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प्रमोद जोशी का लेख : कोरोना में मीडिया की भूमिका

इस दौर में मीडिया पर जिम्मेदारी है कि वह पाठकों और दर्शकों को जानकारी दे। संकट से बाहर निकलने का विश्वास जगाए, गलतफहमियों को दूर करे।

प्रमोद जोशी का लेख : कोरोना में मीडिया की भूमिका

प्रमोद जोशी

कोरोना का संक्रमण जितनी तेजी से फैला है, शायद अतीत में किसी दूसरी बीमारी का नहीं फैला। इसी दौरान दुनिया में सच्ची-झूठी सूचनाओं का जैसा प्रसार हुआ है, उसकी मिसाल भी अतीत में नहीं मिलती। इस दौरान ऐसी गलतफहमियां सामने आई हैं। कुछ बेहद लाभ के लिए, कुछ राजनीतिक कारणों से, कुछ सामाजिक विद्वेष को भड़काने के इरादे से और कुछ शुद्ध कारोबारी लाभ या प्रतिद्वंद्विता के कारण। उदाहरण के लिए कोरोना संकट से लड़ने के लिए पीएम-केयर्स नाम से एक कोष बनाया गया, जिसमें पैसा जमा करने के लिए यूपीआई इंटरफेस जारी किया गया। देखते ही देखते सायबर ठग सक्रिय हो गए और उन्होंने उस यूपीआई इंटरफेस से मिलते-जुलते कम से कम 41 इंटरफेस बना लिए और पैसा हड़पने की योजनाएं तैयार कर ली। लोग दान करना चाहते हैं तो उस पर भी लुटेरों की निगाहें हैं।

यह ठगी है। आपको लूटने की कोशिश। पर शोर के दौर में जानकारियों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और झूठ को सच साबित करने और सच को झूठ साबित करने के प्रयत्न भी जारी हैं, जो ज्यादा बड़ी चिंता का विषय हैं। इस तोड़-मरोड़ के पीछे अलग-अलग किस्म के स्वार्थ और कारण हैं। मीडिया की भूमिका एक बार फिर से चिंता का विषय बनी है। इस दौरान वैश्विक मीडिया कम से कम तीन बड़े वर्गों में विभाजित हो गया है। एक प्रिंट मीडिया, दूसरा इलेक्ट्रॉनिक या टीवी और तीसरा सोशल मीडिया। इनकी तमाम धाराएं और उपधाराएं हैं। मोटे तौर पर प्रिंट की साख इनमें ज्यादा है, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की और सबसे खराब स्थिति सोशल मीडिया की है।

पिछले हफ्ते महाराष्ट्र के पालघर जिले से मॉब लिंचिंग की एक खबर आई। एक भीड़ ने दो साधुओं और एक ड्राइवर को पीट-पीटकर मार डाला। पुलिस तमाशबीन बनी देखती रही। इस हत्याकांड के पीछे वॉट्सएप और दूसरे सोशल मीडिया के मार्फत भेजे गए संदेशों की भूमिका थी। लोगों को गलतफहमी थी कि ये लोग बच्चों का अपहरण करने वाले हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस इलाके में बच्चों के गायब होने की कोई घटना घटित नहीं हुई है। दूसरे लॉकडाउन के दौरान भारी भीड़ का जमा होना भी विस्मय का कारण बना।

इसके पहले लॉकडाउन की शुरुआत तबलीगी जमात के प्रसंग से हुई थी। तबलीगी जमात का मामला तब सामने आया, जब लॉकडाउन के बाद दिल्ली के जमात मुख्यालय में बड़ी संख्या में एकत्र लोगों का मामला सामने आया। उससे पहले तेलंगाना और तमिलनाडु में संक्रमण के कुछ मामले सामने आए थे, जो तबलीगी जमात के कार्यक्रम से जुड़े थे। जमात प्रकरण ने कोरोना की मीडिया कवरेज को एक नया आयाम दिया। जब से कोरोना का संक्रमण शुरू हुआ था, टेलीविजन की बहसों के स्वर सौम्य थे। उसमें शामिल होने वाले लोग ज्यादातर चिकित्सा विज्ञान से जुड़े थे या जन चेतना के वाहक थे। इनके बीच असहमतियां होती भी हैं, तो उन्हें व्यक्त करने के तरीके सौम्य होते हैं।

करीब एक महीने तक टीवी के सौम्य और शालीन माहौल के बाद तबलीग प्रसंग के बाद अचानक मीडिया पर तिलक चंदन और दाढ़ी वाले फिर से प्रकट हो गए। बीमारी किनारे चली गई और विद्वेष की बातें फिर से होने लगीं। बेशक तबलीग ने गैर-जिम्मेदारी का परिचय दिया था, पर इसका दोष मुस्लिम समुदाय पर डालना उचित नहीं है। इंदौर, लखनऊ और मुरादाबाद में चिकित्सा कर्मियों पर हमलों की खबरें आने लगीं। माहौल बिगड़ने लगा। सच यह है कि यह बीमारी सभी समुदायों और सम्प्रदायों के लिए समान संकट के रूप में आई है। इसका सामना हमें मिलकर करना है।

तबलीग के बाद पालघर प्रसंग ने आग में घी का काम किया। अचानक हमारी प्राथमिकताएं बदल रही हैं। ऐसे मौके पर मीडिया को अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। साम्प्रदायिक वैमनस्य का लाभ लेने वाली शक्तियां कई शक्लों में हमारे बीच हैं। विडंबना है कि राजनीति के घुन को इस मौके पर नई फसल के गेहूं में भी स्वाद लेने लायक चीजें नजर आने लगी हैं। आप चैनलों पर नजर रखें तो पाएंगे कि सबकी दिलचस्पी अपने बढ़ते टीआरपी को प्रदर्शित करने में होती है। टीआरपी मायने शोर, हंगामा और सनसनी। दुर्भाग्य से इस मौके पर भी मीडिया ने अपने लिए मौके तलाश लिए। आप ज्यादातर चैनलों को ध्यान से देखें। एंकरों के बीच चीखने-चिल्लाने की प्रतियोगिता है। मामूली सी बात को भी नाटकीय बनाने पर जोर है। यह पत्रकारिता नहीं है। अफसोस यह बात माडिया-संचालकों को समझ में नहीं आती।



इस दौर में मीडिया पर जिम्मेदारी है कि वह पाठकों और दर्शकों को जानकारी दे। उन्हें रास्ते बताए। संकट से बाहर निकलने का विश्वास जगाए, गलतफहमियों को दूर करे। दुर्भाग्य से तमाम लोग नहीं जानते हैं कि कोरोना का निदान कैसे होता है। आरटी-पीसीआर और रैपिड टेस्ट में अंतर क्या है। एंटीबॉडी चिकित्सा क्या है वगैरह। इन मामलों में जानकारी का अभाव हमारे देश में ही नहीं दुनिया भर में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फरवरी में एक नए सूचना प्लेटफॉर्म डब्लूएचओ इनफॉर्मेशन नेटवर्क फॉर एपिडेमिक्स का उद्घाटन किया। इस मौके पर डब्लूएचओ के डायरेक्टर जनरल टेड्रॉस गैब्रेसस ने कहा, बीमारी के साथ-साथ दुनिया में गलत सूचनाओं की महामारी भी फैल रही है। हम केवल महामारी से नहीं इंफोडेमिक से भी लड़ रहे हैं।

कोरोना से जुड़ी जानकारियां भय पैदा कर रही हैं। पर हमें सच का सामना करने की ताकत चाहिए। डर पर जीत पाने की जरूरत भी हमें है। पर झूठी सूचनाओं से भय पैदा करना भी तो गलत है। जिन दिनों भारत में लॉकडाउन की शुरूआत हो रही थी, एक खबर बड़ी तेजी से सोशल मीडिया पर प्रकट हुई। खबर यह थी कि कोरोना वायरस भारत में करीब 40 करोड़ लोगों को संक्रमित करेगा। यानी कि सबसे बड़ा खतरा भारत के सामने है। खबर का महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इस रिपोर्ट के साथ सेंटर फॉर डिजीज डायनैमिक्स इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (सीडीडीईपी) हॉपकिंस यूनिवर्सिटी का लोगो लगाया गया था। इस संस्थान की वैश्विक साख है। इस खबर को देश के महत्वपूर्ण संस्थानों ने बगैर पुष्टि किए उठाया। बाद में बता लगा कि यह खबर फर्जी थी। मामला दब गया, पर इससे मीडिया की साख को भारी धक्का लगा। इस बात की अनदेखी कर दी गई। जरूरत इस बात की है कि ऐसी बातों की अनदेखी न होने पाए।

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