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संसद पर भारी पड़ रही क्षेत्रीय राजनीति, चंद्रबाबू विशेष दर्जे पर अड़े रहे

आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) सरकार के सामने विशेष दर्जे के समकक्ष सहूलियत देने का प्रस्ताव भी रखा। लेकिन चंद्रबाबू विशेष दर्जे पर अड़े रहे। इससे साफ है कि टीडीपी आंध्र प्रदेश के विकास के लिए गंभीर नहीं है, बल्कि वह विशेष दर्जे को लेकर केवल राजनीति करना चाहती है।

संसद पर भारी पड़ रही क्षेत्रीय राजनीति, चंद्रबाबू विशेष दर्जे पर अड़े रहे
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बजट सत्र का दूसरा चरण जबसे शुरू हुआ है, विपक्ष किसी न किसी बहाने संसद नहीं चलने दे रहा है। सरकार की ओर से सदन को चलाने की जितनी भी कोशिश की जाती है, विपक्षी दल उसे पलीता लगाने में जुट जाते हैं। सरकार ने हमेशा कहा है कि वह हर मुद्दे पर बहस को तैयार है और विपक्ष के सभी सवालों का जवाब देने को भी तैयार है। लेकिन विपक्ष का एकमेव लक्ष्य सदन में हंगामा करना और उसे बाधित करना लगता है।

विपक्ष के हंगामे से जहां सदन में कामकाज प्रभावित होते हैं, विधेयक पास नहीं हो पाते हैं, वहीं संसद सत्र का मकसद भी पूरा नहीं होता है। जायज मांगों को लेकर विपक्ष के सभी दलों को संसद में अपनी बात रखने का संवैधानिक हक प्राप्त है। पर देखा यह जा रहा है कि विपक्षी दलों के नेता अपने इस संवैधानिक हक का दुरुपयोग ही ज्यादा करते हैं।

केंद्र में जब से पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार आई है, तब से संसद सत्र के दौरान कांग्रेस समेत अधिकांश विपक्षी दलों की ओर से हंगामा करने व सदन में व्यवधान पहुंचाने की परिपाटी सी बन गई है। बजट सत्र के पहले चरण में भी विपक्ष ने व्यवधान उत्पन्न करना जारी रखा था। अब दूसरे चरण में भी पिछले नौ दिनों से संसद की कार्यवाही विपक्षियों के हंगामे की भेंट चढ़ रही है।

विपक्ष के होहल्ले और हंगामे के चलते वित्त विधेयक अब तक के संसदीय इतिहास में पहली बार बिना चर्चा पास हुआ। नए वित्त वर्ष में बजट प्रावधानों को लागू करने के लिए वित्त विधेयक का पास होना जरूरी होता है। वित्त विधेयक की महत्ता को जानते हुए भी विपक्षी दलों ने इस पर चर्चा में हिस्सा लेना जरूरी नहीं समझा। विपक्षी दलों की हरकतों को देखते हुए आगे भी सदन के सुचारू चलने के आसार नहीं दिख रहे हैं।

करीब दो दर्जन विधेयक संसद में पास होने की कतार में हैं। आज संसद पर क्षेत्रीय राजनीति भारी पड़ रही है। क्षेत्रीय दल अपने-अपने मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय हित के मुद्दों की अनदेखी कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टी टीडीपी ने जिस तरह विशेष दर्जे की मांग को लेकर पहले राजग सरकार से अपने मंत्रियों का इस्तीफा दिलवाया और फिर राजग से अलग होने का ऐलान किया, वह दबाव की राजनीति का नमूना ही है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली विशेष दर्जा देने को लेकर संवैधानिक प्रावधानों को स्पष्टता से देश व आंध्र प्रदेश के समक्ष रखा। वित्त मंत्री ने आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) सरकार के सामने विशेष दर्जे के समकक्ष सहूलियत देने का प्रस्ताव भी रखा। लेकिन चंद्रबाबू विशेष दर्जे पर अड़े रहे। इससे साफ है कि टीडीपी आंध्र प्रदेश के विकास के लिए गंभीर नहीं है, बल्कि वह विशेष दर्जे को लेकर केवल राजनीति करना चाहती है।

टीडीपी का केंद्र की राजग सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान और आंध्र प्रदेश की ही दूसरी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस की ओर से संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश करने की कोशिश केंद्र पर दबाव डालने की ही सियासत है। बिहार और उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में जीत से विपक्षी खेमे में इतना उत्साह भर गया है कि एक के बाद कई दलों- कांग्रेस, माकपा, टीएमसी, राजद ने टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन की घोषणा कर दी है।

जबकि अभी हाल ही में उन्हें त्रिपूरा, मेघालय व नगालैंड में करारी शिकस्त मिली है। लोकसभा का गणित ऐसा है कि अविश्वास प्रस्ताव से सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अविश्वास प्रस्ताव के बहाने विपक्षी दलों को संसद में व्यवधान डालने का पूरा मौका मिलेगा। क्षेत्रीय दलों को चाहिए कि वे अपनी राजनीति से राष्ट्रहित का नुकसान नहीं करें।

संसद नहीं चलने से देश का ही नुकसान होता है। सरकार पर किसी की भी अनुचित व असंवैधानिक मांगें पूरी करने के लिए दबाव डालना स्वस्थ राजनीति नहीं है। विपक्षी सांसदों को देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए और संसद चलने देने में सहयोग करना चाहिए।हंगामा करने से मकसद हासिल नहीं होगा। जनता संसद चलते देखना चाहती है।

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