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गणतंत्र दिवस 2018ः भारतीय गणतंत्र के लिए जरूरी है मजदूरों और किसानों का विकास

देश के सामने चुनौतियां तो हर समय में रही हैं, लेकिन समय के अनुसार बदलती रहती हैं। अगर वर्तमान समय की बात करें, जब हम 69वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं तो हमारे सामने बहुस्तरीय चुनौतियां मौजूद हैं।

गणतंत्र दिवस 2018ः भारतीय गणतंत्र के लिए जरूरी है मजदूरों और किसानों का विकास

देश के सामने चुनौतियां तो हर समय में रही हैं, लेकिन समय के अनुसार बदलती रहती हैं। अगर वर्तमान समय की बात करें, जब हम 69वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं तो हमारे सामने बहुस्तरीय चुनौतियां मौजूद हैं। इनमें विदेश नीति, आर्थिक नीति, सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द, युवाओं को रोजगार और देश के किसानों की स्थिति की दशा सुधारना शामिल हैं।

हालांकि बीते दो-तीन साल में विश्व में भारत की छवि एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरी है लेकिन इस दिशा में निरंतर बेहतर प्रयास करने की जरूरत है। साथ ही चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों से हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है। आतंकवाद को नियंत्रित करने के साथ ही सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना अखंड गणतंत्र के लिए जरूरी है। आर्थिक नीतियों में सुधार अच्छा है लेकिन साथ ही महंगाई को नियंत्रण में रखना भी जरूरी है।

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इसके साथ ही देश के अन्नदाता यानी किसान की परेशानियों का समाधान और उन्हें अधिक से अधिक सुविधाएं उपलब्ध हों, यह भी अपने गणतंत्र की खुशहाली के लिए सबसे जरूरी है। राष्ट्र के उन्नयन के लिए केवल एकपक्षीय औद्योगिक विकास ही नहीं बल्कि इसके साथ किसानों और मजदूरों का विकास भी जरूरी है। यानी विकास में एक समन्वय होना चाहिए।

लोकतंत्र के तीन स्तम्भों में समन्वय

इसी तरह गणतंत्र की सशक्तता और खुशहाली के लिए कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के बीच भी एक समन्वय बहुत जरूरी है। सिर्फ स्वयं को सबसे महत्वपूर्ण मान लेने से बात नहीं बनेगी। सबको मिलकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर कार्य करना होगा।

जहां तक बात वर्तमान समय के राजनीतिक दलों में बढ़ती भ्रष्टता और सत्तालोलुपता की है तो इसे सुधारने के लिए निर्वाचन प्रणाली में बदलाव की सख्त जरूरत है। हमें इस बात को समझना होगा कि जब विधायिका भ्रष्ट होती है तो देश का विधान कमजोर होता है। ऐसे में प्रशासन को भी सही ढंग से नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि विधायिका के द्वारा लागू किए जाने वाले नियम-कानूनों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कार्यपालिका की ही होती है। विधायिका में नैतिक और देश-समाज का हित चाहने वाले प्रतिनिधि ही पहुंचे, यह कार्य देश के नागरिक ही कर सकते हैं।

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आज देश के सामने चिंता का एक बड़ा विषय यह है कि पूंजी, लोकतंत्र के सभी स्तंभों को प्रभावित कर रही है। इसके चलते तीनों ही स्तंभों में भ्रष्टाचार दिखाई पड़ता है। यही वजह है कि जन सामान्य के विकास, उसकी सुख-सुविधाओं के लिए नियम-कानून तो बहुत मौजूद हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव या अच्छे परिणाम नहीं दिखते। यह समूचे भारतीय गणतंत्र के लिए बहुत बड़ी समस्या है। इससे भी बड़ा संकट यह है कि पूंजी की समाज में बढ़ती प्रतिष्ठा ने आम लोगों की चेतना को भी संवेदनहीन बना दिया है।

आज अधिकतर लोग छोटे-छोटे लाभ के लिए, थोड़े से पैसे के लिए अनैतिक और भ्रष्ट होने से गुरेज नहीं करते। स्वार्थवश या किसी अनैतिक लाभ के लिए बहुत से नासमझ लोग अपराधियों और भ्रष्ट लोगों को वोट देकर उन्हें संसद और विधानसभा पहुंचा देते हैं, बगैर इस बात पर गौर किए कि उनका यह छोटा सा लाभ देश के लिए कितना हानिकारक हो सकता है।

भारतीय गणतंत्र संकट में

अपने भारतीय गणतंत्र के लिए ऐसे विकट समय में मौजूद बेशुमार समस्याओं के समाधान की उम्मीद देश के नागरिकों पर ही टिकी है। मेरा मानना है कि पूरे तंत्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए अब देश के नागरिकों को ही अपना दायित्व समझना और निभाना होगा। उन्हें ही राजनीति और पूंजी के गठजोड़ को देश की मुख्यधारा से बहिष्कृत करना होगा। अपनी सोच में आत्महित से पहले देशहित को रखने वाली परिपक्वता को शामिल करना होगा।

कहने का सार यही है कि इस समय भारतीय गणतंत्र के समक्ष केवल बाह्य या ऊपरी तौर पर ही नहीं आंतरिक और निचले तौर पर भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। इनका सामना करने और समाधान के लिए संवैधानिक संस्थाओं को ही नहीं देश के हर गण को अपनी भूमिका को समझना होगा। तभी गणतांत्रिक व्यवस्था लागू करने वाले देश के महान राजनेताओं और देशभक्तों के सपनों का गणतंत्र अपना भारतवर्ष बन पाएगा।

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