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पी.के. आर्य का लेख : स्वर्णिम अतीत का अभ्युदय

कांग्रेसी सरकारों द्वारा एक निश्चित उद्देश्य की प्रतिपूर्ति करने के लिए मंदिरों द्वारा अर्जित धन को हड़पने और उन्हें गैर धार्मिक कार्यों में व्यय करने का अभियान चारों खाने चित्त हो गया है। कोर्ट ने इनके मंसूबों पर पानी फेर दिया है। भगवान विष्णु को समर्पित श्री पद्मनाभ मंदिर के लिए आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से देश के अनेक मंदिरों के लिए पुनरोत्थान के मार्ग प्रशस्त होंगे। स्वर्णिम अतीत के इस अभ्युदय से भारत के मौलिक प्राणों को बल मिलेगा।

पी.के. आर्य का लेख : स्वर्णिम अतीत का अभ्युदय
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पी.के. आर्य

भारत की सत्य सनातन परंपरा पर कुठाराघात करने वाले षड्यंत्र रूपी शस्त्र, सोमवार को सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए निर्णय से एक बार फिर भोथराकर धूल धुसरित हो गए हैं। दक्षिण भारत के अतिप्रतिष्ठित स्वामी पद्मनाभ मंदिर के स्वामित्त्व और पूंजी पर मालिकाना हक को लेकर राजपरिवार की विजय ने एक बार पुनः यह सिद्ध किया है कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। कांग्रेसी सरकारों द्वारा एक निश्चित उद्देश्य की प्रतिपूर्ति करने के लिए मंदिरों द्वारा अर्जित धन को हड़पने और उन्हें गैर धार्मिक कार्यों में व्यय करने का अभियान चारों खाने चित्त हो गया है। भगवान विष्णु को समर्पित श्री पद्मनाभ मंदिर के लिए आए इस निर्णय से देश के अनेक मंदिरों के लिए पुनरोत्थान के मार्ग प्रशस्त होंगे। स्वर्णिम अतीत के इस अभ्युदय से भारत के मौलिक प्राणों को बल मिलेगा।

इस मंदिर का निर्माण 1400 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत के त्रावणकोर राजाओं ने किया था। आदि शंकराचार्य द्वारा इस मंदिर में साधना के उल्लेख मिलते हैं। 9वीं शताब्दी के बाद रचित अनेक ग्रंथों में इस मंदिर की महत्वता का वर्णन है। इस मंदिर के विषय में 11वीं शताब्दी में एक वक्तव्य अतिप्रचलित था कि दुनिया में कुल स्वर्ण भंडार का एक चौथा हिस्सा इस मंदिर में संरक्षित है। त्रावणकोर राजघरानों ने भगवान पद्मनाभ स्वामी को अपना जीवन और संपत्ति सब कुछ सौंप दिया था। वर्ष 1750 में सम्राट मार्तंड वर्मा ने स्वयं को पद्मनाभ का दास घोषित करके पूरे कुल कुटुंब के साथ मंदिर की सेवा में सबको समर्पित कर दिया था। इसके बाद से मंदिर की पूर्ण देखरेख राजघराने के सदस्यों द्वारा ही की जाती रही है। मान्यता थी कि राजघराने का कोई भी सदस्य मंदिर से एक कण भी अपने साथ नहीं ले जाएगा। इसका पूर्ण ईमानदारी से पालन होता रहा है। आपको आश्चर्य होगा कि राजघराने के सदस्य आज भी मंदिर से जब बाहर जाते हैं तो अपने पांव पायदान से पौंछकर ही बाहर निकलते हैं ताकि मंदिर का एक कण भी उनके साथ न आ जाए।

एक षड्यंत्र के तहत केरल हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 में स्वामी पद्मनाभ मंदिर की सभी सम्पत्तियों और प्रबंधन पर राज्य सरकार को नियंत्रण में लेने का आदेश दिया था। इस आदेश को त्रावणकोर के राजपरिवार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, सोमवार को कोर्ट ने मंदिर के प्रबंधन का अधिकार पुनः राजा मार्तण्ड वर्मा के परिवार को दे दिया है। इस कालखंड में इस परिवार को बहुत यातनाएं और मानसिक प्रताड़नाएं सहनी पड़ी। त्वदीयाय वस्तु गोविंद, तुभ्यमेव समर्पये और येन केन हिन्दू पर कब्जा गिरोह के बीच के इस युद्ध में जब जगत्स्वामी ने इन्हें विजय दिलवाई, ये अपने आंसू रोक नहीं सके ! ईश्वर ने फिर से इन्हें अपना माध्यम बनाया। पीढ़ियों से मंदिर और कोष की सुरक्षा की है उन्होंने। ये भलीभांति जानते हैं कि अपना धन जैसा कुछ नहीं होता। जनता का, जनता के लिए, समाज की समष्टि में व्यक्ति की व्यष्टि का विलय करना चाहिए, इसी भाव से शुद्ध हृदय से सींचा है उन्होंने। फिर इतना अधिकार तो उनका बनता ही है।

पद्मनाभ मंदिर में 11 तहखानों के उल्लेख मिलते हैं जिनमें से सिर्फ सात ही ऐसे हैं जिनमें व्यक्तियों का प्रवेश हो सकता है। सरकार द्वारा अब तक छह तहखानों को खोला जा चुका है। जिनसे अब तक एक लाख 32 हजार करोड़ की संपत्ति प्राप्त हुई है। इनमें साढ़े तीन फुट की भगवान विष्णु की शुद्ध स्वर्ण से निर्मित हीरों से जड़ी एक मूर्ति प्राप्त हुई थी। यही नहीं 18 फुट लंबी एक सोने की भारी चैन और बहुमूल्य रत्न जवाहरात भी बरामद हुए थे। मंदिर के तहखानों में से सातवां द्वार सर्वाधिक रहस्य को समेटे है। इसके द्वारों पर वासुकि नाग की आकृतियां उत्कीर्णित हैं, जब इसे खोलने की कोशिश की गई, वहां काम कर रहे मजदूर बीमार होते गए अंततः इसे खोलने का विचार स्थगित कर दिया गया। इस के एक कोने में सुराख होने पर जब वहां से किसी ने झांक कर देखा तो पूरा तहखाना पीले प्रकाश से चकाचौंध था। इससे अनुमान लगाया गया कि मंदिर की सर्वाधिक कीमती चीजें इसी कक्ष में संरक्षित हैं।

सैंकड़ों साल से बंद यह खजाना अभी खोला नहीं गया है। इसके साथ जुड़े अपशकुनों के कारण इस तहखाने को शापित माना जाता रहा है। लगभग पचास वर्ष पूर्व एक व्यक्ति ने इस तहखाने को खोलने की कोशिश की थी, लेकिन जहरीले नागों द्वारा डसने से उसकी मृत्यु हो गई। इस तहखाने का मुख्य द्वार चांदी और सफेद लोहे से निर्मित है। जिस पर दो नाग बने हैं। मान्यता है कि वही इस खजाने की रक्षा करते हैं। इस दरवाजे में कोई मूसला या कुंडी सांकल नहीं है। कहा जाता है कि इस दरवाजे को नागबंधम या नागपाशम मन्त्रों से अभिमंत्रित करके कीला गया है। इस तरह के प्रयोग नागवंशी साधक अथवा विष्णु कुल अथवा शिव शाक्त साधक ही जानते हैं।

इस तहखाने को गरुड़ तारम्य तंत्र के मंत्रोच्चार द्वारा ही खोला जा सकता है। मन्त्र में जरा सी भी त्रुटि करने वाले की मृत्यु निश्चित है। अभी तक कोई सिद्ध साधक नहीं मिलने से इस सातवें द्वार को खोला नहीं जा सका है। माना जाता है कि इस मंदिर में दो लाख करोड़ से अधिक मूल्य के आभूषण और कीमती धातुएं हैं। इतिहासकार इससे भी अधिक मूल्य की सम्पदा होने का अनुमान लगाते हैं।

मुस्लिम आक्रमणकारी की भी दक्षिण भारत के मंदिर सदैव लूटे जाने की इच्छा रही है, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके। अंग्रेजी शासन काल में भी इस तरह के मंदिरों को अपने नियंत्रण में लिए जाने की कोशिशें होती रहीं, लेकिन स्थानीय लोगों की आस्था और एकजुटता ने उनके मंसूबों पर सदैव पानी फेर दिया।

1951 में पंडित नेहरू की कांग्रेसी सरकार द्वारा हिन्दू दान धर्म एक्ट पास किया गया। इस एक्ट में प्रावधान किया गया था कि राज्य सरकार किसी भी मंदिर को अपने अधीन कर सकती है। इस एक्ट के पारित होने के बाद आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा 34 हजारर मंदिरों को अपने अधीन कर लिया गया। यही नहीं कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा और तमिलनाडु में भी इसी योजना के तहत मंदिरों को सरकारों ने अपने अधीन कर लिया। इसके बाद शुरू हुआ मंदिरों में चढ़ावे को हड़पने का षड्यंत्र जिसके तहत मंदिरों में हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा दिया गया धन अपरोक्ष रूप से सरकारों ने अपने खजाने में भरना शुरू किया।

उदाहरण के लिए तिरुपति बाला जी मंदिर की वार्षिक आय 3500 करोड़ रूपये है। बैंक से आने वाली दो गाड़ियां प्रतिदिन मंदिर में आने वाले चढ़ावे को मंदिर से ले जाती हैं। इस रकम में से सिर्फ सात प्रतिशत ही मंदिर की देखरेख को वापस दिया जाता है। यही नहीं आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी ने तिरुपति पर्वत माला की सात पहाड़ियों में से पांच को सरकार को देने का आदेश दिया था। यहां चर्च निर्माण का प्रस्ताव था। इन समस्त मंदिरों से प्राप्त आय को गैर हिन्दू कार्यों में व्यव किया जाता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक में यही हो रहा है। मंदिरों से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल मस्जिदों और चर्चों में किया जा रहा है। मंदिरों के फंड में भ्रष्टाचार का आलम ये है कि कर्नाटक के 2 लाख मंदिरों में लगभग 50,000 मंदिर रखरखाव के अभाव के कारण बंद हो गए हैं।

किसी भी लोकतंत्रिक देश में धार्मिक संस्थानों को सरकारों द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाता है, लेकिन भारत में ऐसा होता रहा है। सरकारों ने मंदिरों को अपने कब्जे में इसलिए किया क्योंकि उन्हें पता है कि मंदिरों के चढ़ावे से सरकार को काफी फायदा हो सकता है। लेकिन, सिर्फ मंदिरों को ही कब्जे में लिया जा रहा है। मस्जिदों और चर्च पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। इतना ही नहीं, मंदिरों से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल मस्जिद और चर्च के लिए किया जा रहा है। इन सबका कारण अगर खोजें तो 1951 में पास किया हुआ कांग्रेस का वो बिल है। वक्त की जरूरत है कि हिन्दू मंदिर एक्ट बनाए जाने की मांग करनी चाहिए। गुरुद्वारा एक्ट की तर्ज पर हिन्दू मंदिर एक्ट बनाया जाने की जरूरत है।

श्री पद्मनाभ मंदिर और श्री राम जन्मभूमि मंदिर पर देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए ये निर्णय कालजयी हैं। इन फैसलों से उत्तर से दक्षिण तक आस्था और सत्य की एक ऐसी शुभ्र रेखा प्रदीप्त हुई है जो मानो प्रभु की ओर से यह कह रही है कि इस काल में अब मेरे निर्णय मेरे ही अनुसार होंगे।

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