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गणतंत्र दिवस: डॉ. भीमराव अंबेडकर का नेतृत्व व मार्गदर्शन का अंतिम रूप है ''भारत का संविधान''

हमारे देश को गणतंत्र की राहों पर चलने से पहले स्वतंत्र होना पड़ा और यह स्वतंत्रता हमें आसानी से नहीं मिली थी। आज़ादी के लिए न जाने कितने ही मां के सपूतों को हंसते-हंसते प्राणोत्सर्ग किया था।

गणतंत्र दिवस: डॉ. भीमराव अंबेडकर का नेतृत्व व मार्गदर्शन का अंतिम रूप है
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हमारे देश को गणतंत्र की राहों पर चलने से पहले स्वतंत्र होना पड़ा और यह स्वतंत्रता हमें आसानी से नहीं मिली थी। आज़ादी के लिए न जाने कितने ही मां के सपूतों को हंसते-हंसते प्राणोत्सर्ग किया था। शहीदों ने जब कील व नाखूनों से जेल की दीवारों पर वंदेमातरम्ा और जय हिंद के स्वर बुलंद किए तब कई जाकर देश में एक नया सूर्योदय हुआ। उस समय देशभक्ति की कसौटी बनी थी। देश के लिए जान देने की परिपाटी सी बनती चली गई थी।

अनगिनत संघर्षों के बाद हमें 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिली। भारत के बंटवारे के बाद आजाद मुल्क में स्वतंत्रता को नियमों और कानूनों की जंजीरों में बांधने की मांग तीव्र होती चली गई। जिसके कारण दो वर्ष ग्यारह माह और अठारह दिनों की समयावधि और संविधान समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर व डॉ. राजेंद्र प्रसाद के संयुक्त नेतृत्व व मार्गदर्शन में संविधान की रूपरेखा से लेकर अंतिम प्रारूप तक तैयार किया गया।

संविधान के पूर्ण रूप से तैयार होने के बाद आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान को अंगीकृत किया गया। तब से दुनिया के मानचित्र पर भारत को एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य का दर्जा मिल गया। वहीं गणतंत्र जिसका अर्थ होता है शासन की ऐसी प्रणाली है जिसमें राष्ट्र के मामलों को सार्वजनिक माना जाता है।

यह किसी शासक की निजी संपत्ति नहीं होती है। राष्ट्र का मुखिया वंशानुगत नहीं होता है। उसको प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित या नियुक्त किया जाता है। वर्तमान में दुनिया के 206 संप्रभु राष्ट्रों में से 135 देश आधिकारिक रूप से अपने नाम के साथ रिपब्लिक शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये भी सच है देश का सैद्धांतिक रूप से तैयार संविधान आज तक व्यावहारिक रूप में शत-प्रतिशत सफल नहीं हो पाया है।

जहां संविधान धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज के निर्माण की बात करता है वहीं हमारा देश नित्य-प्रतिदिन मजहबी दंगों में जलता है। दलित वर्ग के बच्चों को आज भी जिंदा जला दिया जाता है। कड़वा सत्य है हमारा गणतंत्र आज गनतंत्र में तब्दील होता जा रहा है। वरन्ा क्या बात है कि भारत में आज भी एक बड़ा तबका आजादी और गणतंत्र को यूं अपने साथ छलावा नहीं बताता।

क्या आत्ममंथन करने की जरूरत नहीं है कि जिस देश के बहुत से हिस्से में लोगों ने अभी भी रेलगाड़ी नहीं देखी, उजाला उनके आंगन तक नहीं पहुंचा। जब तक गरीबों की बस्तियों में गणतंत्र के दीये नहीं जल जाते तब तक सब बेमानी है। सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ की कविता का ये अंश-अपने-आप से सवाल करता हूं, क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई खास मतलब होता है?

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