहां। भरपूर आबादी है। इसका निरंतर होता विस्तार है। भांति भांति के पर्व हैं। उन्हें मनाने की विधि है। ढोल नगाड़े हैं। कोलाहल है। बात बात पर लोगों के लगने वाले जमघट हैं। सड़क पर लगने वाले जाम हैं। जाम खुलने के बाद मिलने वाला आराम है। चादर हैं। उसे ओढ़ कर चैन से सोने वाले निद्रामग्न लोग हैं। भ्रष्टाचार है। उसके निदान के लिए तमाम प्रकार के स्पाईकैम जैसे उपकरण और महकमे हैं। बदलती हुई ऋतुएं हैं। मानसून है। गहरे काले बादल हैं। उनके जलभरे होने का अनुमान है। रातें हैं तरह तरह की। सुबहें हैं अनेक प्रकार की। मुर्गे हैं रंगबिरंगे। बांग देने का समय तय नहीं। और तो और हमारे पास हार्दिक महत्वकांक्षा भी है।

जातिगत आरक्षण के लिए बुलंद आवाज है। राजनीति के आसमान में उभरता हुआ नवोदित सितारा है। जातिगत आरक्षण एक लुभावना शब्द है। इसके झंडे तले पूरी बिरादरी एकजुट हो जाती है। इसके जरिए और कुछ हो या न हो पर बड़ी आस जगती है। बेरोजगारों को लगता है कि यदि आरक्षण आया तो समझो कि सरकारी नौकरी का अपोइंटमेंट लेटर आया। सरकारी जॉब मिला तो मानो मुलायम गद्दे और गाव तकिए से सुसज्जित तख्तेताउस मिला। बिना कुछ करे धरे मासिक पगार मिलने का अवसर उपलब्ध हुआ। फाइलों पर पसर कर लोगों के ऊपर रौब गालिब करने का मौका मिला। आराम फरमाने के लिए सीएल, ईएल, एमएल, फरलो टाइप के अवकाश अधिकारिक रूप में मिले। मेज के नीचे से प्रकट होने वाली ऊपर की आमदनी होने की संभावना बलवती हुई।

मुल्क जान गया है कि बढ़िया नौकरियां अमूमन लियाकत से नहीं मिलतीं। वे या तो सिफारिश से मिलती हैं या रिश्वत के बलबूते या फिर आरक्षण की महती कृपा से। आरक्षण ऐसे ही नहीं मिल जाता उसके लिए धरने, प्रदर्शन, जुलूस और जलसे आयोजित करना होता। रोटी का निवाला उसी मुंह में जाता है जो उसे पूरे शोरोगुल के साथ देर तक बाए रहता है। आरक्षण उसी को प्राप्त होता है जो उसे दिए जाने की पुरजोर डिमांड करता है। रेलें रोकता है। जगह जगह आगजनी करवाता है। सामान्य जनजीवन ठप्प करवा देता है। यह कोई रेलवे बर्थ का रिजर्वेशन नहीं कि जो साइबर कैफे वाले के कंप्यूटर पर उंगलियां दौड़ाते ही हो जाए। पिछडापन तभी महिमामंडित होता जब उसके साथ राजनीतिक समीकरण आ जुड़ते हैं।
मुल्क के हर राज्य के पास न्यूनतम एक न एक निजी आइकन है। ठीक वैसे ही जैसे धरती पर जगमगाने की इच्छा रखने वाले लोगों के पास पर्सनल स्वप्निल आसमान होता है। आकाश में जगह पाने का मंसूबा बांधने के लिए अंधभक्तों के मजबूत कंधों की दरकार होती है। मानना होगा कि एक नए नवेले आरक्षण पुरुष का अभ्युदय हो चुका है। उसके लिए यह मुरादों भरे दिन हैं। उनके महती प्रयासों से किसी को रिजर्वेशन मिले या नहीं, लेकिन यह तय है कि उनके लिए राजनीतिक भविष्य की सीट बुक हो ली है। इस अनिश्चय से भरी दुनिया में रिर्जव सीट पर पसरने की बात ही कुछ और होती है।
और जब तक ऐसा होना संभव न हो तब तक सीट पर रुमाल, अंगोछा, हवाई चप्पल, मोबाइल, खैनी की डिब्बी टाइप कुछ रख कर उसे बाकायदा घेरने की जुगत की जा सकती है। घेराबंदी से रिजर्वेशन खुद ब खुद प्रकट हो जाता है। आरक्षण एक ऐसा सपना है जिसे इस मुल्क की अधिसंख्य आबादी अपने जीते जी कम से कम एक बार तो जरूर देखती ही है।
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