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म्यांमार को खुद ही निकालना होगा रोहिंग्या मुसलामानों का हल, ये है वजह

पीएम ने ऑन्ग सान सू की के साथ वार्ता में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान संकट पर चिंता जताई।

म्यांमार को खुद ही निकालना होगा रोहिंग्या मुसलामानों का हल, ये है वजह
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भारत और म्यांमार के रिश्ते हमेशा मधुर रहे हैं। भारत के लिए सामरिक व रणनीतिक दृष्टि से म्यांमार अहम है। दोनों देशों की 1,640 किलोमीटर की लंबी सीमा है। पूर्वी एशिया में म्यांमार ही भारत का प्रवेश द्वार है। इस मायने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली द्विपक्षीय म्यांमार यात्रा का काफी कूटनीतिक महत्व है।

हाल के वर्षों में चीन ने जिस तरह म्यांमार में अपनी उपस्थिति बढ़ाई है, उसको देखते हुए वहां भारत को अपना दबदबा कायम रखना जरूरी है। चीन भारत के सभी पड़ोसी देशों में अपनी पकड़ मजबूत बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

मोदी ने चीन यात्रा के बाद म्यांमार की यात्रा कर कूटनीतिक संदेश भी दिया है कि भारत अपने इस रणनीतिक पड़ोसी को काफी महत्व देता है। मोदी की इस यात्रा के दौरान भारत-म्यांमार के बीच 11 करार हुए हैं।

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जिसमें समुद्री सुरक्षा, आईटी स्किल, हेल्थ, दवा, चुनाव आयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, प्रेस व पुलिस संबंधित समझौते शामिल हैं। दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा करार चीन पर नजर रखने के लिहाज से अहम है। इससे भारत को लाभ होगा।

पीएम मोदी की नेपीतॉ यात्रा उस समय हुई है जब म्यांमार रोहिंग्या मुसलमान संकट का सामना कर रहा है। पीएम ने ऑन्ग सान सू की के साथ वार्ता में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान संकट पर चिंता जताई। उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के खिलाफ एक्शन में भारत म्यांमार के साथ खड़ा है।

म्यांमार में रोहिंग्या की आबादी करीब 11 लाख है। इतिहासकारों के मुताबिक रोहिंग्या म्यांमार में 12वीं सदी से रहते आ रहे मुस्लिम हैं, जबकि म्यांमार की सरकार रोहिंग्या को राज्य-विहीन मानती है और उन्हें नागरिकता नहीं देती, बस पहचान पत्र देती है।

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ताजा हिंसा गत 25 अगस्त को भड़की है। म्यांमार के उत्तर-पश्चिमी राज्य रखाइन में रोहिंग्या घुसपैठियों ने दर्जनों पुलिस पोस्ट और एक आर्मी बेस पर हमला किया। म्यांमार सरकार और सेना इसे आतंकी हमला बता रही हैं और आतंकवाद के खिलाफ अभियान चला रही है।

इसमें अब तक करीब 400 रोहिंग्या मारे जा चुके हैं। रोहिंग्या इसे अपने ऊपर जुल्म बता रहे हैं और जान बचाने के लिए दूसरे देश भाग रहे हैं। रोहिंग्या मुद्दा भारत के लिए अहम इसलिए है, क्योंकि वे यहां शरणार्थी बन कर आ रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिफ्यूजी एजेंसी के मुताबिक अब तक 40 हजार से ऊपर रोहिंग्या जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, यूपी और राजस्थान में शरण लिए हुए हैं। वे भारत सरकार से शरण की मांग कर रहे हैं। उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका तक दायर कर दी है।

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जिसमें रोहिंग्या मुस्लिमों के प्रस्तावित निष्कासन को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत चुनौती दी है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 11 सितंबर को होनी है।

भारत शरण देने में उदार रहा है। भारत में शरण पाने वालों में तिब्बती, बांग्लादेश के चकमा, अफगानी और श्रीलंका के तमिल शामिल रहे हैं। लेकिन भारत आतंकवाद के खिलाफ सख्त है। रोहिंग्या पर आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोप हैं,

इसलिए भारत उसे शरण देकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता है और उन्हें वापस भेजना चाहता है। रोहिंग्या मसले का हल म्यांमार को ही निकालना चाहिए। आंग सान सू की ने कहा है कि म्यांमार रोहिंग्या के अधिकारों की रक्षा करेगी। इसमें संयुक्त राष्ट्र को दखल देना चाहिए।

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