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गणतंत्र दिवस 2018ः मीलों दूर है गणतंत्र और लोकतंत्र, अभी बाकी हैं कई चुनौतियां

वर्तमान समय में भारतीय गणतंत्र के समक्ष एक नहीं कई चुनौतियां हैं, जिसमें आम लोगों से जुड़ी शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों में आवश्यक प्रगति अब तक नहीं हुई है।

गणतंत्र दिवस 2018ः मीलों दूर है गणतंत्र और लोकतंत्र, अभी बाकी हैं कई चुनौतियां
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वर्तमान समय में भारतीय गणतंत्र के समक्ष एक नहीं कई चुनौतियां हैं, जिसमें आम लोगों से जुड़ी शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों में आवश्यक प्रगति अब तक नहीं हुई है। इसके अलावा हमारे देश में अब भी अंग्रेजों के जमाने वाली उपनिवेशिक व्यवस्था कायम है। हम बात तो करते हैं सुशासन की, गुड गवर्नेंस की लेकिन व्यवस्था वही पुरानी वाली ही लागू है।

यह उपनिवेशिक व्यवस्था तभी खत्म होगी जब आम आदमी को सम्मान मिलेगा। अधिकांश सरकारी अफसर, सांसद और विधायक अपने आप को शासक समझते हैं और आम नागरिक को प्रजा, जबकि सिद्धांत रूप में आम आदमी लोकतंत्र में मालिक माना जाता है। आज जो व्यवस्था है, उसमें आम आदमी की कोई इज्जत नहीं है, सिवाय चुनावों के दौरान।

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अब जहां तक इसमें सुधार करने की बात है तो मैं समझता हूं कि निर्वाचन व्यवस्था और राजनैतिक दल व्यवस्था में सबसे पहले और सबसे ज्यादा सुधार करने की जरूरत है। क्योंकि सत्ता और शक्ति उन राजनेताओं के हाथ में है, जो निर्वाचन द्वारा चुनकर जाते हैं। आज का कड़वा सच यह है कि सत्ता में आपराधिक छवि वाले और सत्तालोलुपों की संख्या बढ़ती जा रही है। हम किसी दल विशेष को कठघरे में नहीं खड़ा कर सकते क्योंकि सारे दल इस मामले में अमूमन एक जैसे ही हैं। ऐसे राजनेताओं की लगातार कमी हो रही है, जो राजनीति में त्याग और सेवा के भाव से प्रेरित होकर आते हैं।

लोकतंत्र बना लूटतंत्र

पहले के जमाने में जो लोग राजनीति में आते थे, वे जनता की सेवा करने के उद्देश्य से आते थे। उनमें त्याग की भावना भरी हुई रहती थी। मैं यह नहीं कहता कि अच्छे लोग अब नहीं रहे लेकिन अब जो लोग आते हैं, उनमें अच्छे लोगों की संख्या बहुत कम हुई है। लोकतंत्र लूटतंत्र अधिक हो गया है। आज राजनीति, पेशा बन चुका है, व्यापार बन चुका है। देश में इतनी गरीबी है लेकिन नेता गरीबी खत्म नहीं करना चाहते। दबे-कुचले लोगों को आगे बढ़ाना नहीं चाहते क्योंकि वो उनके वोट बैंक हैं। यह स्थिति दुखद है।

चुनाव में प्रयोग होता है कालाधान

राजनैतिक व्यवस्था में सुधार एक बड़ा विषय है, इसे कुछ शब्दों में बयान करना मुश्किल है लेकिन यह कहा जा सकता है कि आज जो व्यवस्था है, उसमें कोई भी राजनैतिक कार्य करने या चुनाव लड़ने के लिए अथाह धन का प्रयोग किया जाता है। चुनाव में प्रयोग किया जाने वाला पैसा अधिकतर काला धन होता है, चाहे वो देश से लिया जाए या विदेशों से मंगाया जाए। कोई अपना टैक्स पेड वाइट मनी चुनाव के लिए नहीं देता। इससे काले धन की व्यवस्था पनपती है।

वर्तमान नेतृत्व पर विचार करें

जब तक बदलाव कर ऐसा नियम नहीं लागू किया जाएगा, जिससे कम पैसे में भी निर्वाचन व्यवस्था संचालित हो सके, तब तक अच्छे लोग सत्ता तक पहुंच ही नहीं पाएंगे। अब समय आ गया है कि वर्तमान नेतृत्व यह विचार करे कि कैसे इस पर अंकुश लगाया जाए वरना वो दिन दूर नहीं, जब आम आदमी का निर्वाचन व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाएगा।

नागरिक चरित्र का ह्रास हुआ

इन तमाम समस्याओं का मूल कारण यह है कि हम सबका यानी आम नागरिक का चारित्रिक हृास हुआ है। जो लोग जज, नेता या अफसर बनते हैं, वो भी हमारे बीच से ही जाते हैं। और उनमें से अधिकांश एक नागरिक के तौर पर राष्ट्र से अधिक से अधिक लेना चाहते हैं, देना कोई नहीं चाहता। आम नागरिक का जब तक चारित्रिक उत्थान नहीं होगा, उनमें सेवा भाव नहीं जागेगा, त्याग की भावना नहीं विकसित होगी, तब तक उन्हें देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनाना मुश्किल है और तब तक ये सारी समस्याएं बरकरार रहेंगी।

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