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यूपी में एक्सप्रेस वे और छत्तीसगढ़ में हिचकोले खाती विकास की रफ्तार

विकास की रफ्तार सरगुजा और जशपुर जिले में हिचकोले खा रही है। यूपी में एक्सप्रेस वे पर फाइटर प्लेन उतर कर दौड़ रहा है और यहां बाइक चलाना भी कठिन हो रहा है।

यूपी में एक्सप्रेस वे और छत्तीसगढ़ में हिचकोले खाती विकास की रफ्तार
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विकास की रफ्तार सरगुजा और जशपुर जिले में हिचकोले खा रही है। यूपी में एक्सप्रेस वे पर फाइटर प्लेन उतर कर दौड़ रहा है और यहां बाइक चलाना भी कठिन हो रहा है। अफसर दस्तावेजों में आंकड़े के घोड़े खूब दौड़ा रहे हैं। कहने को तो सरकार ने 2000 करोड़ रुपए दिए हैं, फिर भी सड़क नहीं बन रही हैं। अंबिकापुर-रायगढ़ मार्ग पर हजारों पेड़ कट गए, गड्ढे खोद दिए गए और फिर ठेकेदार भाग गया।

पत्थलगांव से रायगढ़ की सड़क का ठेका जिंदल ने लिया, पर वह सड़क भी नहीं बनी। कालरी छिनने की मायूसी और मंदी की मार ने इस समूह को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया। अब जनता को भगवान भरोसे छोड़कर अफसरों, नेताओं ने दूसरे रास्ते ढूंढ लिए हैं। कोई ट्रेन से पहुंचता है तो कोई दूसरे राज्यों की सड़क के जरिए। मंत्री, सांसद, अफसर सब पहले ट्रेन से झारसुगुड़ा जाते हैं, फिर ओड़िशा होते हुए जशपुर पहुंचते हैं।

राजधानी से सरगुजा जाने वाले अफसर, नेता ट्रेन को ही शान की सवारी मानते हैं। जशपुर से दिल्ली की यात्रा रांची के जरिए प्लेन से पूरी होती है। भला हो लोक सुराज का जो डॉक्टर रमन स्वयं जशपुर-सरगुजा पहुंच गए। कम से कम मरम्मत तो शुरू हुई। यह स्थाई हल नहीं है। बड़ी कंपनियां ट्राइबल इलाकों को चारागाह समझती हैं। ठेके लेकर छोटे-छोटे चरिंदे पैदा कर मुनाफा कमाती हैं। यह सिलसिला बंद होना चाहिए। लोग त्रस्त हैं, बस यही इल्तजा है कि ऐसे अफसरों को सरकार वापस बुला ले जो सरेआम कह रहे हैं कि कौन 'दूध का धुला' है।

इस इलाके में दिग्गजों की कमी नहीं है। विष्णुदेव साय, रणविजय सिंह जूदेव, रामविचार नेताम से लेकर टीएस सिंहदेव तक। सबके सामने ऐसे अफसर चुनौती बन कर खड़े हैं। चुनाव करीब है जनता सवाल पूछ सकती है। वैसे सड़कों की हालत बाकी जिलों में भी कमोबेश ऐसी ही है। 17 साल में रायगढ़ से रायपुर और न्यायधानी से राजधानी की सड़क नहीं बन सकी है। सब भारतीय रेल के भरोसे हैं। दवा का संगठित गिरोह सड़क का सफर जितना त्रासद है, उतनी ही बीमार यहां की तासीर हो चली है। दोनों संभाग में नशे की दवा का काला कारोबार फल-फूल रहा है।

जब दवा ही दारू बन जाए तो मर्ज का लाइलाज होना तय है। कुछ दिनों में यह मर्ज डरावना हो चला है। खासकर अंबिकापुर और जांजगीर ने तो देश भर का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। पुलिस नशीली दवाएं जब्त कर रही है और जिम्मेदार विभाग कोडीन के नशे में हैं। यह आंकड़े तो डब्ल्यूएचओ को भी सोचने पर मजबूर कर सकते हैं कि 20 करोड़ की खांसी की दवा आखिर एक जिले में कैसे बिकी। जांजगीर जिले में क्या हर कोई खांसी की चपेट में है? दरअसल यह इलाका कोडीनयुक्त दवाओं का कॉरिडोर बन गया है। सरकारी अमला जितना असंगठित है, यह काला कारोबार उतना ही संगठित है। सक्ती, जांजगीर, चांपा, नरियरा, राहौद, बलौदा, सीपत, जैजैपुर में लाखों की नशीली दवाएं बिक रहीं हैं।

जिले से बांग्लादेश तक कफ सिरप की खेप जा रही है। कटनी से नशीले इंजेक्शन की खेप बेखौफ आ रही है। यह कभी भी लोगों की जान ले सकती है। नशे की तिजारत के पोषक भी कुछ सफेदपोश हैं, जो व्यापारी के पकड़े जाते ही फर्जी बिल जुटाने की कवायद में लग जाते हैं। सरगना रायपुर और बिलासपुर में हैं। यह सब जानते हैं, पर कार्रवाई नहीं होती। अफसरों की यह दलील ठीक हो सकती है कि दवा है, बिक्री कैसे रोक सकते हैं? पर हुजूर यह तो पूछ ही सकते हैं कि व्यापारी सिर्फ कफ सिरप ही क्यों बेच रहा है ? लाइलाज गरीब प्रगति हमेशा सबको फायदा नहीं देती। काले हीरे के इलाके के लोगों की तो किस्मत ही प्रगति के विपरीत चलती है।

यहां जब तक घराने देशी रहते हैं, लोगों के काम आते हैं। जैसे ही वह बहुराष्ट्रीय हो जाते हैं, तो दुनिया बदल जाती है। फिर भी ना जाने क्यों हमारे नेता सब कुछ मल्टीनेशनल को सौंपने की जल्दबाजी में रहते हैं। अब जब वेदांता के कैंसर हॉस्पिटल पर बहस छिड़ी है, तो नेता नींद से जाग रहे हैं। याद कीजिए बालको के निजीकरण के विरोध के वक्त खून पसीना बहाने वाले जमीन पर थे और जिम्मेदार नेता कारपोरेट घरानों के साथ उड़ रहे थे। अब बालको वेदांता से यह पूछना पड़ रहा है कि गरीबों का इलाज करेंगे या नहीं? सवाल करने वाले दाऊ महंत को सोचना चाहिए कि जब वह डॉक्टर महतो को नहीं पूछ रहे हैं, तो गरीबों की भला क्या बिसात? वैसे भी कारपोरेट और गरीब का भला क्या रिश्ता। अपोलो हॉस्पिटल को भी सरकार ने वेदांता की तरह लगभग मुफ्त में जमीन दी है।

अब वहां गरीब का इलाज तो दूर उसे गेट के भीतर तक जाने की पाबंदी है। आम मध्यम वर्गीय वहां जाता है तो जीवित लौटे अथवा मृत, कर्जदार बनकर ही लौटता है। लाश भी बिना पूरा पेमेंट किए वापस नहीं मिलती। इनसे भले तो एम्स के वे डॉक्टर हैं, जिन्हें सरकार ने गनियारी की खाली कॉलोनी के खंडहर दिए और वे यहां गरीबों को जीवन दे रहे हैं। एक और देशी संस्थान विदेशी बना गोपाल नगर में। रेमंड सीमेंट संयंत्र जब लाफार्ज को सौंपा गया, तो लोग प्रगति के सपने देखने लगे थे। अब तो वहां छत्तीसगढ़ के परिंदों को भी उड़ने की इजाजत नहीं है। निजी ही क्यों, सरकारी संस्थानों का चरित्र भी ज्यादा अलग नहीं है। रेलवे जोन बना, कमाई करोड़ों में पहुंच गई।

क्या अब किसी गरीब का इलाज वहां के अस्पताल में हो सकता है? यहां तो रेलकर्मियों को भी इलाज के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है। सीपत में एनटीपीसी का विशाल पावर प्रोजेक्ट लगा। देशभर में बिजली बेची जा रही है, पर यहां के अस्पताल में इलाज किसे मिल रहा है? जीने के लिए संघर्ष कर रहे एक पत्रकार का उदाहरण काफी है। उसे एनटीपीसी के अस्पताल में इंजेक्शन खरीदकर लाने कहा जाता है। बाकी गरीबों की तरह यह 'प्रगति' उसे भी भारी पड़ रही है। राखड़ बांध फूटते क्यूं हैं जब से सांसद अभिषेक सिंह ने संसद में फसल अवशेष प्रबंधन का मुद्दा उठाया है, तब से बिलासपुर संभाग के किसान भी उनसे उम्मीद करने लगे हैं।

पावर बेल्ट में किसान बिजली घरों की राखड़ से परेशान हैं। कल्पना कीजिए...प्रतिदिन 55 हजार टन राखड़ कोरबा के आठ बांधों में रोज डंप हो रही है। रायगढ़, सीपत सहित अन्य संयंत्रों में भी राखड़ उत्सर्जन उसी गति से हो रहा है। दावा तो यह है कि 55 फ़ीसदी राखड़ का उपयोग हो रहा है, लेकिन यह आंकड़ा हकीकत से दूर है। हमेशा की तरह किसी दिन कोई बांध फूटेगा और लाखों टन राखड़ नदी व खेतों में बह जाएगी। नदी मैली होगी और खेती चौपट। किसान कराहता रह जाएगा।

डैम फूटने की यह घटनाएं स्वाभाविक से ज्यादा साजिश का हिस्सा लगतीं हैं। ऐसे में 'पर्यावरण हितैषी' सरकार को इधर रुख करना चाहिए। राखड़ प्रबंधन में सख्ती के साथ साथ यह जांच भी होनी चाहिए कि बांध आखिर अचानक फूटते क्यूं हैं और वह भी रात में...? चलते-चलते रायपुर एयरपोर्ट अब 24 घंटे चालू रहेगा। यह खबर छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए खुशी का विषय हो सकती है, लेकिन बिलासपुरवासी दुखी हैं। वह सोच रहे हैं कि वहां दिन-रात प्लेन उतरेंगे और हम यहां दिन में भी प्लेन उतारने के लिए गाय- बकरी हकालते रहते हैं। पता नहीं वह दिन कब आएगा जब रोज हवाई जहाज आएगा...।

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