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अरविंद जयतिलक का लेख : कार्बन उत्सर्जन में कमी लाएं

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत द्वारा कार्बन उत्सर्जन में 35 प्रतिशत कमी (Lack) लाने का लक्ष्य हासिल करने का संकल्प जता एक किस्म से दुनिया से भी आह्वान कर दिया है कि वे भी इस दिशा में आगे बढ़ें। उन का यह आह्वान इस अर्थ में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हर वर्ष कार्बन डाईआॅक्साइड के उत्सर्जन में लगातार वृद्धि हो रही है। वैज्ञानिकों की मानें तो बढ़ते तापमान के लिए मुख्यतः ग्लोबल वार्मिंग है और इससे निपटने की त्वरित कोशिश नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में धरती का खौलते कुंड में परिवर्तित होना तय है। अमेरिकी वैज्ञानिकों की मानें तो वैश्विक औसत तापमान पिछले सवा सौ सालों में अपने उच्चतम स्तर पर है।

अरविंद जयतिलक का लेख : कार्बन उत्सर्जन में कमी लाएं
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पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत द्वारा कार्बन उत्सर्जन में 35 प्रतिशत कमी लाने का लक्ष्य हासिल करने का संकल्प जता एक किस्म से दुनिया से भी आह्वान कर दिया है कि वे भी इस दिशा में आगे बढ़ें। प्रधानमंत्री मोदी (Modi) ने पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह को वीडियो कान्फ्रेंसिंग से संबोधित करते हुए कहा कि मैंने इसके बारे में दुनिया को बताया कि भारत किस तरह प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल को चार गुना बढ़ाकर इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। गौर करें तो प्रधानमंत्री का यह आह्वान इस अर्थ में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हर वर्ष कार्बन डाईआॅक्साइड के उत्सर्जन में लगातार वृद्धि हो रही है।

अभी गत वर्ष ही ब्रिटेन में मौसम विभाग के कार्यालय और एक्जेटर विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि हवाई स्थित मौना लोआ वेधशाला में वायुमंडल में कार्बन डाईआॅक्साइड की सघनता में 1958 से करीब 30 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है। गौर करें तो इस स्थिति के लिए काफी हद तक कार्बन डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन ही जिम्मेदार (Responsible) है। एक आंकड़े के मुताबिक अब तक वायुमंडल में 36 लाख टन कार्बन डाइआॅक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और वायुमंडल से 24 लाख टन आॅक्सीजन समाप्त हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि तय है। वैज्ञानिकों की मानें तो बढ़ते तापमान के लिए मुख्यतः ग्लोबल वार्मिंग है और इससे निपटने की त्वरित कोशिश नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में धरती का खौलते कुंड में परिवर्तित होना तय है। अमेरिकी वैज्ञानिकों की मानें तो वैश्विक औसत तापमान पिछले सवा सौ सालों में अपने उच्चतम स्तर पर है। औद्योगिकरण की शुरुआत से लेकर अब तक तापमान में 1.25 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है।

आंकड़ों के मुताबिक 45 वर्षों से हर दशक में तापमान में 0.18 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है। आईपीसीसी के आकलन के मुताबिक 21वीं सदी में पृथ्वी के सतह के औसत तापमान में 1.1 से 2.9 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होने की आशंका है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने वायु में मौजूद आॅक्सीजन और कार्बन डाईआॅक्साइड के अनुपात पर एक शोध में पाया है कि बढ़ते तापमान के कारण वातावरण से आॅक्सीजन की मात्रा तेजी से कम हो रही है। पिछले दस सालों में वातारवरण से आॅक्सीजन काफी रफ्तार से घटी है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है उस पर काबू नहीं पाया गया तो अगली सदी में तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। अगर पृथ्वी के तापमान में मात्र 3.6 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है तो आर्कटिक के साथ-साथ अंटाकर्टिका के विशाल हिमखंड पिघल जाएंगे। देखा भी जा रहा है कि बढ़ते तापमान के कारण उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव की बर्फ चिंताजनक रूप से पिघल रही है। अगर बर्फ का पिघलना थमा नहीं तो आने वाले वर्षों में न्यूयाॅर्क, लाॅस एंजिल्स, पेरिस और लंदन, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापट्टनम, कोचीन और त्रिवेंद्रम नगर समुद्र में होंगे।

वर्ष 2007 की इंटरगवर्नमेंटल पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण दुनियाभर के करीब 30 पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई अब आधे मीटर से कम रह गई है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर 2 से 5 किलोमीटर सिकुड़ गए हैं। 76 फीसदी ग्लेशियर चिंताजनक गति से सिकुड़ रहे हैं। कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर भी तेजी से सिकुड़ रहा है।

यहां ध्यान रखना होगा कि पृथ्वी पर करीब 12 करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीवों के समाप्त होने का कारण भूमंडलीय तापन ही था। आंकड़ों पर गौर करें तो 2000 से 2010 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन की दर प्रतिवर्ष 3 फीसद रही जबकि भारत के कार्बन उत्सर्जन में यह वृद्धि 5 फीसद रही। कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्वाधिक रूप से कोयला जिम्मेदार है। हालांकि ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट पर गौर करें तो अमेरिका और चीन ने कोयले पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है,

लेकिन भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी कोयले पर निर्भर है। भारत ने गत वर्ष पहले पेरिस जलवायु समझौते को अंगीकार करने के बाद क्योटो प्रोटाकाल के दूसरे लक्ष्य को अंगीकार करने की मंजूरी दे दी है। इसके तहत देशों को 1990 की तुलना में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 18 फीसद तक घटाना होगा। उल्लेखनीय है कि उद्योगों से निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए 11 दिसंबर, 1997 को जापान के क्योटो शहर में संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 192 देशों के बीच यह संधि हुई। 16 फरवरी, 2005 को यह प्रभावी हुई।

गौरतलब है कि संधि का पहला लक्ष्य 2008-12 के लिए तय हुआ था। इसमें औद्योगिक अर्थव्यवस्था वाले 52 देशों ने चार ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 1990 की तुलना में 5 फीसद तक घटाने का लक्ष्य रखा था। अन्य देशों ने भी इसके लिए अपने लक्ष्य रखे थे। उल्लेखनीय है कि 2020 से कार्बन उत्सर्जन को घटाने संबंधित प्रयास शुरू करने के लिए दिसंबर, 2015 को यह संधि हुई। इस संधि पर 192 देशों ने हस्ताक्षर किए।

126 देश इसे अंगीकार कर चुके हैं। इसके तहत बढ़ते वैश्विक औसत तापमान को दो डिग्री सेल्सियस पर ही रोकने का लक्ष्य तय है। पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने और कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव को कम करने के लिए कंक्रीट के जंगल का विस्तार और अंधाधुंध पर्यावरण दोहन पर लगाम कसनी होगी। जंगल और वृक्षों का दायरा बढ़ाना होगा। वृक्षों और जंगलों का विस्तार होने से धरती के तापमान में कमी आएगी, लेकिन विडंबना है कि वृक्षों और जंगलों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की 'ग्लोबल फॅारेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट'की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र तीन फीसद घटा है और 102,000 लाख एकड़ से अधिक का क्षेत्र 98,810 लाख एकड़ तक सिमट गया है।

गौर करें तो यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक वन क्षेत्र में कुल वैश्विक क्षेत्र की दोगुनी अर्थात छह फीसद की कमी आई है। उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है। यहां सबसे अधिक 10 फीसद की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। वनों के विनाश से वातावरण जहरीला हुआ है और प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआॅक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। ओजोन जीवों की सूर्य की पराबैंगनी किरणों से रक्षा करता है। बेहतर होगा कि वैश्विक समुदाय बढ़ते तापमान से निपटने के लिए कार्बन डाईआॅक्साइड के उत्सर्जन पर नियंत्रण का कोई ठोस प्रभावी उपाय ढूंढें।

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