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व्यंग्य : जीवन में ''विकल्प की व्यवस्था'' खोजता इंसान

यदि गांव में चिकित्सालय नहीं हों तो किसी बाबाजी के पास जाकर भी अपना उपचार करवाया जा सकता है।

व्यंग्य : जीवन में
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नागरिक स्वयं अपने स्वास्थ्य का खयाल रखने के लिए परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों की बजाय अन्य वैकल्पिक साधनों के उपयोग के लिए स्वतंत्र हैं। यदि गांव में चिकित्सालय नहीं हों तो किसी बाबाजी के पास जाकर भी अपना उपचार करवाया जा सकता है। काले डोरे और पीतल के सस्ते ताबीज को धारण करने से महंगी दवाइयों के खर्च से बचा जा सकता है।
अकसर मैं सोचता हूं कि यदि विकल्प नहीं होते तो बड़ी परेशानी आ जाती हमारे सामने। कितना कठिन हो जाता हम सबका जीवन। विकल्पों की मौजूदगी ने सब कुछ बहुत आसान बना दिया है। बारिश की संभावनाओं और मानसून का आकलन करने में जब हमारा मौसम विभाग चूक जाता है तो वैकल्पिक साधन चुनते हुए सट्टा बाजार जैसे सूत्रों से हम सही स्थिति का पता लगाने का प्रयास करने लगते हैं।
यों कहें कि विकल्पों पर हमारा कुछ ज्यादा ही भरोसा रहता है तो कुछ गलत नहीं होगा। देश की आर्थिक स्थितियों के बारे में वित्त मंत्रालय के आंकड़ों और उसकी सांख्यिकी का हम ज्यादा इंतजार नहीं करते। शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव और सेंसेक्स के उठते-गिरते स्तरों से महंगाई और देश के वित्तीय स्वास्थ्य का जायजा हम आसानी से ले लेते हैं। नागरिक स्वयं अपने स्वास्थ्य का खयाल रखने के लिए परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों की बजाय अन्य वैकल्पिक साधनों के उपयोग के लिए स्वतंत्र हैं। यदि गांव में चिकित्सालय नहीं हो तो किसी बाबाजी के पास जाकर भी अपना उपचार करवाया जा सकता है। समोसे और हरी चटनी के प्रिस्क्रिप्शन से परेशानियों से छुटकारा प्राप्त करने का विकल्प भी मिल जाता है। काले डोरे और पीतल के सस्ते ताबीज को धारण करने से महंगी दवाइयों के खर्च से बचा जा सकता है।
इसी तरह अपना प्रतिनिधि और सरकार चुनने के लिए तो कई विकल्प होते ही हैं परंतु किसी को भी नही चुनने का विकल्प भी अब ‘नोटा’ उपलब्ध हो गया है। यह भी दिलचस्प है कि संभावित सरकार किसकी होगी और कौन नेतृत्व करेगा इसके लिए अनुमान लगाने के लिए भी अनेक विकल्प देखे गए हैं। विशेषज्ञों और राजनीतिक पंडितों के आकलन पर भरोसा नहीं रहता है तो ज्योतिषियों द्वारा देश की कुंडली देखकर राष्ट्र की ग्रह दशा की भविष्यवाणी की जाती है। उम्मीदवारों के राशिचक्र में राजयोग के लक्षणों के आधार पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पद की घोषणा संभव हो जाती है।
कई बार इस विकल्प की सुविधा का बड़ा दिलचस्प उपयोग भी देखने को मिलता रहा है। कुछ वर्षों पूर्व एक डॉक्टर साहब ने इसी व्यवस्था का लाभ लेते हुए मरीज की बांर्इं टांग की बजाय दाहिनी टांग का सफल ऑपरेशन कर दिया था। यह तो होना ही था, यदि विकल्प हैं तो उसका उपयोग भी सहज है। डॉक्टर चाहें तो उनके पास मरीज के पेट में कैंची, दास्ताना या रूई छोड़ देने का विकल्प भी होता है। कुछ ने इस विकल्प का उपयोग भी समय-समय पर किया है। बत्तीस दातों में से किसी एक दांत के लिए डॉक्टर के पास पूरे इकत्तीस विकल्प मौजूद होते हैं। अब अगर वह दर्द वाले दांत के बजाय किसी और दांत को जबड़े से बाहर कर दे तो इसमें डॉक्टर की कोई गलती नहीं है, क्योंकि जहां विकल्प हैं वहां चुनने का अधिकार भी स्वत: प्राप्त हो जाता है।
कुछ लोगों को इस बात पर आपत्ति होती है कि लोग जल्दबाजी में अकसर गलत विकल्पों का प्रयोग कर लेते हैं। ठोकर खाते हैं और बाद में उन्हें पछताना पड़ता है। दरअसल, यदि विकल्प हैं तो उनका उपयोग तो होगा ही। विकल्पहीनता तानाशाही और अराजकता का रास्ता दिखाती है, जो बेहद घातक और खतरनाक दिशा की ओर जाता है। इसलिए मेरा मानना है कि विकल्प की व्यवस्था तमाम दुर्गुणों और खतरों के बावजूद अपनाई ही जानी चाहिए।
विकल्प का विवेकपूर्ण उपयोग हमें ज्यादातर राहत ही देता है। देशवासी-प्रदेशवासी पुरानी सरकार को नकार कर नई सरकार और नए नेतृत्व को चुनकर विकल्प की व्यवस्था का लाभ उठाते हैं। कई बार स्थिति कुछ सुधरती है तो कई बार और बिगड़ जाती है। बहरहाल, विकल्प की इस शानदार व्यवस्था को हमेशा बचाए रखा जाना अपरिहार्य ही नहीं अनिवार्य है।
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