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पुण्यतिथि विशेष: इंदिरा गांधी को ''गूंगी गुड़िया'' कहने वाले डॉ राममनोहर लोहिया के राजनितिक विचार

डॉ राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर उनकी यादें ताजा करने के प्रसंग में यह पंक्तियां लिख रहा हूं तो उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा अप्रैल, 2015 में विदेशी निवेश जुटाने के लिए की गई जर्मनी की महत्वाकांक्षी यात्रा जबरन बीच में घुसी आ रही है।

पुण्यतिथि विशेष: इंदिरा गांधी को
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डॉ राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर उनकी यादें ताजा करने के प्रसंग में यह पंक्तियां लिख रहा हूं तो उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा अप्रैल, 2015 में विदेशी निवेश जुटाने के लिए की गई जर्मनी की महत्वाकांक्षी यात्रा जबरन बीच में घुसी आ रही है। तब वे खुद को डाॅ. लोहिया और उनके विचारों की सबसे बड़ी वारिस बताने वाली समाजवादी पार्टी की ओर से इस देश के सबसे बड़े राज्य के इतिहास के अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री थे।

उक्त यात्रा के दौरान उन्हें पता चला कि डाॅ. लोहिया ने बर्लिन के फ्रेडरिक विलियम विश्वविद्यालय से, अब जिसका नाम बदलकर हम्बोल्ट विश्वविद्यालय कर दिया गया है, डाॅक्टरेट प्राप्त करने के लिए 1929 से 1933 के बीच कभी महात्मा गांधी के सामाजिक, आर्थिक दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर ‘भारत में नमक पर कराधान’ शीर्षक से जो थीसिस लिखी थी, वह विश्वविद्यालय के अभिलेखागार से गायब हो गई तो ट्वीट करके इस पर गहरा दुख और नाराजगी तो जताई ही, थीसिस को तलाशने की जरूरत पर भी जोर दिया।

अखबारों में यह खबर छपी और समाजवाद का खोल ओढ़े फिरने वाले कई सपाई-गैरसपाई नेता इसे लेकर बहुत रोना-धोना मचाने लगे तो एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने फेसबुक पेज पर खासे व्यंग्यात्मक लहजे में थीसिस का सुराग देते हुए लिखा-‘वह थीसिस तो उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में अधबने कनहर बांध में उन आदिवासियों व किसानों के खून से लिथड़ी पड़ी है, जो अपने विस्थापन का विरोध करते हुए पुलिस के बेंतों व बंदूकों के शिकार होकर रह गए। उसके कुछ पन्ने वहां पुलिस की संगीनों पर भी चिपके दिखे हैं।

मुख्यमंत्री चाहें तो उसे वहां से बरामद करवाकर बचा लें।’ पत्रकार की उक्त टिप्पणी के बाद सरकारी-गैरसरकारी समाजवादी हलकों में जैसी चुप्पी छायी, उससे जो एक बात सबसे ज्यादा स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है, वह यह कि 12 अक्टूबर, 1967 को नई दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में हुआ डाॅ. लोहिया की पौरुषग्रंथि का विफल आॅपरेशन सिर्फ उनकी जान ले सका था, लेकिन अब, उदारीकरण के सर्वथा अनुदार दौर में, जब राजनीतिक शुचिता, न्याय, समता और समाजवाद की उनकी व्याख्याएं गम्भीर खतरों का सामना कर रही हैं,

उनके विचारों की हत्या में उनके विरोधियों जितनी ही भूमिका उनके अनुयायियों की भी है। डाॅ. लोहिया ‘मार्क्स, गांधी ऐंड सोशियलिज्म’ शीर्षक पुस्तक लिख रहे होंगे तो उन्हें कतई इल्म नहीं रहा होगा कि एक दिन उनके अनुयायी भी उनके साथ एकदम वैसे ही सलूक पर आमादा हो जाएंगे, जैसा गांधी या कार्लमार्क्स के अनुयायी उनके साथ अरसे से करते आ रहे हैं।

पूंजीवाद के शोषक चरित्र से वाकिफ डाॅ. लोहिया उसकी साम्राज्यवादी जड़ें उखाड़ने के लिए मार्क्सवाद व गांधीवाद के कथित ‘अधूरेपन’ को दूर करके भारतीय संदर्भ में उनके समन्वय की जरूरत जताते और समाजवादियों का हठी व मठी में वर्गीकरण करते थे। उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे दो बड़े राज्यों में अरसे तक ‘लोहियावादी’ सरकारें रहने के बावजूद लोहिया की प्रखर वैचारिक विरासत अपने पवित्र उद्देश्य में ‘असफल’ होकर रह गई है तो उनके वे अनुयायी किसी भी तरह इसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते,

जो अपनी बारी पर बातें भले ही बड़ी-बड़ी करते रहे, कथनी-करनी की एकता प्रदर्शित नहीं कर पाए। डाॅ. लोहिया के लिए चुनावों में अपनी नीतियों को लेकर जनता के बीच जाना उनके नतीजे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था, लेकिन इन अनुयायियों के लिए जीत बड़ी और नीतियां गौण हो गई हैं। पिछड़ों को सौ में साठ की गांठ बांधने वाले लोहिया जाति तोड़ने का आन्दोलन चलाते थे और ये अनुयायी जातीय गोलबन्दियों को सत्ता की सबसे मुफीद सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करने के अभ्यस्त हो चले हैं।

लोहिया के निकट सच्चे लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी यह थी कि जिस पार्टी की सरकार हो, उसके कार्यकर्ता भी उसकी खराब रीति-नीति की निर्मम आलोचना करें। उन्होंने खुद एक गोलीकांड के बाद अपनी पार्टी की केरल सरकार से इस्तीफा मांग लिया था। ऐसे में क्या आश्चर्य कि लोहिया की विरोधी सत्ताएं भी उनसे अजीबोगरीब ढंग से पेश आती रही हंै।

23 मार्च, 1910 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अकबरपुर कस्बे में जन्मे लोहिया का अब मामूली माने जाने वाले पौरुषग्रंथि के आपरेशन के बाद फैले संक्रमण से देहांत हो गया तो इसलिए कि उन दिनों तक देश में ऐसे संक्रमणों से निजात दिलाने की बेहतर सुविधाएं नहीं थीं और विदेश जाकर आपरेशन कराने की डाॅक्टरों की सलाह उन्होंने मानी नहीं थी।

सत्ताओं ने कभी भी गरीबी, गैरबराबरी, आर्थिक मंदी या कि कश्मीर जैसी समस्याओं पर उनके दो टूक नजरिये को स्वीकार नहीं किया। लोहिया ‘हर संभव समानता’ के पक्षधर थे, लेकिन अब ‘हर संभव विषमता’ को अभय करने के लिए जनता को विकल्पहीन बनाकर विभिन्न खांचों में बांटने के जो उपक्रम चल रहे हैं। अलबत्ता, पूछना जरूरी है कि उनको उनके उन अनुयायियों से कौन बचा सकता है।

मुलायम ने अपने मुख्यमंत्रीकाल में मायावती के अंबेडकर पार्क की तर्ज पर लोहिया पार्क का निर्माण शुरू कराया तो चौधरी सिब्ते मोहम्मद नक़वी ने उनको कड़ा पत्र लिखकर पूछा था कि तुम लोहिया का कद उनके नाम पर बने पार्कों और मूर्तियों से तय करना चाहते हो? डाॅ. लोहिया इसके मोहताज नहीं हैं। वास्तव में उनको याद करना चाहते हो तो अपने कर्मों से याद करो, उनके रास्ते पर चलकर, उनके सपनों की सरकार चलाकर।

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