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क्या ब्याज दरों में वृद्धि से ही थम जाएगी महंगाई

रिर्जव बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने महंगाई को थामने के लिए नीतिगत ब्याज दरों में वृद्धि किया है। देश में मुद्रास्फीति की जो स्थिति है, उसमें इसके बढ़ने के कयास लगाये जा रहे थे

क्या ब्याज दरों में वृद्धि से ही थम जाएगी महंगाई
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रिर्जव बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने महंगाई को थामने के लिए नीतिगत ब्याज दरों में वृद्धि किया है। देश में मुद्रास्फीति की जो स्थिति है, उसमें इसके बढ़ने के कयास लगाये जा रहे थे।इसका सीधा असर अब बैंकों से नए कर्ज लेने वालों और वर्तमान में कर्ज चुका रहे लोगों पर पड़ेगा। आरबीआई का मानना हैकि देश में महंगाई और राजकोषीय घाटे का खतरा बरकरार है, लिहाजा रेपो दर और रिवर्स रेपो दर में इजाफा किया गया। रेपो दर पर वाणिज्यिक बैंक आरबीआई से छोटी अवधि के कर्जलेते हैं। बीते कुछ सालों से केंद्रीय बैंक इस हथियार के जरिये मुद्रास्फीति को कम करने के लिए संघर्ष कर रही है पर सफल नहीं हो पा रही है। उल्टे उसके इस कदम से विभिन्न क्षेत्र में निवेश प्रभावित हो रहा है। महंगाई कई वर्षों से आम जनता को परेशान की हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान में महंगाई का संबंध आपूर्ति पक्ष से कहीं ज्यादा है, बजाय देशवासियों की आय बढ़ने से। यह बात आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव भी कह गए हैं। यहां सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि आपूर्ति तभी सुनिश्चित हो पाएगी जब पर्याप्त उत्पादन हो और उसका वितरण बेहतर ढंग से किया जाये। यूपीए-दो के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश को भरोसा दिलाया था कि सौ दिनों में महंगाईकम कर देंगे पर वे सफल नहीं हो सके। इसकी वजह सरकार में नीतिगत अपंगता की स्थिति है। कोई फैसले समय से नहीं लिए गए और जो लिए उसमें भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और घोटाले उजागर हुए। परिणामस्वरूप देश की आर्थिक विकास की दर एक दशक के निचले स्तर पर यानी पांच फीसदी से भी नीचे चली गई है। विकास दर का उत्पादन से सीधा संबंध होता है। अभी भी स्थिति सुधरी नहीं है, न ही उसमें सुधार की कोई उम्मीद है। तभी तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के बाद सोमवार को आरबीआई को भी कहना पड़ा कि चालू वित्त वर्ष के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर वित्त वर्ष 2013-14 में 4.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि पहले यह 5.7 प्रतिशत थी। इसका अर्थ हुआ कि देश की जनता की आय कम रहेगी। ऐसी स्थिति में ब्याज दरों में वृद्धि से अर्थव्यवस्था कहीं ज्यादा प्रभावित होती है बजाय महंगाई कम होने के। मौद्रिक दरों में परिवर्तन से महंगाई को दूसरे रास्ते से बढ़ने का मौका मिलता है, क्योंकि बैंक कर्ज की दरों को बढ़ा देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से खाद्य वस्तुओं की ऊंची कीमतों ने आम आदमी की जिंदगी को दूभर बना दिया है। 2004 से 2013 के बीच खाने पीने के वस्तुओं के दामों में 157 फीसदी की बढ़ोतर हुईहै। इन दिनों प्याज और सब्जियों की बढ़ती कीमतों ने लोगों के बजट को और भी बिगाड़ कर दख दिया है। आज थोक मुद्रास्फीति 6.46 प्रतिशत और उपभोक्ता मुद्रास्फीति करीब दस फीसदी है। यह स्थिति खतरनाक है। आरबीआई के अनुसार मुद्रास्फीति को पांच फीसदी से नीचे होनी चाहिए। परंतु इसके लिए केंद्र सरकार और उसे मिलकर महंगाई बढ़ाने वाले कारकों से लड़ना होगा, बजाय कुछ अंतरालों में मौद्रिक दरों में परिवर्तन के। क्योंकि यह स्थाई समाधान नहीं। र्मज को पहचान कर उचित इलाज से ही समस्या दूर होगी।

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