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डा. गौरीशंकर राजहंस का लेख : रिश्तों के नए दौर में रूस-यूएस

चीन की विस्तारवादी नीति को पुतिन अच्छी तरह समझते थे, इसलिए उन्होंने मौके की नजाकत को भांपते हुए अमेरिका से हाथ मिलाना उचित समझा। पुतिन के सलाहकारों ने भी पुतिन को यह सलाह दी थी कि पुरानी कटुता को भूलकर नए सिरे से अमेरिका के साथ सबंध स्थापित किए जाएं। उधर अमेरिका ने भी एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में चीन की बढ़ती हुई ताकत देखकर रूस से अच्छे संबंध स्थापित करना ही उचित समझा। रूस एशिया प्रशान्त क्षेत्र के देशों से वह पहले की तरह मित्रवत्ा संबंध कायम कर रहा है। देर सवेर अमेरिका, रूस, भारत को लेकर चीन का मुकाबला करेंगे। पूरे विश्व की आंखें रूस व अमेरिका की इस नई मित्रता पर टिकी हुई हैं।

डा. गौरीशंकर राजहंस का लेख : रिश्तों के नए दौर में रूस-यूएस
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डा. गौरीशंकर राजहंस

द्वितीय विश्वयुद्व की समाप्ति के बाद ही दुनिया की राजनीति दो खेमों मेें बंट गई। एक खेमे का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था और दूसरे खेमे का रूस जिसे लोगों ने शीतयुद्ध या कोल्ड वार का नाम दिया। दोनों महाशक्तियां एक दूसरे के मुकाबले काफी ताकतवर थी और लगता भी नहीं था कि एक दूूसरे की ताकत में कभी कोई कमी पड़ेगी, परंतु 70 का दशक आते-आते रूस कमजोर पड़ता गया और पड़ोस के जिन देशों पर उसने नियंत्रण कर रखा था वे धीरे-धीरे किनारा करके आजाद होते गए। आर्थिक दृष्टि से भी रूस कमजोर पड़ने लगा। सामरिक दृष्टि से भी वह अमेरिका के सामने बौना होता गया।

संकट की इस घड़ी में भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई। अमेरिका और पश्चिम के देशों ने भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का मजाक उड़ाया, परंतु हर संकट की घड़ी में रूस ने भारत का साथ दिया। सुरक्षा परिषद में भी और बाहर भी रूस ने आगे बढ़कर भारत का साथ दिया। सत्तर का दशक आते-आते रूस कमजोर पड़ गया। भारत ने रूस का साथ फिर भी नहीं छोड़ा। इस बीच एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में चीन का दबदबा बढ़ता गया। चीन के बढ़ते दबदबे को देखकर अमेरिका के कान खड़े होते गए। रूस का बहुत बड़ा भाग जो साइबेरिया के पास स्थित है वहां चीन की सीमा लगती है जहां 14 करोड़ चीनी रहते हैं, जबकि रूस के वहां मात्र एक करोड़ निवासी रहते हैं। रूस को कमजोर पड़ता देखकर चीन इस क्षेत्र पर अपना दावा ठोकता रहा है जिसे रूस सिरे से खारिज और नापसन्द करता है। इस बीच रूस और अमेरिका की तनातनी बहुत बढ़ गई। उन्हीं दिनों ओबामा प्रशासन ने एशिया-प्रशान्त क्षेत्र की नीति की स्थापना की। इस दौरान जो बाइडेन अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे और ब्लादिमिर पुतिन रूस के प्रधानमंत्री थे। इन दोनों नेताओं के बीच एक बार तो मुलाकात हुई थी, परंतु उसके कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकले। इस बीच चीन ने एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में अपना दबदबा बहुत मजबूत कर लिया। जब पुतिन राष्ट्रपति हुए तब लाचार होकर अमेरिका को पाठ पढ़ाने के लिए उन्होंने चीन से दोस्ती कर ली, परंतु चीन की विस्तारवादी नीति को पुतिन अच्छी तरह समझते थे, इसलिए उन्होंने मौके की नजाकत को भांपते हुए अमेरिका से हाथ मिलाना उचित समझा। पुतिन के सलाहकारों ने भी पुतिन को यह सलाह दी थी कि पुरानी कटुता को भूलकर नए सिरे से अमेरिका के साथ सबंध स्थापित किए जाएं। उधर अमेरिका ने भी एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में चीन की बढ़ती हुई ताकत देखकर रूस ने अच्छे संबंध स्थापित करना ही उचित समझा।

कुछ वर्षों पहले अमेरिका और रूस के संबंध इतने खराब हो गए थे कि दोनों देशों ने एक दूसरे के यहां से अपने अपने राजदूत और राजनयिकों को अपने देशों में वापस बुला लिया। जैसे-जैसे समय बीतता गया दोनों देशों ने यह महसूस किया कि चीन उन देशों का असली दुश्मन है। चीन से पीछा छुड़ाने के लिए दोनों देशों के नेताओं ने आपस में हाथ मिलाना ही उचित समझा।

समय की नजाकत को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन ने जेनेवा में एक दूसरे से मिलना तय किया। यह मुलाकात दोनों नेताओं की जेनेवा में हुई जिस पर सारी दुनिया की निगाहें टिकी हुई थी। इस बैठक के शुरू मे पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से उनकी नीति एकदम भिन्न हैं और सही मायने में अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन रूस से सच्ची मित्रता कायम करना चाहते हैं।

इस बैठक में दोनों देशों के नेताओं ने अनेक आपसी मतभेद के मुद्दों पर चर्चा करते हुए उन्हें सुलझाने का प्रयास किया। सबसे बड़ी बात यह हुई कि दोनों देशों के नेताओं ने फैसला किया कि पुरानी कटुताआंे को भूलकर दोनों देश एक दूसरे के देशों में अपने दूतावास खोल देंगे और एक दूसरे के यहां अपने राजदूत और राजनयिकों को फिर से नियुक्त कर देंगे। दोनों नेताओं ने यह तय किया कि विभिन्न क्षेत्रों में वे मिलकर काम करेंगे और किसी भी हालत में अन्य देशों की गुप्तचरी को बढ़ावा नहीं देंगे। हाल के वर्षों में अमेरिका और रूस के बीच इतने मधुर संबंध कभी नहीं रहे थे। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस जेनेवा शिखर वार्ता में बहुत ज्यादा उपलब्धि नहीं भी हुई, लेकिन यह तो निश्चित रूप से हुआ कि जमी हुई बर्फ पिघलना शुरू हो गई। इसके असली मायने यह थे कि दोनों देश अन्दर ही अन्दर एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में चीन के दबदबे से आशंकित थे। उन्हें यह पता था कि यदि चीन एक बार किसी क्षेत्र को हड़प लेता है या किसी क्षेत्र में अपने पैर जमा लेता है तो आसानी से वह वहां से नहीं निकलता है। अब सारा संसार इस बात को समझ गया है कि चीन की मंशा तीसरे विश्वयुद्व को शुरू करने की है और कोई न कोई बहाना कर सारे संसार पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की मंशा रखता है।

पिछले वर्षों में जो कुछ भी हुआ हो, परंतु आज की तारीख में रूस और अमेरिका दोनों से भारत के मित्रवत संबध हैं। कल क्या होगा यह कहना कठिन है, परंतु यदि चीन दोनों देशोें को आंख दिखाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अमेरिका, रूस और भारत मिलकर चीन का मुकाबला करेंगे। शीतयुद्व के बाद ऐसा लग रहा था कि अमेरिका और रूस में अब भविष्य में कभी मित्रवत संबंध स्थापित नहीं होंगे, परंतु धीरे-धीरे रूस की आर्थिक स्थिति खराब होती गई और वह उन देशों पर नियंत्रण नहीं रख सका जिन्हें वह अपने खेमे में रखे हुए था। रूस को कमजोर देखकर उसके अन्य मित्र देश भी उसका साथ छोड़ते गये। रूस की हालत तब मजबूत हुई जब पुतिन ने सत्ता संभाली और संसार को यह विश्वास होता गया कि पुतिन के नेतृत्व में रूस फिर से एक शक्तिशाली देश बन जाएगा। भारत आज भी अपनी जरूरत के 56 प्रतिशत सामरिक हथियार रूस से ही खरीदता है। इसलिये रूस के साथ बना रहता भारत की मजबूरी ही नहीं आवश्यकता भी है। भारत की मित्रता को देखकर संसार के अन्य देश भी रूस के खेमे में आने लगे हैं। यदि निकट भविष्य में अमेरिका और रूस दोनों महाशक्तियों के सही अर्थ में मित्रवत संबंध रहे तो यह भारत सहित दुनिया के अन्य देशों के लिए अत्यन्त ही सुखद होगा।

रूस की हालत पहले से बहुत कमजोर हो गई थी, परंतु रूस ने धीरे-धीरे अपनी हालत मजबूत की है और एशिया प्रशान्त क्षेत्र के देशों से वह पहले की तरह ही अपने मित्रवत्ा संबंध कायम कर रहा है। बदली हुई परिस्थितियों में देर या सवेर अमेरिका और रूस भारत को साथ लेकर चीन का मुकाबला करेंगे। सारे संसार की आंखें रूस और अमेरिका की इस नई-नई मित्रता पर टिकी हुई हैं और लोग बड़ी उत्सुकता से इस बात का इन्तजार कर रहे हैं कि अब आगे क्या होगा?

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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