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सीबीआई के शिकंजे में लालू का कुनबा, गरमाई राजनीति

लालू अपने कुनबे समेत भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के दलदल में धंसते जा रहे हैं।

सीबीआई के शिकंजे में लालू का कुनबा, गरमाई राजनीति

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और रेल मंत्री रहे लालूप्रसाद यादव एक बार फिर सीबीआई के शिकंजे में हैं। लालू जब चारा घोटाले के मामले में अदालत में पेशी की तैयारी में थे, तभी उनके पटना स्थित आवास समेत 12 स्थलों पर सीबीआई के दस्तों ने दस्तक दी। यह छापामारी एक नए मामले में की गई है।

इस बार लालू पर आरोप है कि उन्होंने रेल मंत्री रहने के दौरान भ्रष्टाचार का जाल रचा। 2006 में टेंडर में गड़बड़ी कर रांची और पुरी स्थित रेलवे के दो होटल निजी कंपनी को पट्टे (लीज) पर दे दिए। इस मामले में लालू, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटे तेजस्वी यादव समेत आठ लोगों पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया है।

लालू ने अपनी प्रकृति के मुताबिक इस कार्रवाई को उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश बताई है। बहरहाल लालू कुछ भी कहें, फिलहाल वे बड़ी मुसीबत में घिर गए हैं। लालू अपने कुनबे समेत भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के दलदल में धंसते जा रहे हैं। सब जानते हैं कि लालू परिवार बड़ी राजनीतिक हैसियत रखता है।

लालू हमेशा भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध उग्र तेवर दिखाते रहे हैं। इस वजह से उनकी कोशिश है कि भ्रष्टचार से कमाई नामी-बेनामी संपत्ति को इस आधार पर बचा लें कि वे मोदी विरोधी हैं, इसलिए उन पर सीबीआई के जरिए शिकंजा कसा जा रहा है, लेकिन अवैध तरीके से की गई काली कमाई के दस्तावेजी जंजाल में वे इतने कस गए हैं कि इस चुनौती से वे अब कानूनी प्रक्रिया से ही गुजरकर बच सकते हैं।

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चूंकि बिहार के उपमुख्यमंत्री और उनके बेटे तेजस्वी यादव पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है, इसलिए अब तेजस्वी के पद पर बना रहना मुश्िकल होगा। लालू के नेतृत्व में राष्ट्रीय फलक पर जिस महागठबंधन की उम्मीद की जा रही थी, उसका भी अस्तित्व में आना अब मुश्िकल है।

इसके पहले उनके पूरे कुनबे पर बेनामी संपत्ति अर्जित करने के काले बादल गहराए हुए हैं। राजद प्रमुख लालू यादव वंश पर आयकर विभाग ने लगभग 1,000 करोड़ की बेनामी संपत्ति होने का दावा किया है। इसमें से बड़ी कार्रवाई करते हुए 175 करोड़ की संपत्ति जब्त भी कर ली है।

इसी सिलसिले में पहली कार्रवाई दिल्ली के दो व्यापारियों के 8000 करोड़ की मनी लाॅड्रिंग मामले में मीसा भारती के सीए राकेश अग्रवाल को गिरफ्तार किया गया था। इन कार्रवाइयोंं से लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेनामी संपत्ति के खिलाफ चलाई गई मुहिम रंग ला रही है।

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इस बाबत बेनामी संपत्ति से संबंधित जो नए कानून वजूद में आए हैं, उन्होंने साबित किया है कि अब सरकारी एजेंसियों को बड़े लोगों पर हाथ डालने का अधिकार मिल गया है। किसी बड़े नेता के कुनबे की इतनी बड़ी मात्रा में संपत्ति शायद पहली बार ही जब्त हुई है।

इसमें उनकी पत्नी राबड़ी देवी, सांसद बेटी मीसा भारती, उनके पति शैलेश, दो अन्य बेटियां रागिनी, चंदा, बेटे तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए आॅपरेशन क्लीन मनी की समीक्षा करते हुए राजस्व विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया था, कि वे बेनामी संपत्ति रखने वाले लोगों के खिलाफ कार्यवाही में तेजी लाएं।

मोदी की इस मंशा से साफ था कि वे कालाधन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐसी कार्रवाई के पक्ष में हैं, जिससे बेनामी संपत्ति रखने वाले लोग कानूनी शिकंजे में आ जाएं। दरअसल कर चोरी, भ्रष्टाचार से पैदा किया कालाधन ऐसा धन है, जो बेनामी संपत्तियों में सबसे ज्यादा खपाया गया है।

वह लेन-देन बेनामी होता है, जिसमें पैसा कोई और लगाता है और उस पर नाम किसी दूसरे का होता है। काले कुबेर बड़े पैमाने पर संपत्तियों की खरीदी व बैंकों की एफडी के लिए यही तरीका अपनाकर कदाचरण से कमाए धन को ठिकाने लगाने के साथ कर चोरी करते हैं। इसके लिए बेनामी लेन-देन अधिनियम 1988 में ही बन गया था, लेकिन अधिसूचित नहीं हो पाया था।

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मोदी सरकार ने 13 मई 2016 को इसमें संशोधन कर संपत्ति जब्ती, सजा व जुर्माने का कठोर प्रावधान किया है। एक नवंबर 2016 से यह कानून अमल में भी आ गया। गोया, लालू कुनबे की मुश्िकलें बढ़ गई हैं। इस मामले में बेनामी संपत्ति पर जिस तरह से प्रहार हुआ है, यह एक नजीर बनेगा।

कालेधन पर अंकुश पर यह एक बड़ा उपाय है। इस दृष्िट से उन लोक कल्याणकारी कथित ट्रस्टों पर भी चोट करनी होगी, जो हजारों एकड़ जमीन के मालिक हैं। देश के जितने भी पूर्व सामंत हैं, उनके ट्रस्टों के पास शहरों में कई एकड़ भूमि हैं।

इनकी वर्तमान कीमत अरबों रुपये है। इनमें से ज्यादातर अचल संपत्तियां ऐसी हैं, जो रियासतों के विलय के समय राज्य सरकारों की संपत्ति घोषित हो गई थीं, किंतु बाद में जब ये सामंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया के चलते सांसद व विधायक बनकर सत्ता के अधिकारी हुए तो इन्होंने दस्तावेजों में हेराफेरी कराकर इन जमीनों पर फिर से अपना मालिकाना हक हासिल कर लिया।

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चूंकि इनमें से ज्यादातर जमीनें शहरी विस्तार के चलते बीच में आ गई हैं, इसलिए इनका मूल्य तो बढ़ा ही, ये आवासीय काॅलोनियों में भी तब्दील की जाने लगी हैं। यह कच्चा-चिट्ठा खंगाला जाता है तो इसे खंगालने की शुरुआत रियासतों के विलय-वर्ष 1954-1956 से हो क्योंकि विलय के पहले दस्तावेज इन्हीं वर्षों में तैयार हुए थे।

कुछ इसी तरह के संकेत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चौहान ने ज्योतिरादित्य सिंधिया पर शिवपुरी में 700 एकड़ जमीन हड़पने के लगाए हैं। हमें ज्ञात है कि गांधी की स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई सिर्फ सत्ता हस्तांतरण के लिए नहीं थी, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन ही उनका मुख्य लक्ष्य था।

दरअसल अंग्रेजों ने जो प्रशासनिक व राजनीतिक व्यवस्था बनाई थी, वह भारतीयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाए रखकर उन पर राज करने की थी। इसी क्रम में अंग्रेजों ने 1935 में भारत शासन अधिनियम के तौर पर ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जो ‘बांटों और राज करो‘ के कुटिल सिद्धांत पर आधारित थी।

इन व्यवस्थाओं का शासक व्यक्ति समानता व समरसता को तोड़ने की कमजोरियों के चलते बेहद शक्तिशाली और निरकुंश हो जाता है। यही वजह है कि प्रजातांत्रिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद जो भी व्यक्ति सत्ता का हिस्सा बनता है, वह अंग्रेजी हुकूमत का व्यवहार अपनी ही प्रजा से करने लगता है।

अगर भ्रष्टाचार से छुटकारा मिल जाता है तो देश के सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, संचार, आवास और बिजली-पानी जैसी सुिवधाओं को धन की कमी नहीं रहेगी। बेनामी संपत्ति पर लगाम लगती है तो मोदी सभी गरीबों को अपने घर का जो सपना दिखा रहे हैं, वह साकार हो जाएगा।

साथ ही, जरूरत यह भी है कि नेताओं के विरुद्ध बदले की भावना से कार्रवाई न हो। बहरहाल केंद्र सरकार ने कालाधन और बेनामी संपत्ति के खिलाफ जो सिलसिला शुरू किया है, यही वे उपाय हैं, जो संविधान में दर्ज समानता के अधिकार का पर्याय बनेंगे।

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