Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

प्रो. रणबीर सिंह का लेख: हरियाणा में राजनीतिकरण की प्रकिया का उदय

1909 के मिंटो मोरले सुधारों को जब कांग्रेस की भारतीयों को परिषदों में भागीदारी की मांग को स्वीकार करते हुए जब पंजाब विधान परिषद के चुनाव करवाये गए तो भार्गव नगरपालिकाओं के चुनाव क्षेत्र से और लाल चंद जिला बोर्डों के चुनाव क्षेत्र से दल के सदस्य चुने गए थे। दोनों ने भी परिषद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हरियाणा शिक्षा बोर्ड ने लिया बड़ा फैसला, शिक्षक घर से ही करेंगे 10वीं कॉपियों की जांच
X

मेयो प्रस्ताव, 1870 द्वारा स्थापित नगरपालिकाओं और रिपन प्रस्ताव 1852 के आधार पर गठित जिला बोर्डों की स्थापना से पूर्व के हरियाणा क्षेत्र में, जिसे उन दिनों दक्षिणी पंजाब की संज्ञा दी जाती थी, शहरी क्षेत्रों की बाकी संख्या पर व्यापारी वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत ग्राम पंचायतों का तथा खाप पंचायतों का प्रभुत्व था। किंतु प्रांतीय सरकार की 1857 के विद्रोह से चरमराई अर्थव्यवस्था का भार घटाने और स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित उन संस्थाओं में एक नया अभिजन वर्ग उभरा जो िक नव शिक्षित वर्ग से संबंधित था। हिसार के जवाहर लाल भार्गव और रोहतक के चौधरी लाल चंद इसी वर्ग से थे।

1909 के मिंटो मोरले सुधारों को जब कांग्रेस की भारतीयों को परिषदों में भागीदारी की मांग को स्वीकार करते हुए जब पंजाब विधान परिषद के चुनाव करवाये गए तो भार्गव नगरपालिकाओं के चुनाव क्षेत्र से और लाल चंद जिला बोर्डों के चुनाव क्षेत्र से दल के सदस्य चुने गए थे। दोनों ने भी परिषद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु लालचंद का योगदान तो एेतिहासिक रहा। मोनटेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार लागू करने के लिए भारतीय राज्य अधिनियम (1919) के द्वारा जब प्रांतों में दोहरा शासन स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हुई तो लालचंद ने मुस्लिम, हिंदू और सिख चुनाव क्षेत्रों को ग्रामीण और शहरी में बांटने की प्रक्रिया में अति महत्वपूर्ण योगदान दिया। यही बांट 1921 के पंजाब विधानपरिषद चुनाव में एक ग्रामीण पार्षदों का समूह उभारने में सफल रही। इन्होंने 1921 में ग्रामीण क्षेत्रों से चुने पार्षदों को संगठित किया। इन्होंने 1923 में मुस्लिम ग्रामीण नेता फजले हुसैन और छोटूराम के नेतृत्व में युनियननिस्ट पार्टी बनाई जिसे जमीदार लीग के नाम से भी जाना जाता था। इसी के प्रतिनिधि लालचंद को 1923 में पंजाब सरकार में मंत्री बनाया गया था। जैलदार मातूराम (सांघी) की चुनाव याचिका स्वीकार हो जाने के बाद लालचंद को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था और उनके स्थान पर ही छोटूराम को मंत्री बनाया गया था।

इसी के बाद युनियननिस्ट पार्टी ने ग्रामीण शहरी, व्यापारी, किसान और साहूकार-कर्जदार के मुद्दों के आधार पर पंजाब के मतदाताओं की लामबंदी की थी। हरियाणा में छोटूराम ने अपने साप्ताहिक जाट गजट और जमींदार लीग तथा जाट पक्ष के माध्यम से इस क्षेत्र में कांग्रेस को इस तथ्य के बावजूद हाशिये पर लगा दिया था कि आर्य समाज के प्रभाव के कारण यहां कांग्रेस के नेतृत्व में रौलट एक्ट के विरूद्ध व्यापक हड़तालें हुईं थीं। गौरतलब है कि छोटूराम 1916 में रोहतक जिला कांग्रेस कमेटी के प्रधान थे। लेकिन महात्मा गांधी के सहयोग आंदोलन के समय उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। क्योंकि वे भूमि का लगान न देने के महात्मा गांधी के नारे को उस भूमिपति किसान वर्ग के लिए घातक मानते थे जिसके वे प्रतिनिधि थे।

1923 से 1946 तक के समय में हरियाणा में युनियननिस्ट पार्टी का प्रमुख रहा क्योंकि छोटू राम इस क्षेत्र में हिंदू-मुिस्लम, सिख और भूमिपति किसान वर्ग को इस दल के समर्थन में संगठित करने में सफल रहे थे। उन्होंने जाटों, राजपूतों और रोड़ों को ग्रामीण शहरी, किसान, व्यापारी, कर्जदार, साहूकार के मुद्दों पर संगठित करने में सफलता पाई क्योंकि उन्होंने केवल कर्ज माफी के कानून बनाए बल्कि ग्रामीण क्षेत्र और कृषि के विकास को प्राथमिकता भी दी थी। इतना ही नहीं नौकरियों में भर्ती भी कृषकों और गैर कृषकों की संख्या के आधार पर बांट करके करवानी शुरू की जिससे इन जातियों के पढ़े-लिखे वर्ग को प्राथमिकता मिलने लगी। लेकिन 1946 के पंजाब विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने इसका सफाया कर दिया क्योंकि 1945 में चौधरी छोटूराम की मृत्यु के बाद युनियननिस्ट पार्टी हरियाणा में नेतृत्व विहीन हो गई थी।

दूसरे स्वतंत्रता के सुनिशिचत हो जाने के बाद और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के कारण और 1940 में शुरू हुए पाकिस्तान के आंदोलन ने भी इस क्षेत्रीय दल को अप्रासांगिक बना दिया। सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी के जवानों में लौटे सैनिकों का भी इस प्रसंग में उल्लेखनीय भूमिका रही। अपने वंशकाल में शुरू हुई हरियाणा की राजनीति का वह युग समाप्त हो गया जिसे 1900 में अंग्रेजों के द्वारा कृषक-गैर कृषक जातियों की बांट, नगरपालिकाओं और जिला बोर्डों के निर्माण, आर्य समाज की भूमिका, प्रथम महायुद्ध के बाद उभरे सैनिक वर्ग और 1911 में दिल्ली के राजधानी बनने के बाद उभरे पढ़े लिखे वर्ग ने शुरू किया था।

Next Story