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दक्षिण सागर पर चीन हेग के फैसले का सम्मान करे

हेग पंचाट के फैसले पर चीन ने सुनवाई का बायकॉट करते हुए हिस्सा नहीं लिया

दक्षिण सागर पर चीन हेग के फैसले का सम्मान करे
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अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण हेग इंटरनेशल पंचाट में दक्षिण चीन सागर पर फैसला चीन के लिए बड़ा झटका है। हेग स्थित इंटरनेशनल पंचाट (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) ने 1982 में बने यूएन कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ द सी को आधार बनाते हुए फैसला सुनाया कि दक्षिण चीन सागर के द्वीपों पर चीन का कोई अधिकार नहीं है। इन द्वीपों पर चीन के दावों का कोई कानूनी आधार ही नहीं है। हेग स्थायी मध्यस्थता अदालत ने कहा कि चीन के पास नाइन डैश लाइन के भीतर पड़ने वाले समुद्री इलाकों पर ऐतिहासिक अधिकार जताने का कोई कानूनी हक नहीं है। यह पहली बार है जब इस मुद्दे पर कोई लीगल एक्शन हुआ है। दक्षिण चीन सागर के 90 फीसदी हिस्से पर ड्रैगन अपना दावा करता रहा है।

करीब 85 फीसदी हिस्से पर कब्जा जमा भी चुका है। उसने वहां आर्टिफिशियल द्वीप बना लिया है, बड़ी तादाद में सेना तैनात किया है, हवाई पट्टी भी बना ली है। जबकि फिलीपींस, थाईलैंड, उत्तर कोरिया, जापान इसे चीन की मनमानी मानते हैं। कोरिया ने चीन को आंख उठाकर देखने पर मिसालक्ष्ल हमले की चेतावनी भी दी है। इस समुद्री क्षेत्र में ड्रैगन की बढ़ती गतिविधियों पर भारत और अमेरिका भी विरोध जता चुके हैं। फिलीपींस ने ही 2013 में चीन के इस दावे के खिलाफ हेग इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल (पंचाट) में अपील की थी। चीन ने द्वीप के स्कारबरो शोल (उथले पानी) पर फिलीपींस के फिशिंग राइट्स में बाधा डाली थी। यह ट्रिब्यूनल संयुक्त राष्ट्र सर्मथित है। भारत और बांग्लादेश ने भी अपना सीमा विवाद हेग पंचाट के फैसले के आधार पर ही किया था।

हालांकि चीन ने सुनवाई का बायकॉट करते हुए हिस्सा नहीं लिया और कहा कि वह हेग ट्रिब्यूनल के इस फैसले को नहीं मानता है और पंचाट को मान्यता भी नहीं देता है। चूंकि हेग पंचाट के फैसले का पालन संबंधित पक्षों की इच्छा पर निर्भर करता है, इसलिए चीन फैसले को मानने के लिए बाध्य भी नहीं है। इस फैसले के खिलाफ अपील भी नहीं की जा सकती है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की तरफ से जो प्रतिक्रिया आई है, उससे साफ है कि चीन दक्षिण चान सागर से नहीं हटेगा। इसका मतलब साफ है कि आगे भी दक्षिण चीन सागर में विवाद होते रहेंगे। पूर्वी एशिया में इस समय चीन का अपने अधिकांश सीमावर्ती देशों के साथ विवाद है।

यूएन लॉ के मुताबिक, किसी भी देश को उनकी समुद्री सीमा से 12 नॉटिकल माइल तक के क्षेत्र में जाने का हक देता है। उसके बाद इंटरनेशनल बॉर्डर का एरिया शुरू हो जाता है। और चीन पर दूसरे देशों के समुद्री इंटरनेशनल बॉर्डर में अतिक्रमण करने के आरोप लगते रहे हैं। साउथ चाइना सी में विवाद की असल वजह यह है कि इसमें तेल और गैस के बड़े भंडार दबे हुए हैं। इस इलाके में 213 अरब बैरल तेल और 900 ट्रिलियन क्यूबिक फीट नेचुरल गैस का भंडार है। इस समुद्री रास्ते से हर साल सात ट्रिलियन डॉलर का कारोबार होता है। इस पर चीन की इसलिए गिद्ध नजर है।

अभी हाल ही में एनएसजी मसले पर चीन वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ चुका था और बाद में उसे सफाई देनी पड़ी थी। हेग अदालत के फैसले को नहीं मानने के बाद भी चीन और अलग-थलग पड़ जाएगा। चीन को हेग अदालत के फैसले का सम्मान करना चाहिए। इससे गलत संदेश जाएगा कि चीन संयुक्त राष्ट्र का सम्मान नहीं करता है, जबकि वह उसका स्थाई सदस्य है।

इस नाते उसकी वैश्विक जिम्मेदारी ज्यादा है। व्यापार और विकास के लिहाज से समुद्री सीमा क्षेत्र हर देश के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि चीन के लिए है। लेकिन चीन मनमानी कर रहा है। चीन का यह विस्तारवादी रवैया पूर्वी एशिया समेत समूचे विश्व के लिए खतरनाक है। अंतर्राष्ट्रीय फोरमों के फैसलों का विश्व के सभी देशों को मानना करना चाहिए ताकि ग्लोबल शांति बनी रहे।

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