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विवेक शुक्ला का लेख : अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम पर गुलाब

भारत में एक नहीं बल्कि तीन अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं, प्रतीकात्मक रूप में। ये तीनों राष्ट्रपति के रूप में कभी भारत में नहीं आए। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन. एफ कैनेडी व्हाइट हाउस में रहते हुए तो कभी भारत की यात्रा पर नहीं आए। पर उनके नाम पर खुशबू बिखरेता एक प्रतीक राजधानी दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन में है। कैनेडी नाम के गुलाब के फूलों की एक प्रजाति मुगल गार्डन के मालियों ने उनकी हत्या के बाद विकसित की थी। कभी मुगल गॉर्डन जाएं तो कैनेडी की मधुर मुस्कान की तरह उनके नाम पर तैयार गुलाब के गुलों की सुंदर क्यारियों को भी निहार लें। आपको अच्छा लगेगा।

विवेक शुक्ला का लेख : अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम पर गुलाब
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विवेक शुक्ला

विवेक शुक्ला

अब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे या फिर जो बिडेन उनका स्थान लेंगे? इस सवाल का जवाब जल्दी ही पता चल जाएगा है। वैसे भारत में एक नहीं बल्कि तीन अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं। प्रतीकात्मक रूप में। ये तीनों राष्ट्रपति के रूप में कभी भारत में नहीं आए। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन. एफ कैनेडी व्हाइट हाउस में रहते हुए तो कभी भारत की यात्रा पर नहीं आए।

पर नके नाम पर खुशबू बिखरेता एक प्रतीक राजधानी दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन में है। कैनेडी नाम के गुलाब के फूलों की एक प्रजाति मुगल गार्डन के मालियों ने उनकी हत्या के बाद विकसित की थी। कभी मुगल गॉर्डन जाएं तो कैनेडी की मधुर मुस्कान की तरह उनके नाम पर तैयार गुलाब के गुलों की सुंदर क्यारियों को भी निहार लें। आपको अच्छा लगेगा। कैनेडी गुलाब देखने के बाद आपके लिए अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के नाम पर गुलाब की प्रजाति भी मुगल गार्डन में पेश है। मतलब अमेरिका के दो महान राष्ट्रपति भारत के राष्ट्रपति भवन में स्थायी रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं।

बहरहाल कैनेडी को 1964 के शुरू में भारत की सरकारी यात्रा पर आना था। तब उनका राजधानी में 1959 के अंत में बनी अमेरिकी एंबेसी बिल्डिंग को देखने का कार्यक्रम तय था। बीसवीं सदी के महानतम आर्किटेक्ट माने जाने वाले फ्रेंक लायड राइट कहते थे कि स्थापत्य की दृष्टि से अमेरिकी एंबेसी अद्वितीय है।

जाहिर है, राइट की टिप्पणी के बाद कैनेडी को पता चल ही गया होगा कि नई दिल्ली में बनी अमेरिकी एंबेसी बिल्डिंग अमेरिकी आर्किटेक्ट एडवर्ड डुरेल स्टोन की रचनाधर्मिता का चरम है। सच में 27 एकड़ में बनी अमेरिकी एंबेसी अपने आप में उत्कृष्ट है। कैनेडी इसे देखकर प्रसन्न अवश्य होते। पर अफसोस कि कैनेडी की 22 नवंबर,1963 को डलास में हत्या कर दी जाती है। उनकी अकाल मृत्यु से दुनिया स्तब्ध हो गई। इस तरह वे राष्ट्रपति पद पर रहते हुए तो भारत नहीं आ सके। वे 1955 में भारत घूमने के लिए आए थे। पर श्रीमती जैक्लीन कैनेडी 12-21 मार्च,1962 को भारत यात्रा पर आईं। उनकी उस यात्रा की सारी तैयारी अमेरिका के एंबेसेडर जॉन कैनिथ गेलब्रिथ देख रहे थे। अमेरिका में गेलब्रिथ का नाम अर्थशास्त्री के रूप में बड़े ही अदब के साथ लिया जाता है। राष्ट्रपति जॉन कैनेडी के विश्वासपात्र गेलब्रिथ 1961-1963 के बीच अमेरिका के भारत में एंबेसेडर थे। वे जब यहां पर तैनात थे तब भारत-चीन के बीच जंग छिड़ गई थी। तब अमेरिका खुलकर भारत के साथ खड़ा था। राष्ट्रपति कैनेडी भारत के प्रधानमंत्री नेहरु से गेलब्रिथ के माध्यम से ही संपर्क में थे। वे दिल्ली के डिप्लोमेटिक सर्किल में अपने 6 फीट 11 इंच लंबे कद के कारण भी पहचाने जाने लगे थे। वे भारत आने से पहले ही भारत के कृषि क्षेत्र का गहराई से अध्ययन करने लगे थे।

बहरहाल, जैक्लीन कैनेडी का पालम एयरपोर्ट पर पहुंचने पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अन्य गणमान्य हस्तियों ने स्वागत किया। उसी साल पालम एयरपोर्ट चालू हुआ था।

जैक्लीन कैनेडी महात्मा गांधी की समाधि पर भी गईं थीं। उस समय खूबसूरत जैक्लीन कैनेडी मात्र 32 साल की थीं और उनकी शख्सियत भी अपने पति की तरह आकर्षक थीं। खैर, कोई वजह ही रही होगी कि कैनेडी अपनी पत्नी के साथ नहीं आ पाए। दिल्ली में जैक्लीन कैनेडी चाणक्यपुरी स्थित अमेरिकी एंबेसी में राजदूत के आवास में ठहरी। रूजवेल्ट हाउस कहा जाता है राजदूत आवास को। अमेरिका के 32 वें राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट के नाम पर है रूजवेल्ट हाउस है। रूजवेल्ट भी कभी भारत नहीं आए। वे भारत की आजादी को लेकर गंभीर थे। उन्हें महात्मा गांधी ने एक जुलाई 1942 को एक पत्र लिखकर कहा था कि वे युद्ध से घृणा करते हैं और ब्रिटेन को भारत से तत्काल अपना शासन हटा लेना चाहिए। उन्होंने लिखा था, भारत पर ब्रिटेन के शासन को नापसंद किया जाता है। इसलिए ब्रिटेन को भारत से तत्काल अपना शासन समाप्त कर देना चाहिए। इस पत्र को संदेशवाहक के रूप में गांधी जी के भावी जीवनीकार लई फिशर अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट के पास लेकर गए थे। रूजवेल्ट ने एक अगस्त 1942 को सकारात्मक जवाब दिया। गांधी जी ने पत्र इसलिए लिखा था ताकि वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर भारत को आजादी दिलवाने में मदद करेंगे। मतलब भारत छोड़ो आंदोलन से ठीक पहले गांधी जी अन्य विकल्पों को देख रहे थे। रूजवेल्ट ने आगे चलकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से कहा भी था कि वे भारत को स्वतंत्र करें।अमेरिकी राजदूत नियमित रूप से रूजवेल्ट हाउस में कला, साहित्य, विज्ञान और अन्य क्षेत्रों की हस्तियों को आमंत्रित करते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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