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डाॅ. एन.के. सोमानी का लेख : असमंजस में रूस-अमेरिकी रिश्ते

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के बीच आयोजित शिखर बैठक को वैश्विक शांति व स्थिरता की दृष्टि से काफी अहम माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच शीतयुद्ध कालीन रिश्तों पर जमी हुई बर्फ के पिघलने की उम्मीद बढ़ी है। बैठक के दौरान दोनों नेताओं के बीच सहमति और असहमति के कई बिन्दुओं पर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने वार्ता को 'रचनात्मक और सकारात्मक' बताया है, लेकिन बैक टू बैक संवाददाता सम्मेलनों से इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों महाशक्तियां मानवाधिकारों, साइबर हमलों और यूक्रेन को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति में हैं।

डाॅ. एन.के. सोमानी का लेख : असमंजस में रूस-अमेरिकी रिश्ते
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डॉ. एन.के. सोमानी

स्विटजरलैंड के ऐतिहासिक शहर जेनेवा में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के बीच आयोजित शिखर बैठक को वैश्विक शांति व स्थिरता की दृष्टि से काफी अहम माना जा रहा है। ओपन स्काई ट्रीटी से रूस के हटने की घोषणा के महज डेढ़ सप्ताह के भीतर दोनों महाशक्तियों के बीच होने वाली इस सुप्रीम बैठक पर चीन सहित दुनिया के तमाम देशों की निगाहें लगी थी। हालांकि बैठक का अंतिम निष्कर्ष कोई बहुत कुछ चीजें सामने लेकर नहीं आया है, लेकिन इस आशय के समाचार जरूर आ रहे हंै कि दोनों महाशक्तियां रुकी हुई परमाणु वार्ता शुरू करने और राजदूतों को पुनःबहाल करने पर राजी हो गए हैं। कुल मिलाकर कहें तो दोनों देशों के बीच शीतयुद्ध कालीन रिश्तों पर जमी हुई बर्फ के पिघलने की उम्मीद बढ़ी है।

बैठक के दौरान दोनों नेताओं के बीच सहमति और असहमति के कई बिन्दुओं पर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने वार्ता को 'रचनात्मक और सकारात्मक' बताया है, लेकिन बैक टू बैक संवाददाता सम्मेलनों से इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों महाशक्तियां मानवाधिकारों, साइबर हमलों और यूक्रेन को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति में हैं। यह असमंजस या वार्ता के दौरान किसी मसले या बिन्दू को लेकर उत्पन्न हुआ हो ऐसा तो हो नहीं सकता। बहुप्रतीक्षित वार्ता से पहले वार्ता के एजेंडे को लेकर दोनों ही पक्षों ने भरपूर होमवर्क किया होगा और पूरी तैयारी के बाद दोनों पक्ष वार्ता के लिए राजी हुए होंगे। तब विवाद के अहम बिन्दुओं पर असंमजस क्यों।

दरअसल, पुतिन-बाइडेन शिखर बैठक ऐसे समय में हुई है, जबकि दोनों देशों के संबंध अब तक के सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। पिछले चार महीनों में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के खिलाफ तीखी बयानबाजी की है। बाइडेन ने पुतिन को हत्यारा तक कह दिया था। बाइडेन के बयान के बाद दोनों देश के बीच विवाद इतना बढ़ गया था कि रूस ने अमेरिका में मौजूद राजदूत को वापस बुला लिया था। राष्ट्रपति बनने के बाद जब बाइडेन ने पुतिन को काॅल की थी उस वक्त भी उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें अमेरिकी चुनाव में रूसी हस्तक्षेप के सबूत मिलते हैं, तो वे पुतिन के खिलाफ एक्शन लेंगे।

जी-7 और नाटो बैठकों की पृष्ठभूमि में हुई बाइडेन-पुतिन शिखर वार्ता पर पूर्वाग्रह की छाया भी बराबर रही। वार्ता से पहले ही बाइडेन कह चुके थे कि कई क्षेत्रों में हम असहमत हैं, लेकिन हम रेडलाइन दिखाने के लिए एक-दूसरे से मिल रहे हैं। यह हमारे और दुनिया के हित में हैं। ऐसे में सवाल यह है कि महाशक्तियों की इस सुप्रीम वार्ता से दुनिया के कौन से हित सधने वाले हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि सुप्रीम वार्ता फालतू की कवायद बन कर रह गई हो। वार्ता के परिणाम तो इस ओर ही इशारा कर रहे हैं। सच तो यह है कि बाइडेन इस ऐतिहासिक इवेंट् के जरिए अमेरिकी हित साधना चाहते थे। यही वजह थी कि सत्ता में आने के महज पांच माह के भीतर ही उन्होंने पुतिन को निमंत्रण भेजकर वार्ता के लिए राजी किया। अब सवाल यह है कि वे हित क्या थे और उसको साधने में बाइडेन कितने सफल हुए।

दरअसल, चीन का बढ़ता प्रभाव क्षेत्र अमेरिकी शक्ति के लिए चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में बाइडेन रूस-अमेरिकी रिश्तों को पटरी पर लाकर एक तरह से चीन को कांउटर करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि आज की तारीख में अगर चीन पर कोई दबाव बना सकता है, तो वह रूस ही है, इसलिए अगर अमेरिका और रूस करीब आते हंै, तो चीन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ेगा। दूसरी ओर रूसी हित भी पुतिन को वार्ता के लिए प्रेरित कर रहे थे। वार्ता से सप्ताह भर पहले उन्होंने ओपन स्काई ट्रीटी (ओएसटी) से हटने की घोषणा कर अमेरिकी नेतृत्व पर दबाब बनाने की कोशिश की थी। इतना ही नहीं नाटो बैठक के बाद भी रूस की ओर से काफी सधी हुई प्रतिक्रिया आई थी। पुतिन जानते हैं कि अगर अमेरिका के साथ उनके संबंध ठीक होते हैं, तो उन्हें चीन की आवश्यकता नहीं रहेगी, लेकिन पुतिन वैश्विक राजनीति के पुराने व अनुभवी खिलाड़ी हैं। वे शायद ही चीन पर दबाव डालने को राजी हों। दरअसल, पुतिन और बाइडेन वार्ता के जरिए अपने इन्हीं कूटनीतिक निहितार्थ को साधना चाहते थे। अमेरिका चीन को रूस से कहीं बड़ी चुनौती के रूप में देख रहा है।

कोरोना वायरस की उत्पत्ति एवं तमाम दूसरे मसलों पर दोनों के बीच टकराव और मतभेद की स्थिति है। उसकी नजर में चीन ग्लोबल विलेन है। कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए भी वह लगातार चीन पर आरोप लगा रहा है। ट्रंप के बाद बाइडेन भी इंडो-पेसिफिक और साउथ चाइना सी में ड्रैगन के बढ़ते प्रभाव को रोकने व उस पर दबाव बनाने की नीति पर आगे बढ़ रहे हैं। हांगकांग और उइगर मुस्लिमों को लेकर भी अमेरिका चीन को दुनिया में अलग-थलग करना चाहता हैं। क्वाड और जी-7 की हालिया शिखर बैठक में भी चीन छाया रहा। ऐसे में दोनांे नेताओं की इस मुलाकात को एक खास एंगल से देखा जा रहा था।

पिछले एक दशक में बाइडेन की पुतिन से यह दूसरी मुलाकात है। इससे पहले मार्च 2011 में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी। उस वक्त बाइडेन अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे और पुतिन रूस के प्रधानमंत्री। वार्ता के दौरान बाइडेन ने पुतिन के साथ बैठक में मानवाधिकारों के मुद्दांे पर जोर दिया। उन्होंने रूस में विपक्षी नेता एलेक्सी नवलनी के साथ-साथ रूस में गलत तरीके से कैद किए गए दो अमेरिकियों के मसले पर भी बात की थी। उम्मीद की जा रही है कि उक्त मसलों पर दोनों देश जल्द ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करेंगे।

हालांकि जेनेवा के ऐतिहासिक ला ग्रैंजे मेंशन में पुतिन-बाइडेन की सुप्रीम बैठक का कोई बहुत बड़ा परिणाम हाल-फिलहाल सामने नहीं आया है, लेकिन द्विपक्षीय संबंध जब बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हों तो इस तरह की बैठकों के जरिये भविष्य में आगे बढ़ने की राह तो खोली ही जा सकती है। कोई दो राय नहीं कि दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव कम होता है, तो चीन के अलावा दुनिया के तमाम देशों को इसका फायदा होगा। लेकिन बाइडेन की पुतिन को जेल में बंद रूसी विपक्षी नेता नवलनी का लेकर दी गई चेतावनी रूस- अमेरिकी संबंधों पर संदेह पैदा करती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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