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''राज्यसभा चुनाव पर भूचाल, ''आप'' तो ऐसे नहीं थे''

वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र न था, वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है। फैज अहमद फैज की उपरोक्त पंक्तियां बहुत हद तक आम आदमी पार्टी (आप) की आंतरिक कलह की तस्वीर दिखाती हैं। राज्यसभा चुनाव पर भूचाल, ''आप'' तो ऐसे नहीं थे

वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र न था, वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है। फैज अहमद फैज की उपरोक्त पंक्तियां बहुत हद तक आम आदमी पार्टी (आप) की आंतरिक कलह की तस्वीर दिखाती हैं। आम आदमी पार्टी में एक बार फिर आतंरिक कलह चरम पर है। राज्यसभा चुनाव को लेकर पार्टी के अंदर भूचाल आ गया। पार्टी के अंदर कई गुट बन गए।

हालांकि आखिर में पार्टी के सर्वेसर्वा संरक्षक अरविंद केजरीवाल की ही चली और राज्यसभा चुनाव के लिए तीन नाम की घोषणा हो गई। इनमें संजय सिंह को छोड़ सुशील गुप्ता और नारायणदास गुप्ता बाहरी प्रत्याशी हैं। केजरीवाल के निर्णय से साफ है कि पार्टी अब केजरीवाल की होकर रह गई है। भ्रष्टाचार विरोधी लहर, आंतरिक लोकतंत्र और बदलाव जैसे तमाम वादों पर सवार होकर सत्ता में आई पार्टी व्यक्ति केंद्रित बन गई है।

राज्यसभा चुनाव पर आप में घमासान

बहरहाल, इस फैसले पर पार्टी के अंदर व बाहर घमासान मच गया है। आप के पुराने साथियों ने केजरीवाल की निष्ठा पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने टिकट बेचे जाने की भी आशंका जताई है। अब ये देखना दिलचस्प होगा आम आदमी पार्टी में जारी यह कलह कहां जाकर रुकता है। हालांकि कल तक दूसरी पार्टियों के आगे सुधार की बड़ी लकीर खींचने का वादा करने वाली यह नवजात पार्टी खुद सत्ता, सिद्धांतों और अहंकार की ज्वाला में भस्म होती दिखेगी, किसी ने सोचा भी नहीं होगा।

राज्यसभा चुनाव पर आप की तिकड़ी

अब सवाल है कि संजय सिंह को टिकट देने की ऐसी क्या मजबूरी थी? असल में संजय सिंह पुरानी कोटरी के सदस्य हैं। केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह एक साथ हैं। कुमार विश्वास या आशुतोष कभी भी इस तिकड़ी के सदस्य नहीं थे। सो, इन दोनों के ऊपर केजरीवाल का वैसा भरोसा नहीं था, जैसा सिसोदिया और संजय सिंह पर है।

राज्यसभा चुनाव पर भाजपा कांग्रेस

वहीं बाकी दो उम्मीदवार केजरीवाल ने आगे की राजनीति को ध्यान में रखकर तय किया है। साथ ही, उन्होंने भाजपा के बनिया वोट बैंक को अपने साथ जोड़े रखने और लगातार कम हो रहे चंदे की समस्या से निपटने के मकसद से दो गुप्ता उम्मीदवार बनाए। बहरहाल, इस बार कांग्रेस-भाजपा जैसी पार्टियों से नहीं बल्कि अपने पुराने साथियों से उनका आमना-सामना है।

राज्यसभा चुनाव पर दलित राजनीति

पार्टी की भीतरी लड़ाई ने इस आशंका को जन्म दिया है कि कहीं आप का हश्र भी उन दलों की तरह न हो जहां वन मैन शो की तर्ज पर काम हुआ है। उत्तरप्रदेश में बसपा पहले कांशीराम, फिर मायावती के नेतृत्व में आगे बढ़ी। उसके बाद, उनके साथ बराबरी से खड़े होने वाले नेता नहीं हुए। शिवसेना बालठाकरे के नेतृत्व में आगे बढ़ी, फिर उद्धव ठाकरे ने उसकी कमान संभाली है, लेकिन उनके साथ भी बराबरी से खड़े होने वाले नेता नहीं हैं।

राज्यसभा चुनाव पर पार्टी के अंदर कलह

राजद में लालू प्रसाद के साथ यही हाल है। आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल को उनके साथी,कार्यकर्ता अरविंद सर या बॉस नहीं अरविंद कहते हैं, लेकिन वे यह जानते हैं कि बराबरी से संबोधन के बावजूद पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया में वे बराबर नहीं हैं। आज खुद उनकी पार्टी के अंदर कलह ने जो बदशक्ल रूप दिखाया है, उसने देशभर की लाखों करोड़ों उम्मीदों को खाक कर रख दिया है।

राज्यसभा चुनाव पर पार्टी के अंदर कलह

सवाल यह है कि सभी एक ही झंडे के नीचे अपने राजनीतिक आंदोलन को एक मिशन के रूप में आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन सरकार बनने के बाद बीते दो साल में अचानक क्या हुआ जो एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलने लगे। हैरत की बात है कि दो साल के दौरान पार्टी के कई शीर्ष नेताओं को पार्टी से निकाल दिया गया। इन्हें पार्टी से निकाला क्यों गया? यह भला अरविंद केजरीवाल से बेहतर कोन जानता होगा।

राज्यसभा चुनाव पर केजरीवाल

खैर, आज तक वह दूसरी पार्टियों से अलग साफ-सुथरे चरित्र का दावा कर रही थी, लेकिन अब ‘आप’ किस मुंह से कहेगी कि वह दूसरी पार्टियों से खास है और लोग क्यों उसे सुनेंगे? केजरीवाल को अपनी नई पहचान को पुख्ता करने में खासा पसीना बहाना पड़ सकता है। अपने खिलाफ उन्होंने जो मोर्चा खड़ा कर लिया है, उससे जूझने में लगने वाली अतिरिक्त ऊर्जा उनके दिल्ली चलाने में मुश्किल बन सकती है।

राज्यसभा चुनाव पर हिसाब-किताब

अब तक अपने घावों को सहला रहे दूसरे दल भी हिसाब-किताब चुकता करने का गणित बैठा रहे होंगे। बहरहाल, 67 सीटों की ऐतिहासिक जीत के बाद भी आम आदमी पार्टी की विश्वसनीयता का मूल्यांकन उसके आंतरिक लोकतंत्र के आधार पर हो रहा है। आम आदमी पार्टी इस पैमाने पर खरी उतरी है या नहीं इस पर पक्ष विपक्ष में खूब चर्चा हैं। इतना ही नहीं आम आदमी पार्टी में क्या हो रहा है। क्या ये पार्टी भी बाकी पार्टियों जैसी हो गई है।

राज्यसभा चुनाव पर राजनीति

पिछले कुछ दिनों से यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल बन गया है। दूसरे दल के नेता और समर्थकों की भी दिलचस्पी बनी हुई है। यह तो दावा नहीं किया जा सकता कि आम आदमी पार्टी में जो कुछ घटित हो रहा है, वह राजनीति में पहली बार हो रहा है मगर बहुत ज़माने के बाद सुनने को तो मिल ही रहा है। यूं कहें इस तरह का संयोग राजनीति में दशकों में यदा-कदा ही आता है।

राज्यसभा चुनाव पर अलग दल

आम आदमी पार्टी सदाचार, ईमानदारी और पारदर्शिता की बात करते हुए लोगों के बीच आई। लोगों को उसने भ्रष्टाचारमुक्त दिल्ली और देश का सपना दिखलाया। माना कि देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए बहुमुखी व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता है, लेकिन क्या आप समेत किसी भी पार्टी ने अब तक इसके लिए कोई ठोस योजना प्रस्तुत की है? खैर, आम आदमी पार्टी का गठन तो इसलिए हुआ था कि वह औरों से अलग दल बनकर दिखाएगी, लेकिन वह तो ठीक औरों की तरह ही बनती जा रही है।

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