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राम रहीम जैसे बाबाओं और बगदादी जैसे आतंकियों में कोई फर्क नहीं

इस देश ने कभी राजा को मूल्य निर्माता बनाकर सिर पर नहीं बिठाया।

राम रहीम जैसे बाबाओं और बगदादी जैसे आतंकियों में कोई फर्क नहीं
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दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता, संस्कृति और धर्म का देश धीरे धीरे एक अलग तरह की उबकाई वाली सड़ांध से भर रहा है। इस देश ने कभी राजा को मूल्य निर्माता बनाकर सिर पर नहीं बिठाया। देश संतों, गुरुओं, महात्माओं, त्यागियों और मुफलिस चिंतकों के चरणों में बैठकर इतिहास रचता रहा है।

कौन थे कबीर, तुलसीदास, दादू, जायसी, गांधी, तुकड़ोजी, साईंबाबा, रामानुजाचार्य, रामानंद और यहां तक बुद्ध और महावीर भी जिन्होंने दौलत, शोहरत, पद, राजदरबार वगैरह को मनुष्यता के चरणों की धूल बना दिया। ताजा सामाजिक जीवन में भी कोई नहीं कह सकता कि अंबेडकर, नेहरू, तिलक, सुभाष बोस, दीनदयाल उपाध्याय, लोहिया, जयप्रकाश जैसे लोग धन या केवल सत्ता कमाने आए थे।

वक्त और समाज ने उनकी लोकप्रियता की ताजपोशी की है। कर्मों एवं परिस्थितियों के कारण भी। राजपथ और जनपथ के समानांतर फिर भी कई पगडंडियां होती हैं। उन्हें अंगरेजी में र्शार्टकट या चोर रास्ता कहते हैं। उस पर चलकर अपनी अपनी मंजिले मकसूद तक तो पहुंचा ही जा सकता है। कौन जानता था रज़िया कभी सुल्तान बनेंगी। मोहम्मद बिन तुगलक भिश्ती का राज चलाएंगे।

झांसी की रानी लक्षमीबाई को विधवा होकर सल्तनत संभालनी पड़ेगी। हरियाणा का कोई रामकिशन यादव गुरु गद्दी में समाकर अरबों रुपए के उद्योग का मालिक बाबा रामदेव कहलाएगा। वह ऋषि पतंजलि की श्वास को केवल अपने लिए भुना लेगा। लगता तो यह भी है कि आगे चलकर ऋषि पतंजलि उसके ही कारण जाने जाएंगे। जैसे कुछ लोग गोडसे के माध्यम से गांधी को याद करते हैं।

पंजाब के किसी जाट सिख परिवार का नवयुवक बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह जैसा कुछ नाम धरकर डेरा सच्चा सौदा के तख्ते ताऊस पर बैठेगा। वह अय्याश होकर भी भगवान कहलाएगा। वह धन और चरित्रहीनता की ताकत के बल पर गरीब मजलूम लोगों की भीड़ को सड़कों पर कुचलवाने केे लिए परेड कराएगा। बड़ी अदालतें, बड़ी सरकारें, बड़े अफसर सब टुकुर टुकुर उसकी ओर देखते रहेंगे।

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मीडिया अपने मुंह पर कौरव सभा के खलनायकों की तरह पट्टी बांध लेगा। उसके संरक्षक, समर्थक, चाटुकार राजनीतिज्ञ, रसूखदार गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांध लेंगे। फिर भी वक्त है कि घने अंधेरे में कभी कभी बिजली कौंध ही जाती है। मध्यवर्ग के परिवार का एक नौजवान लाड़ला शिक्षित बेटा सत्र न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठकर बिगड़ैल हाथी की तरह के मनुष्य को बाग की नन्हीं कलियों को कुचलने वाले इंसान दीखते लेकिन हैवानियत का पुतला बने एक गैर जरूरी व्यक्ति बताकर बीस साल के लिए सलाखों के पीछे भेज देता है।

कैसा जमाना आ गया है। इतने वहशियाना कांड को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत और देश के सबसे बड़े नेता में जनआक्रोश का प्रतिनिधित्व इतिहास लिखने की इबारत की तल्खी लिए नहीं फूटा। देश के तमाम हाईकोर्ट औपचारिक तौर पर न्याय देने और कानून की बहस सुनने के काम में लगे हुए हैं। बीच बीच में अन्याय के अंधेरे में बिजली की वही कौंध होती है। वह लेकिन क्षणिक होती है।

उससे रोशनी का कोई पुंज, बिजली कारखाना या रात को रोशन बनाए रखने का सरंजाम कोख फूटकर बाहर नहीं आ रहा है। फिर भी अंधेरे घने जंगल में जुगनुओं की रोशनी से भी भटके राहगीर रास्ता तलाश लेते हैं। उनकी गुनगुनाहट में जीवन का संगीत भी सुनाई पड़ने लगता है। सीबीआई के ​​विशेष न्यायालय के न्यायाधीश की तरह पंजाब, हरियाणा उच्च न्यायालय ने इन्साफ का मानदंड स्थिर किया है।

हरियाणा की सरकार कुछ भी कहे। सरकारी मशीनरी के जरिए और बाबा कहलाते मुल्जिम और अब सजायाफ्ता कैदी की मदद जनता को महसूस हो रही थी। डेरा सच्चा सौदा में डेरा और सच्चा नाम के दोनों शब्द बेमानी हैं। वहां केवल सौदा होता रहा है। दौलत, राजनीतिक रसूख, अस्मत, चरित्र, जिंदगी, मौत और मौजूदा समय को बियाबान के कूड़ेदान में फेंकने का। लोकतंत्र के साथ बलात्कार करने का भी।

तथाकथित आश्रम में भक्तों, भक्तिनों के लिए आकर श्रम करने का आदेश तो था लेकिन आश्रम की पवित्रता नहीं थी। ऐसे तथाकथित आश्रम और इसकी पूरी संपत्ति से केवल उनकी क्षतिपूर्ति नहीं करनी चाहिए जिनकी जिंदगियों, संपत्तियों और प्रतिष्ठा वगैरह की हानि हुई है। पूरी संपत्ति राजसात भी होनी चाहिए। खुद अपनी तनख्वाह बढ़ाने वाले विधायक और सांसद और अदालतें भी संविधान और कानून की गोशालाएं हैं।

वहां गो माताएं भी पाली जाती हैं जो जीवन रहते वैतरणी पार कराती हैं। गाय जैसी इंसानियत भी हजारों, लाखों की संख्या में कत्ल करके उसे बीफ कह दिया जाता है। अध्यादेश, कानून, विधेयक, अधिनियम बनाकर देश के सभी संदिग्ध धार्मिकों की संपत्ति को एकबारगी जप्त करने का दो बरबाद की गई बच्चियों ने अवसर दिया है।

कहावत है समय पीछे से गंजा होता है। बाल और लटें सामने से ही पकड़नी चाहिए। अन्यथा हाथ के साथ वक्त फिसल जाएगा। दुनिया के चमन में भारत को इन्सानी तहजीब की आॅक्सीजन देने का स्त्रोत कहा गया है। दया, क्षमा, मोहब्बत, भाईचारा, करुणा, अतिथि सत्कार, कुर्बानी भी हर भारतीय के पसीने, आंसू और खून की बूंदे रही हैं। उनमें तेजाब भरा जा रहा है। छुतही बीमारियों के कीटाणु डाले जा रहे हैं। उनका चरित्र बदला जा रहा है।

मजहबी नफरत करने की पाठशालाएं चलाई जा रही हैं। सब खलनायक मिलकर पतन, मौत और बर्बादी का कोरस गायन कर रहे हैं। कौन कहता है कारपोरेटिए, बाबा, मौलवी, पादरी, साध्वियां, उजले चेहरे और काले मन के नेता, अपनी कलम का चरित्र का चलन बेचने वाले लेखक और पत्रकार एक ही थैली के चट्टे बट्टे नहीं हैं।

दूसरी तरफ पहाड़ जैसी ऊंचाई और समुद्र जैसा फैलाव तथा नदियों जैसा पवित्र जातिविहीन बहाव लिए हम सब सवा सौ करोड़ भारतीय भी हैं। हम अंकगणित की इकाइयां नहीं इतिहास के महानायक हैं। खलनायकों को निपटाने का वक्त धीरे धीरे प्रौढ़ होता ही गया है। ओ लोकतंत्र! तुम्हारी श्वास नलिका से बलगम नहीं निकाला गया तो तुम मर भी सकते हो।

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