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अवधेश कुमार का लेख : चुनाव परिणामों की प्रतिध्वनि

चुनाव परिणामों ने पहले से हताश और अपने भविष्य को लेकर उद्विग्न कांग्रेस के नेताओं के चिंता बढ़ा दी है। सोनिया गांधी परिवार और राहुल गांधी के राजनीतिक नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न उठाने वालों के स्वर आने वाले समय में मुखर होंगे। केरल से सांसद राहुल गांधी अगर पूरी ताकत लगाकर भी परंपरा के अनुसार गठबंधन को सत्ता तक पहुंचाने में कामयाब नहीं हुए। आखिर केरल और असम में राहुल और प्रियंका के अलावा कांग्रेस के बड़े नेता प्रचार में नहीं देखे गए। तो जो कुछ भी हुआ उसकी जिम्मेदारी तो अंततः और राहुल के सोनिया परिवार के ही सिर आएगी। परिणाम यहीं तक सीमित नहीं है। इसकी प्रतिध्वनियां आने वाले समय में कई स्तरों पर सुनाई देंगी।

अवधेश कुमार का लेख : चुनाव परिणामों की प्रतिध्वनि
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अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

चार राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव नतीजों का विश्लेषण हम सबके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यह विश्लेषण स्थितियों, कारकों का सरलीकरण होगा कि तमिलनाडु और केरल के परिणाम तो बिल्कुल अपेक्षित हैं। इसमें दो राय नहीं कि ज्यादातर चुनाव विश्लेषकों ने केरल में वाम मोर्चे की सत्ता कायम रहने तथा तमिलनाडु में द्रमुक गठबंधन के सत्ता में वापसी की भविष्यवाणी की थी। स्थानीय रिपोर्टें भी बता रहीं थी की केरल हर पांच वर्ष पर सत्ता बदलने की परंपरा को इस बार तोड़ेगा। तमिलनाडु में ना अन्नाद्रमुक सरकार के विरुद्ध व्यापक माहौल था और न द्रविड़ के पक्ष में। बावजूद द्रमुक़ का पलड़ा भारी था और परिणाम वही आया है। 2016 में जयललिता के नेतृत्व के प्रभाव में तमिलनाडु ने सत्ता परिवर्तन की परंपरा को तोड़ा था। मुख्यमंत्री पलनीस्वामी के विरुद्ध आक्रोश नहीं था, लेकिन लगातार तीसरी बार पार्टी नेतृत्व वाले गठबंधन को सत्ता में लाने के लिए ज्यादा चमत्कारी व्यक्तित्व चाहिए। बावजूद इनका गहराई से विश्लेषण करना होगा कि ऐसा क्यों हुआ। केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाला लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता में क्यों नहीं कर सका यह प्रश्न बड़ा है। बहरहाल, इससे आगे असम और पश्चिम बंगाल की ओर मुड़ते हैं तो फिर हमारे दृष्टिकोण की महत्ता बढ़ जाती है। तो कैसे?

भाजपा के प्रभाव के कारण इन चुनावों को गहरी वैचारिकता का चरित्र दे दिया गया था और विश्लेषण में वो कायम रहेगा। प. बंगाल का वातावरण बता रहा था कि वहां की पारंपरिक राजनीति में परिवर्तन होने वाला है। वह परिवर्तन सत्ता के स्तर पर होगा या नहीं होगा इसे लेकर विश्लेषकों में लगातार मतभेद था। चुनाव परिणाम ने प. बंगाल के लिए तीन बातें स्पष्ट कर दी। एक, पांच दशक से ज्यादा समय तक राजनीति और साढ़े तीन दशक तक सत्ता चलाने वाला वाम मोर्चा चुनावी तौर पर प्रदेश में खत्म हो चुका है। दो, कांग्रेस के लिए इससे बुरा चुनाव कुछ हो भी नहीं सकता। तीन, बंगाल के बारे में आम धारणा यही थी कि वहां वाम अभिमुख राजनीति ही सफल होगी। सत्ता में कोई रहे, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर उसे वाम नीतियों की ओर उन्मुख होना पड़ेगा।

बंगाल के भद्र पुरुषों ने कल्पना नहीं की थी कि हिंदू और हिंदुत्व केंद्रीय राष्ट्रीयता की बात उठाने वाली भाजपा वहां दूसरी मुख्य शक्ति बन जाएगी। तो यह तीसरी बात प. बंगाल की राजनीति के वर्तमान और भविष्य के लिए सर्वाधिक महतवपूर्ण है। हालांकि 2018 के पंचायत चुनाव में भाजपा ने दस्तक दे दी थी। 2019 लोकसभा चुनाव में वह दूसरी मुख्य पार्टी बनी और चुनाव परिणाम इस बात का गवाह है भले परिणामों से वह बिल्कुल संतुष्ट नहीं होगी, लेकिन वह दूसरे स्थान पर स्थापित हो गई है। जिस राज्य में 29 प्रतिशत के आसपास मुस्लिम वोट हों और उनके अंदर यह भय पैदा कर दिया गया हो कि भाजपा आ गई तो आपकी खैर नहीं वहां भाजपा का बहुमत पाना आसान नहीं हो सकता। आप देखेंगे कि तृणमूल की जीत का अंतर वहां बहुत ज्यादा है जहां-जहां मुस्लिम मत या तो निर्णायक हैं या प्रभावी। वस्तुतः जिस तरह 2019 में ज्यादातर मुसलमानों ने भाजपा के विरुद्ध तृणमूल के पक्ष में एकमुश्त मतदान किया ठीक वही प्रवृत्ति विधानसभा चुनाव में भी कायम रही है। कांग्रेस, वाम मोर्चा और आईएसएफ के गठबंधन को मुस्लिमों का मत नहीं मिला है, क्योंकि इन्होंने भाजपा को पराजित करने के लिए मतदान किया। अगर यह गठबंधन कुछ सीटों पर टक्कर दे पाता और मुस्लिम मतों में थोड़ा बंटवारा कर पाता तो भाजपा का ग्राफ बेहतर हो सकता था। चुनाव परिणाम भाजपा की अपनी ही कसौटियों और अपेक्षाओं निरुत्साहित करने वाला है, लेकिन उसकी पहली सफलता यह है कि उसने पश्चिम बंगाल की राजनीति को दो ध्रुवीय बना दिया है।

दूसरी ओर असम ऐसा प्रदेश है जहां के बारे में माना जा रहा था कि नागरिकता संशोधन कानून व राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तो भाजपा के विरुद्ध जाएगा ही कांग्रेस का बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन भी असर दिखाएगा। पिछले विधानसभा चुनाव में यह माना गया था कि मुस्लिम मत कांग्रेस और एआईयूडीएफ में बंट गई थी और यह भाजपा की जीत का प्रमुख कारण था। विश्लेषण करना होगा कि उनकी एकजुटता के बावजूद भाजपा अपने सहयोगियों के साथ सत्ता बनाए रखने में क्यों सफल हुई है। बराक घाटी में उसको समर्थन मिलना बताता है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता संशोधन कानून भाजपा के खिलाफ नहीं बल्कि पक्ष में गया है। हम प. बंगाल को भी इससे बाहर नहीं रख सकते।

अगर भाजपा इतनी सीटें हासिल करने में कामयाब रही तो इसका वैचारिक निहितार्थ भी है। बंगाल के भद्र पुरुष कभी भाजपा को नहीं चाहते, वे ममता और तृणमूल को भी पसंद नहीं करते लेकिन भाजपा को रोकने के लिए इन सबने तृणमूल के पक्ष में एकजुटता दिखाई। भाजपा भले सीटों के मामले में काफी पिछड़ गई, उसने मुख्य विपक्षी पार्टी को भी राजनीतिक हित के लिए ही सही हिंदुत्व को स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया है। जाहिर है, अगर भाजपा इसी प्रकार प. बंगाल में सघन रूप से काम करती रही तो केवल चुनावी राजनीति ही नहीं, नीतियों में भी लंबे समय तक हिंदू और हिंदुत्व केंद्रीय राष्ट्रीयता की गूंज सुनाई देगी। केरल में पी विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने दोबारा वापसी कर चुनावी इतिहास कायम किया है लेकिन उन्होंने भी अंत में सबरीमाला के भक्तों का समर्थन किया। इसी तरह द्रमुक जैसी नास्तिक पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में मंदिरों के जीर्णाेद्धार के लिए तथा हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए बजट में प्रावधान की घोषणा की। तो इन चुनाव परिणाम की ऐसी ध्वनि है जिसका प्रभाव लंबे समय तक कायम रहेगा।

चुनाव परिणामों ने पहले से हताश और अपने भविष्य को लेकर उद्विग्न कांग्रेस के नेताओं के चिंता बढ़ा दी है। सोनिया गांधी परिवार और राहुल गांधी के राजनीतिक नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न उठाने वालों के स्वर आने वाले समय में मुखर होंगे। केरल से सांसद राहुल गांधी अगर पूरी ताकत लगाकर भी परंपरा के अनुसार गठबंधन को सत्ता तक पहुंचाने में कामयाब नहीं हुए तथा असम में बेहतर प्रदर्शन नहीं किया तो पुनः इसका अर्थ यही निकाला जाएगा कि उनके और परिवार के किसी व्यक्ति के अंदर जनता को आलोड़ित कर अपने पक्ष में मत दिलवाने की क्षमता लगातार क्षीेणतर प्रमाणित हो रही है। आखिर केरल और असम में राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के अलावा कांग्रेस के बड़े नेता प्रचार में नहीं देखे गए। तो जो कुछ भी हुआ उसकी जिम्मेदारी तो अंततः और राहुल के सोनिया परिवार के ही सिर आएगी। ऐसे परिणाम केवल यहीं तक सीमित नहीं है। इसकी प्रतिध्वनियां आने वाले समय में कई स्तरों पर सुनाई देंगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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