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राहुल गांधी जी इसे बेशर्मी की हद नहीं तो और क्या कहेंगें..?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सन 1984 में भड़के दंगों के लिए अपनी पार्टी को जिम्मेदार नहीं मानते। इसे बेशर्मी की हद नहीं तो और क्या कहेंगें? यह बात और है कि पंजाब में उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने यह कहा है कि उन दंगों में हरकिशन लाल भगत, सज्जन कुमार, धर्मदास शास्त्री, राजेश पायलट जैसे बड़े कांग्रेस के नेता लिप्त थे।

राहुल गांधी जी इसे बेशर्मी की हद नहीं तो और क्या कहेंगें..?
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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सन 1984 में भड़के दंगों के लिए अपनी पार्टी को जिम्मेदार नहीं मानते। इसे बेशर्मी की हद नहीं तो और क्या कहेंगें? यह बात और है कि पंजाब में उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने यह कहा है कि उन दंगों में हरकिशन लाल भगत, सज्जन कुमार, धर्मदास शास्त्री, राजेश पायलट जैसे बड़े कांग्रेस के नेता लिप्त थे।

ये क्या अपनी मर्ज़ी से दंगे करवा रहे थे? यदि यह इनकी अपनी योजना थी तो पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की? अबतक उन्हे सज़ा क्यों नहीं हुई? सबके सब दंगाइयों को पुरस्कार स्वरूप सांसद और मंत्री क्यों बनाया गया? राहुल गांधी को शायद यह मालूम नहीं होगा कि उनकी दादी की हत्या उन्हीं के एक सिरफिरे अंगरक्षक बेअंत सिंह ने की थी।

हत्या के बाद उनके पिता राजीव गांधी ने खुद कहा था, जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी़, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। जब भी कोई बरगद जैसा बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी तो हिलती ही है।

उनका यह बयान रिकार्ड पर है, अब उस बयान को उनके ही बेटे झुठलाने पर आमादा हैं। राजीव गांधी के उस बयान ने 1984 के भयावह सिख विरोधी दंगों को वाजिब ठहरा दिया था। अब मैं ज़रा अपना व्यक्तिगत अनुभव भी बताता हूं। तब मैंने उन काले दिनों को अपनी आंखों से देखा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सारे देश में बेहद तनावपूर्ण माहौल योजनाबद्ब तरीके से बना दिया गया था।

जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, ठीक उसी वक्त दिल्ली में कत्लेआम चालू हो चुका था। खून का बदला खून से लेंगें, सरदार सभी गद्दार हैं। इस तरह के भड़काऊ नारे लगाते हुए सैकड़ों हत्यारों का झुंड सिखों को सरेआम जिंदा जला रहा था। बच्चों और महिलाओं तक को नहीं बख्शा गया था। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं जैसे हरकिशन लाल भगत, जगदीश टाइटलर, धर्मदास शास्त्री, सज्जन कुमार आदि और सैकडों छुटभैये नेता सिखों के खिलाफ खुलेआम भीड़ को उकसा रहे थे।

क्या यह बात भी किसी से छिपी है? इन नेताओं को हजारों लोगों ने दंगा भड़काते हुए देखा। इसके बावजूद राहुल गांधी बेशर्मी से कह रहे है कि 1984 का दंगा कांग्रेस ने नहीं भड़काया। अब राहुल गांधी सिख विरोधी दंगों के लिए कांग्रेस को क्लीन चिट दे रहे हैं। राहुल गांधी ने यदि सिख विरोधी दंगों की किसी से जानकारी ली होती तो उन्हें मालूम चल जाता कि 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या हुई और एक नवंबर से देश में लोकतंत्र का खून हुआ।

अगले तीन दिन में देशभर में हजारों सिख मारे गए। अकेले दिल्ली में करीब तीन हजार से ज्यादा सिखों की हत्या हुई। पूर्वी दिल्ली में कल्याणपुरी, शाहदरा. पश्चिमी दिल्ली में सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, नांगलोई, दक्षिणी दिल्ली में पालम कॉलोनी और उत्तरी दिल्ली में सब्जी मंडी और कश्मीरी गेट जैसे कुछ ऐसे इलाके हैं जहां सिखों के पूरे-पूरे परिवार खत्म कर दिए गए।

सागरपुर, महावीर एनक्लेव और द्वारकापुरी, दिल्ली कैंट के वो इलाके हैं जहां सिख विरोधी हिंसा में सबसे ज्यादा मौते हुईं। हिंसा के शिकार लोग जब पुलिस से मदद मांगने गए तो पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया। यह तो थी वास्तविकता या पुलिस की मजबूरी। ऊपर का आदेश जो था? काश, राहुल गांधी को पता होता कि जब कांग्रेस के नेता सिखों को मार और मरवा रहे थे, तब अटल बिहारी वाजपेयी सिखों को बचा रहे थे।

अटल बिहारी वाजपेयी तब 6 रायसीना रोड के बंगले में रहते थे। उन्होंने एक नवंबर,1984 को अपने घर के बाहर भयावह दृश्य देखा। वहां टैक्सी स्टैंड पर काम करने वाले सिख ड्राइवरों पर हमला करने के लिए कांग्रेसी गुंडे पहुंच गए थे। वे तुरंत टैक्सी स्टैंड पर पहुंचे। उनके वहां पर पहुंचते ही खून के प्यासे गुंडे वहां से खिसक लिए। उसी दिन शाम को अटल जी केन्द्रीय गृहमंत्री पीवी नरसिंह राव से मिलने गए।

उन्हें राव से जलती दिल्ली को बचाने की पुरजोर अपील की। मैंने खुद बिहार और यूपी के मूल निवासी कई आईपीएस अधिकारियों से जो उस वक्त दिल्ली पुलिस में तैनात थे, बात करके उनसे कुछ करने के लिए कहा था। उनका जवाब था कि ऊपर का स्पष्ट आदेश है कि 72 घंटे तक कुछ नहीं करना है। गौर करें की राहुल गांधी के 1984 के दंगों की यादें ताजा करने के बाद कुछ बीमार मानसिकता वाले लोगों को अब 2002 में गुजरात में भड़के दंगे याद आने लगे हैं।

वे दावा कर रहे हैं कि वो दंगे गुजरात की मोदी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने भड़काए थे। मोदी को उन दंगों के लिए किसी भी जांच आयोग ने जिम्मेदार नहीं माना। उनके खिलाफ केन्द्र की यूपीए सरकार ने साक्ष्य जुटाने की हर संभव कोशिशें की। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इन लोगों के दोहरे चेहरे तब सबके सामने आ जाते हैं, जब वे गोधरा में 59 कारसेवकों को जिंदा जलाने का कतई उल्लेख नहीं करते।

वे यह भी नहीं बताते कि गुजरात के दंगे 59 निर्दोष और निहत्थे कारसेवकों को ज़िन्दा जलाने का जन प्रतिशोध था। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार में प्रमुख सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार भी कह चुके हैं कि 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। शरद पवार कई बार कह चुके हैं कि 2002 के गुजरात दंगा मामले में जब कोर्ट ने नरेंद्र मोदी को दोषमुक्त कर दिया है तो फिर उन्हें इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

27 फरवरी 2002 को सुबह साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर पहुंची थी। उस ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे सामान्य नागरिक बैठे थे, जो तीर्थयात्रा करके लौट रहे थे। उस ट्रेन को षड्यंत्र पूर्वक उन्मादी जिहादियों ने जलाया। उस हत्याकांड में 59 मासूम लोग जलकर राख हो गए। उस गोधरा कांड के बाद फैले भयानक दंगे ने जरूर *1044 लोगों की जान ले ली। निश्चित रूप से उस भयावह दंगों को कोई भूल नहीं सकता।

लेकिन मोदी को उन दंगों के लिए दोषी बताया जाना कहां तक मुनासिब है। जून 2009 में गठित विशेष अदालत ने 22 फरवरी 2011 को सुनाए अपने फैसले में 27 फरवरी 2002 *को हुए गोधरा कांड को एक पूर्व नियोजित साजिश करार दिया था। इस निर्णय ने साबित कर दिया था कि भारत की न्याय व्यवस्था की ईमानदारी पर सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता। पर जब कांग्रेस 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए बुरी तरह घिरी तो कुछ लोगों को गुजरात के दंगे याद आ गए। यही नहीं, वे उन दंगों की चर्चा करते वक्त गोधरा को भूलना भी चाहते हैं।

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