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सुरजीत सिंह का व्यंग्य लेख: रेसिपी ट्रायल

खाए क्या, कोरोना वेक्सीन से भी मूल्यवान खोजी गई नई दुर्लभ रेसिपी के नाम पर खिलाए गए थे। यह बाद में पता चला, यह सिर्फ ट्रायल था, किसी चैनल के सौजन्य से, दूसरा फेसबुक के जरिए चैलेंज आधारित।

Poha Recipe : एक बार जरूर ट्राई करें पोहा कटलेट, ये है रेसिपीपोहा कटलेट रेसिपी (फाइल फोटो)

आज सुबह-सुबह नाश्ते में लॉकडाउनीय व्यवहार के तकाजे पर तले बिस्किट के पकौड़े खाए थे। उसके बाद मीठे में चॉकलेट का डोसा। खाए क्या, कोरोना वेक्सीन से भी मूल्यवान खोजी गई नई दुर्लभ रेसिपी के नाम पर खिलाए गए थे। यह बाद में पता चला, यह सिर्फ ट्रायल था, किसी चैनल के सौजन्य से, दूसरा फेसबुक के जरिए चैलेंज आधारित। यद्यपि शर्तें लागू नहीं थी, बदले में हाथों हाथ हलक में हाथ डालकर वाह-वाह तो निकाल ले गए, लेकिन थोड़ी देर बाद जो पेट से प्रतिक्रिया आनी शुरू हुईं, उसकी जिम्मेदारी लेने कोई आगे नहीं आया। उलटे पेट में पहले से ही गड़बड़ होगी, डेढ़ महीने से घर में पड़े-पड़े गटक रहे हैं, साथ ही भालू क्या जाने डोसे का स्वाद, जैसी एकदम ताजा-ताजा उबलती हुई लताड़ें पाकर पेट फौरन ठीक हो गया। घर में शांति उम्मीद छोड़ एक मित्र को फोन लगाया, और सुना भाई, क्या चल रहा है? ऐसे आड़े-तिरछे वक्त में ईनो के बाद एक मित्र ही हैं, जो इंस्टेंट काम करते हैं। वे बोले, क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है? क्लिनिकल ट्रायल! कहीं गुपचुप कोरोना वेक्सीन तो नहीं खोज ली भाई? मेरा इतना कहना था कि वह मुंह में रखे गोलगप्पे की तरह फट गया, हां भाई, कोरोना रेसिपी के जरिए एकदम निकट पहुंच गए हैं, पेट पर दिन-रात ट्रायल चल रहा है! जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, रेसिपी ट्रायल के नाम पर पेट की प्रयोगशाला में अगड़म-बगड़म कुछ भी धकेला जा रहा है। भूल से कभी अनिच्छा जाहिर कर दी, तो इम्प्रूवमेंट के नाम पर अगली डिश उससे भी हाहाकारी आती है।

उफ्फ, दर्द ही नहीं, मर्ज भी साझा निकला। कल वाले गुलाब जामुन पित्जा से ऊबरे भी नहीं थे कि आज खतरनाक किस्म से बनाए करेले के पकौड़ों से भिड़ंत हो गई, गोया कि पेट में कोरोना हुआ तो वह भी सलट लेगा। जान तो मौत की डाल पर चमगादड़ की तरह उलटी लटकी है, इन्हें यह सूझ रहा है कि बताओ, बताओ, कैसा लगा? हमसे वंस मोर सुनें और उधर फेसबुक पर रायता फैलाएं।

अच्छा है न, जब मरना ही है तो क्यों न भरपूर केक, पकौड़े, जलेबियां, गुलाब जामुन, रसगुल्ले, मलाई कोफ्ता, इडली सांभर, डोसा, दही बड़ा, कचौरी, समोसा, फाफड़ा अन्दर कर आराम से मरा जाए। पेट को भी अनेकता में एकता का बोध होना चाहिए। मैंने थोड़ा दर्शन मिलाकर चुहल की। भाई इन तक तो ठीक था, लेकिन यह भी क्या जिद कि मिर्ची बड़ा की तर्ज पर एक्सीडेंटल लेडी फिंगर बड़ा खिलाया जाए। सतत मैदा खाते-खाते अब ऐसा फील होने लगा है, जैसे हम हाड़-मांस के नहीं, सिर्फ मैदा से बने पुतले हैं। अगर लॉकडाउन अनन्तकाल तक चल गया तो अपना तो अंत आ लिया। इससे पहले ही सरकार को एक अध्यादेश लाकर फेसबुक पर एक्सपेरिमेंटल डिशेज की फोटो डालकर चैलेंज देने पर सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी होना चाहिए। आखिर पेट है कोई नेता का स्विस बैंक अकाउंट नहीं कि कुछ भी, कितना भी डालते जाओ।

लेकिन भाई इसमें निहित पॉजिटिव संकेत भी तो समझो, एक अकेली जलेबी ने पूरे राष्ट्र को एक चाशनी में लपेट दिया है। अगर आपके पेट ने जरा सी प्रतिक्रिया की तो यह समझा जाएगा कि आप इस एकता में बाधक बन रहे हैं, लॉकडाउन को सीरियसली नहीं ले रहे हैं। किसी ने जलेबी का धर्म, कुनबा वगैरह भी खोज लिया तो नफरत फैलाने के दोषी समझे जाएंगे।

वे फटे दही के रायते की तरह फैल गए, माना कि लॉकडाउन के शुरू-शुरू में जोश-जोश में हमसे गलती हुई, जो हमारे मन ने लॉकडाउन को लंबी छुट्टियां समझ कुछ नई फरमाइशें कर डालीं, लेकिन उसकी ऐसी सजा तो सर्वथा उचित नहीं कि गुलाब जामुन भी हरी चटनी के साथ खिलाए जाएं। कुछ टेड़ा-मेंढ़ा खाने के फलस्वरूप अपानवायु भी निसृत हो जाए तो भृकुटि तन जाती है कि यह सरासर हमारी रेसिपी का विरोध है, बताओ भला! अंत में लंबी डकार लेकर उम्मीद के साथ बोले, आप तो लेखक-हैं, करते क्यों नहीं कुछ!अब उन्हें क्या बताएं, हमारे यहां मामला फटे दूध से पनीर बनाने के सदाबहार फॉर्मूले से कहीं आगे फटी छाछ से कढ़ी बनाकर उसे बिना सुई-धागे से सिले एकजुट रखने के कारनामे तक चला गया है।

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