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प्रमोद भार्गव का लेख : आरक्षण को तर्कसंगत बनाएं

आजादी के बाद जब संविधान अस्तित्व में आया तो, अनुसूचित जाति और जनजातियों के सामाजिक उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गई थी। पहली बार दस वर्ष के लिए आरक्षण दिया गया था। उस वक्त केवल 22.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था। 1989 में मंडल आंदोलन के उभार के बाद देश में पिछले वर्ग के लिए 27.5 फीसदी आरक्षण दिया गया। उस वक्त मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं होना चाहिए। उसके बाद से आरक्षण लगातार राजनीति का विषय बना हुआ है। आरक्षण देने या ना देने को लेकर समय समय पर बहस होती रहती है।

प्रमोद भार्गव का लेख : आरक्षण को तर्कसंगत बनाएं
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प्रमोद भार्गव 

प्रमोद भार्गव

वैसे तो आरक्षण का पेच गाहे-बगाहे अदालतों में विवाद का मसला बना ही रहता है, लेकिन इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की निर्धारित सीमा पचास प्रतिशत पर रोक लगा दी है। शीर्ष न्यायालय ने महाराष्ट्र में मराठों के लिए 16 फीसदी आरक्षण देने के राज्य सरकार के फैसले को रद कर दिया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इंदिरा साहनी के मामले पर पुनर्विचार नहीं होगा। यदि यह आरक्षण दिया जाता है तो आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास प्रतिशत के पार चली जाती, जो असंवैधानिक है। न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आरक्षण की सीमा लांघने की स्थिति को समानता के मौलिक अधिकार के विरुद्ध बताने के साथ यह भी कहा कि मराठा समुदाय शैक्षणिक, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ा नहीं कहा जा सकता है। नतीजतन इन्हें आरक्षण के दायरे में लाना उचित नहीं है।

देश में फिलहाल सरकारी नौकरियों में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के 1992 में इंदिरा साहनी के आए फैसले के आधार पर आरक्षण की सीमा निर्धारित है। इसे मंडल जजमेंट भी कहते हैं। इसमें आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास फीसदी तय की गई थी, किंतु इस निर्णय में यह विकल्प है कि अपवाद की स्थिति में यह सीमा लांघी जा सकती है। इसे आधार बनाकर कई राज्यों ने जाति विशेष के मतदाताओं को लुभाने के लिए 75 फीसदी तक आरक्षण की सीमा बढ़ा दी है। दरअसल राज्य सरकारें यह भलीभांति जानती हैं कि वोट बैंक की राजनीति के चलते ठीक चुनाव के पहले किसी जाति या पंथ को आरक्षण देना या उसकी घोषणा करना संविधान के विपरीत है। अदालत ऐसे आरक्षण को शून्य में बदल सकती है। बावजूद राजनीतिक चालाकियों के चलते यह खेल खेला जाता रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को मंजूर करते हुए मराठा समुदाय को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने का फैसला लिया था। आयोग की सिफारिश के मुताबिक मराठों को नई श्रेणी 'सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग' के तहत आरक्षण दिया जाना प्रस्तावित था। मराठा समाज की यह मांग 1980 से लंबित थी।

2014 में महाराष्ट्र विधानसभा से इस समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान पहली बार किया था, किंतु मुंबई उच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था को गैर संवैधानिक मानते हुए, अमल पर रोक लगा दी थी। इसके बाद आरक्षण की मांग नियमित उठती रही। 2016 में इस आंदोलन के स्वरूप ने आक्रोश का रूप भी लिया, तत्पश्चात आयोग ने 25 विभिन्न बिंदुओं के आधार पर मराठा समुदाय को कमजोर मानते हुए महाराष्ट्र सरकार को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की हरी झंडी दे दी थी। फिलहाल महाराष्ट्र में 52 प्रतिशत आरक्षण है, जो बढ़कर 68 हो जाता। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने यह खेल खेला था। बावजूद सरकार 16 प्रतिशत आरक्षण कैसे देगी यह विवाद का पहलू था? हालांकि इस आरक्षण को देने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग ने मराठा समुदाय की सभी जातियों और उपजातियों से विचार विमर्श किया था। समाज के 98 फीसदी लोगों से राय ली गई थी। कुनबी और ओबीसी के दायरे में आने वाली 90 फीसदी जातियों ने मराठों को आरक्षण देने का समर्थन किया था। इसके लिए 43,600 से भी ज्यादा परिवारों का सर्वेक्षण किया गया। इससे पता चला कि मराठा समुदायों के 37 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने को विवश हैं। इसके साथ ही कई बिंदुओं को आधार बनाकर उस समय की फड़णवीस सरकार मराठाओं को आरक्षण देने की तैयारी में थी, जबकि महाराष्ट्र में मराठा, उत्तर भारत के क्षत्रियों की तरह उच्च सवर्ण और सक्षम भाषाई समूह हैं। आजादी से पहले शासक और फिर सेना में इस कौम का मजबूत दखल रहा है। आजादी की लड़ाई में मराठा, पेशवा, होल्कर और गायकवाडों की अहम भूमिका रही है। स्वतंत्र भारत में यह जुझारू कौम आर्थिक व समाजिक क्षेत्र में इतनी क्यों पिछड़ गई कि इसे आरक्षण के बहाने संरक्षण की जरूरत पड़ गई, यह राजनेताओं और समाज विज्ञानियों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए? दरअसल किसी भी समाज की व्यापक उपराष्ट्रीयता धर्म, भाषा और कई जातीय समूहों की पहचान से जुड़ी होती है।

भारत ही नहीं समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में उपराष्ट्रीयताएं अनंतकाल से वर्चस्व में हैं। इसकी मुख्य वजह है कि भारत एक साथ सांस्कृतिक भाषाई और भौगोलिक विविधताओं वाला देश है। एक क्षेत्र विशेष में रहने के कारण एक विशेष तरह की संस्कृति विकसित हो जाती है। जब इस एक प्रकार की जीवनश्ौली के लोग इलाका विशेष में बहुसंख्यक हो जाते हैं तो यह एक उपराष्ट्रीयता का हिस्सा बन जाती है। एक समय ऐसा भी आता है, जब हम अपनी-अपनी उपराष्ट्रीयता पर गर्व दुराग्रह की हद तक करने लग जाते हैं। जम्मू-कश्मीर और पंजाब के अलगाववादी आंदोलन, शुरुआत में उपराष्ट्रीयता को ही केंद्र में रखकर चले, किंतु बाद में सांप्रदायिकता के दुराग्रह में बदलकर आतंकी जमातों का हिस्सा बन गए। इन्हीं उपराष्ट्रीयताओं के हल हमारे पूर्वजों ने भाषा के आधार पर राज्यों का निर्माण करके किए थे। लेकिन महाराष्ट्र में मराठों को यदि आरक्षण दे दिया जाता तो गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर और आंध्र में कापू समाज का आरक्षण के लिए आगे आना तय था। आजादी के बाद जब संविधान अस्तित्व में आया तो, अनुसूचित जाति और जनजातियों के सामाजिक उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गई थी। पहली बार दस वर्ष के लिए आरक्षण दिया गया था। उस वक्त केवल 22.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था। 1989 में मंडल आंदोलन के उभार के बाद देश में पिछले वर्ग के लिए 27.5 फीसदी आरक्षण दिया गया। उस वक्त मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं होना चाहिए। उसके बाद से आरक्षण लगातार राजनीति का विषय बना हुआ है। आरक्षण देने या ना देने को लेकर समय समय पर बहस होती रहती है। कुछ लोग इसकी पैरोकारी करते हैं और कुछ लोगों को लगता है कि आरक्षण से सामाजिक विभाजन बढ़ रहा है।

एक समय आरक्षण का सामाजिक न्याय से वास्ता जरूर था, लेकिन सभी जाति व वर्गों के लोगों द्वारा शिक्षा हासिल कर लेने के बाद अब आरक्षण को तर्कसंगत बनाए जाने की जरूरत है। जिन्हें अब तक लाभ नहीं मिला है, उनकी पहचान कर आरक्षण को उन वर्ग तक सीमित किया जा सकता है। राज्यों में वोट बैंक के लिए संविधान व अदालत के निर्देशों से इतर जाकर आरक्षण का कार्ड नहीं खेला जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले ने इसी ओर संकेत दिया है। सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से साफ है कि वोट बैंक के लिए आरक्षण के प्रावधानों को बेजा इस्तेमाल ना हो। हमें आरक्षण की जरूरत को तर्कसंगत बनाना चाहिए, न कि उसे राजनीति का हथियार बनाना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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