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रामपाल को सजा, कानून तोड़ने वालों के लिए नजीर

देश के कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे व्यक्ति खुद को कितना भी बड़ा समझे। पांच हत्याओं के मामले में स्वयंभू संत रामपाल को उम्रकैद की सजा उन सभी लोगों के लिए सबक है, जो खुद को कानून और संविधान से ऊपर मानने की भूल कर बैठते हैं।

रामपाल को सजा, कानून तोड़ने वालों के लिए नजीर
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देश के कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे व्यक्ति खुद को कितना भी बड़ा समझे। पांच हत्याओं के मामले में स्वयंभू संत रामपाल को उम्रकैद की सजा उन सभी लोगों के लिए सबक है, जो खुद को कानून और संविधान से ऊपर मानने की भूल कर बैठते हैं। रामपाल खुद को संत कहते थे, लेकिन उनका आचरण कानून पालन करने के समय कहीं से भी संत के अनुकूल नहीं था।

2006 में उसके रोहतक के करौंथा स्थित सतलोक आश्रम के बाहर एक हत्या हुई थी। प्रशासन ने रामपाल और उनके 37 अनुयायियों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसी मामले में हिसार कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उसकी पेशी थी, जहां उसके समर्थकों ने उत्पात मचाया था। इसके बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने रामपाल और उसके अनुयायियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया।

हाईकोर्ट ने 5 नवंबर 2014 को हरियाणा के तत्कालीन डीजीपी और गृह सचिव को आदेश दिया कि 10 नवंबर 2014 को रामपाल को पेश करें। इसके बाद दो बार और पेशी के आदेश जारी हुए। इसके बावजूद रामपाल अदालत में पेश नहीं हुआ। वह कोर्ट के आदेश की अवहेलना करता रहा। तब आदेश पर अमल करने के लिए जब पुलिस रामपाल को गिरफ्तार करने उसके आश्रम पहुंची, तो उसने अपने सैकड़ों अनुयायियों को आश्रम में ढाल बनाकर खड़ा कर दिया।

अनुयायियों की इस भीड़ के बीच दम घुटने से चार महिलाओं व एक बच्चे की मौत हो गई थी। 19 नवंबर 2014 को 60 घंटे तक की घेराबंदी और करीब 56 घंटे की कार्रवाई के बाद रामपाल ने रात में सरेंडर किया था। इस घटना से स्पष्ट है कि रामपाल कानून का सम्मान नहीं कर रहा था। उनकी नजर में हाईकोर्ट का सम्मान भी नहीं था।

इससे पहले गुरमीत रामरहीम, आसाराम व दाती महाराज के मामले में भी देखने को मिला था कि वे कानून का समुचित सम्मान नहीं कर रहे थे। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जो लोग खुद को संत कहते हैं, वे अपने आचरण में देश के नियम-कानून की मर्यादा का पालन नहीं करते हैं। सार्वजनिक जीवन जीने वाले को तो छोटे-छोटे नियम-कानून का पालन कर लोगों के समक्ष उदाहरण पेश करना चाहिए।

हमारे देश में एक गलत परिपाटी चल पड़ी है, जिसमें अनेक रसूखदार लोग स्वयं को संविधान व कानून से ऊपर समझते हैं। यह सवर्था गलत है। अनेक स्वयंभू संत पैसा और अपनी राजनीतिक नजीदिकियों के चलते निरंकुश हो जाते हैं। आसाराम, गुरमीत, दाती महाराज, रामपाल ऐसे ही उदाहरण हैं। हमारी राजनीति को भी समझनी होगी कि बाबाओं के भरोसे वोटबैंक साधने की प्रवृत्ति गलत है,

इससे स्वयंभू बाबा कानून के साथ लुकाछिपी खेल खेलने लगते हैं। देश में स्वयंभू संत बनने व उसके आश्रम खोलने पर सरकार को पैनी नजर रखनी होगी, इसके लिए गाइडलाइन से लेकर कानून बनाए जाने चाहिए। चार साल देर से ही सही, लेकिन रामपाल को उम्रकैद की सजा मिलना देश में एक नजीर पेश करेगा कि कोई भी व्यक्ति संविधान व कानून से बड़ा नहीं है।

कानून तोड़ने वालों का सख्त सजा मिलेगी। यह आम लोगों के लिए भी सबक है, जो बिना जांच-पड़ताल किए किसी को भी संत मानने लगते हैं, अराध्य मानने लगते हैं, पूजने लगते हैं। धर्म के नाम पर व्यापार करने वालों को पहचानना होगा। लोगों को समझना होगा कि ईश्वर की अराधना के लिए किसी बिचौलिए की जरूरत नहीं है। स्वयंभू बाबाओं के मकड़जाल से जनता को बचाना जरूरी है।

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