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रंजीत वर्मा की कविताएं - नहीं देख पाऊंगा यह सच और जिस तरह मैं भटका

दिल्ली की सड़कें कितनी वीरान है यह मैंने जाना तुम्हारे जाने के बाद

रंजीत वर्मा की कविताएं - नहीं देख पाऊंगा यह सच और जिस तरह मैं भटका
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1. नहीं देख पाऊंगा यह सच

दिल्ली की सड़कें कितनी वीरान है
यह मैंने जाना
तुम्हारे जाने के बाद
तुम जहां नहीं होती
वहां छांह नहीं होती
और उफ्फ
यह धूप होती है कितनी तेज
कोई आसरा नहीं होता
हर आहट हो जाती है दूर
प्रेम की तड़प खत्म नहीं हुई हमारी
इस उत्तर आधुनिक युग में भी
क्या मैं उम्मीद करूं कि
हवाओं के झोंकों से भरा दरख्त बनकर
तुम आओगी मेरे जीवन में
गिरोगी मेरी आत्मा पर
ठंडा बहता झरना बनकर
तुम्हारी पलकें झुकेंगी
और छुपा लेंगी मुझे अंदर कहीं
बिखरे केश में ढंक जाता है तुम्हारा चेहरा
चांद और बादल का ऐसा
अलौकिक दृश्य
एक तुम्ही रच सकती हो
एस धरती पर
मुझे पता है
मैं खत्म हो जाऊंगा एक दिन
तब भी नहीं देख पाऊंगा यह सच।
2. जिस तरह मैं भटका
एक ऐसे समय में
मैंने तुम्हारा साथ दिया
जब समय
मेरा साथ नहीं दे रहा था
वे हो सकते हैं
उत्तेजक और अमीर
लेकिन जिस तरह मैं भटका
मिलने को तुमसे पूरी उम्र
भटक कर दिखाएं वे
एक पूरा दिन भी
एक ऐसे समय में
जब प्रेम करना
मूर्खता माना जा रहा था
और अदालतें खिलाफ में
फैसले सुना रही थीं
प्रेमिकाएं
अपने वादों से मुकर रही थीं
और प्रेमी पंखे से झूल रहे थे
मैंने प्रेम किया तुमसे
तमाम खतरों के भीतर से गुजरते हुए
मैंने तुम्हे दिल दिया
जब तुम्हे खुद अपना दिल
संभालना मुश्किल हो रहा था
तुम्हारे सांवले रंग में
गहराती शाम का झुटपुटा होता था हमेशा
एक रहस्य गढ़ता हुआ
मैं एक पेड़ की तरह होता था जहां
अंधेरे में खोता हुआ
एक ऐसे समय में
जब आगे बढ़ने के करतब
कौशल माने जा रहे थे
बादलों की तरह भटकता रहा मैं
मिलने को तुमसे पूरी उम्र
भटककर दिखाएं वे मेरी तरह
एक पूरा दिन भी।

2015 का मेन बुकर पुरस्कार हंगरी के लेखक लेजलो के नाम

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