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आलोक पुराणिक का व्यंग्य : बबलूजी बाटलीवाला

डिस्क्लेमर-इस लेख का उद्देश्य किसी को भी शराब पीने के लिए प्रेरित करना नहीं है।

आलोक पुराणिक का व्यंग्य : बबलूजी बाटलीवाला
डिस्क्लेमर-इस लेख का उद्देश्य किसी को भी शराब पीने के लिए प्रेरित करना नहीं है। लेख का उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक जीवन के उन आयामों पर प्रकाश डालना है, जो आम तौर पर कहीं दबे-छिपे रहते हैं। लेख मेरे स्वर्गीय मित्र बबलू बाटलीवाला को सर्मपित है। प्रोफेसर थे, मेरे सहकर्मी रहे कई सालों तक। वह पीते रोज थे, मरने से पहले कुछ हफ्ते बीमार रहे, पर बीमारी से ज्यादा अपराधबोध से ग्रस्त कि हाय मैं पीता रहा जिंदगी भर। उन्हें अपराधबोध से निकालने की मैंने बहुत कोशिश की पर प्रोफेसरों को समझाना बहुत मुश्किल काम है। मुझे एक शोधपत्र सा तैयार करना पड़ा उन्हें समझाने को।
यह शोधपत्र ही व्यंग्य-लेख हो गया। वह यूं है-शराब का हमारी अर्थव्यवस्था में गहन महत्व है, क्योंकि शराबी एक आदर्श करदाता होता है। किसी भी आइटम पर कर लगाया जाए, उसे देने वाला किच-किच मचा देता है। पेट्रोल पर एक डेढ़ रुपया बढ़ा दो, मार किच किच हो जाती है। पेट्रोल का कस्टमर हुड़क-हुड़कर टीवी चैनलों को बयान देने लगता है कि हम मर गए, लुट गए, तबाह हो गए। हर साल शराब के भाव 15-20 परसेंट बढ़ते हैं। दिखा दे कोई, किसी शराबी ने कभी चिक-चिक मचाई हो। इतिहास में एक भी जुलूस ऐसा नहीं दर्ज है, जिसमें शराब के खरीदारों ने डीएम, सीएम या पीएम को जुलूस निकालकर मांगपत्र दिया हो कि प्लीज दारू सस्ती कर दो।
महंगाई का बोझ दारू पर ना लादो। ऐसे असंतोषी, उद्विग्न समय में महंगी दारू के भुगतान में शराबी का सा संयम दुर्लभ है, इतना दुर्लभ, इतना दुर्लभ कि सिर्फ शराबियों में ही ये पाया जाता है। शराबी कभी कस्टमर केयर की शिकायत नहीं करता। कभी भी नहीं। आप देख लें, तमाम उत्पादों के शो-रूम होते हैं, जिनमें ग्राहकों को बैठाया जाता है, एयरकंडीशंड माहौल में उनकी आव-भगत की जाती है। शराब का ग्राहक अलग तरह का है। शराब की कई दुकानों के अंदर घुसने की इजाजत ग्राहक को नहीं होती है।
शराब का आर्थिक महत्व इस बात में निहित है कि शराब कारोबार मंदी से मुक्त है। जब दुनिया में तमाम कारोबार सिकुड़ने की शिकायत कर रहे हों, तब अकेले उत्तर प्रदेश में शराब का कारोबार करीब 15,000 करोड़ रुपए से ज्यादा टर्नओवर दिखा रहा है। जब पूरी दुनिया के बड़का-बड़का उद्योग मंदी का रोना रोते हैं। कर्मचारियों की छंटनी करते हैं।
पर शराब का कारोबार करीब बीस परसेंट की रफ्तार से ऊपर की ओर धकापेल हुआ जाता है। जबकि आटोमोबाइल उद्योग वाले, टेक्सटाइल उद्योग वाले मार मचाए रहते हैं कि हाय मंदी आ गई, सरकार ने कर कम ना किए, तो हम अपनी वो उत्पादन इकाई बंद कर देंगे, ये इकाई बंद कर देंगे। शराब के क्रेता अपने उद्योग को लगातार विकास के पथ पर अग्रसर करके ये सुनिश्चित करते हैं कि शराब कारोबारियों द्वारा ऐसी धमकियां ना दी जाएं।
पुनश्च-सच बात ये है कि इस कहानी से हमें दो शिक्षाएं मिलती हैं-एक, शरीफ आदमी को शराब नहीं पीनी चाहिए, वरना मौत के वक्त वह पीने के अपराधबोध में ग्रस्त होकर औरों को परेशान कर सकता है। और शराबखोरी से बची रकम अपनी पत्नी के हाथों में दें, ताकि महंगाई का मुकाबला किया जा सके। महंगाई से बचाने की सारी जिम्मेदारी सरकार के हवाले ना करें। वह निकम्मी साबित हुई है। शराबी आगे आएं, शराब छोड़कर बची रकम बीबी के हाथ में देकर ये जिम्मेदारी निभाएं। छोड़ने की सार्मथ्य हो, तो सिर्फ गैस सब्सिडी ही ना छोड़ें, शराब भी छोड़कर दिखाएं।

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