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व्यंग्य : खास से आम होना

अब तुम भी हमारे मोहल्ले के दामादों की तरह एयरपोर्ट पर तो छोड़िए बस स्टाप पर भी जांचे जा सकते हो।

व्यंग्य : खास से आम होना

हे दामाद बाबू! अखबार में पढ़कर बचे-खुचे मन को तब बड़ा धक्का लगा जब पढ़ा कि केंद्र ने तुम्हें वीवीआईपी लिस्ट से बाहर कर मेरे पड़ोसी के दामाद सा दर्जा दे दिया है। अब तुम भी हमारे मोहल्ले के दामादों की तरह एयरपोर्ट पर तो छोड़िए बस स्टाप पर भी जांचे जा सकते हो। अब तुम भी हमारे मोहल्ले के दामादों की तरह बिजली का बिल देते लाइन में एक दूसरे को धक्का देते देखे जा सकते हो।

बुरा हो इस केंद्र का जिसने तुम्हें अर्श से ला फर्श पर पटक दिया। ऐसा करते हुए पता नहीं यह केंद्र क्यों भूल गया कि तुम यूपीए के ही नहीं, पूरे देश की राजनीतिक पार्टियों के दामाद हो! पर केंद्र को क्या? उसे क्या लेना देना दूसरों के दामादों से? पता नहीं तुम्हें वीवीआईपी लिस्ट से हटाते वक्त सभ्यता, संस्कृति की दुहाई देने वाला केंद्र यह कैसे भूल गया कि इस देश में कुछ और साझा हो या न पर बेटी-दामाद सदियों से सबके सांझा रहे हैं।

यही हमारी संस्कृति की महानता है। पर अब पता नहीं केंद्र ने नई दामाद नीति कैसी बना दी कि दामाद भी अपने-अपने। खैर, चेले-चांटे तो पहले से ही सबके अपने-अपने रहे हैं। तुमसे वीवीआईपी दामाद का दर्जा छिन जाने पर तुम पर क्या बीत रही होगी, यह तो तुम ही जानो, पर मुझ पर जो बीत रही है वह मैं ही जानता हूं। मैं भी कभी अपने ससुराल का तुम्हारे टाइप का वीवीआईपी दामाद रहा था। पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में। वह मेरे दामादपने का स्वर्ण युग था। पर वक्त की मार, वह बसंत बीतते देर न लगी। और आजकल आम हो गया हूं। दामादपने की सारी कलई धुल गई है। बिन कलई के पीतल का पुराना पतीला सा बेलौंस हो गया हूं। आम से खास होने पर ऐसा ही होता है बाबू! इसलिए दामाद के खास से आम होने का दर्द मुझसे बेहतर शायद ही और कोई जानता हो।

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अब कहने को हम कुछ कहें, पर सच तो यह है कि दुख तो आईआरडीपी की लिस्ट से नाम कटने का भी होता है और यह तो वीवीआईपी लिस्ट से नाम कटने का मामला है। ऐसे में दिल न टूटेगा तो क्या होगा? कई बार दिखावे को हंसने पर भी मन को शांति मिल जाती है दामाद जी। चलो, फेसबुक पर हंस लेते हैं। हे दामाद बाबू! तुमसे दामाद का वीवीआईपी दर्जा छिन जाने के बाद मुझे तो दिन में भी चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा ही नजर आ रहा है। देश में संस्कृति नाम की कोई चीज नहीं दिख रही। लगता है पूरा देश ही ज्यों संस्कृति विहीन हो गया हो।

यह सोच बीमार कलेजा धंसा जाता है कि अब तो तुम्हें भी मेरी तरह ससुराल में हर तलाशी से गुजरना पड़ेगा तो राम जाने तुमको कैसा लगेगा? तुमको कैसा भी लगे, पर सच कहूं तो, मुझे यह बहुत बुरा लगेगा क्योंकि दामाद के खास से आम होने का दर्द मैंने दिल की गहराई से झेला है, महसूस किया है। पर भला हो मेरे दंभ का कि आम होने के बाद भी मैं जैसे-कैसे अपने को अपनी ससुराल में अपने दम पर अपनी नजरों में खास बनाए हूं। इसलिए हे खास से आम हुए दामाद!
क्या हुआ जो केंद्र न तुम्हें खास दामाद से आम दामाद बना दिया, लो आशीर्वाद में तुम्हें मैं सोलह आने खालिस सीख देता हूं, डरना मत। अपनी नजरों में ही सही, अपने को मेरी तरह खास बनाए रखना। जीना आसान बना रहेगा, मेरी तरह। वक्त बदलते देर नहीं लगती। आज पतझड़ है तो कल बसंत भी आएगा ही! अब आम और खास रिश्तों में प्यार से नहीं, कुर्सियों की नजदीकियों से जो तय होते हैं प्यारे!
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