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नेहरु, अम्बेडकर, जेपी, लोहिया की सोच को पलीता लगा रहे राहुल गांधी

डॉ. चंद्र त्रिखा | UPDATED Jan 8 2019 5:34PM IST
नेहरु, अम्बेडकर, जेपी, लोहिया की सोच को पलीता लगा रहे राहुल गांधी

जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध। टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा। धर्मवीर भारती (Dharmveer Bharti) ने दशकों पहले अपनी कृति ‘अंधायुग’ में जो लिखा था वह 2019 की संसदीय जिंदगी की शुरुआत का सच है। नेहरु, अम्बेडकर, जेपी, लोहिया ने यह कभी नहीं सोचा था कि जिस संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद वे रख रहे हैं उसमें एक दिन ऐसा भी आएगा, जब प्रतिपक्ष का शिखर पुरुष देश के प्रधानमंत्री को ‘चोर’ कहकर पुकारेगा और सत्तापक्ष में बैठे लोग ‘मां-बेटा चोर हैं’ का कीर्तन शुरू कर देंगे।

प्रधानमंत्री से आप असहमत हो सकते हैं। आप उन पर संसदीय मर्यादाओं में रहते हुए कोई गंभीर आरोप भी लगा सकते हैं। मंत्रियों व पूर्व मंत्रियों को संसदीय कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, लेकिन यह मत भूलें कि इस सदन में प्रधानमंत्री, दल विशेष का प्रधानमंत्री नहीं कहलाता। वह देश का प्रधानमंत्री होता है। प्रतिपक्ष के नेता को संसदीय नियम इस बात का अधिकार देते हैं कि वह सत्तापक्ष पर कड़े से कड़े या गम्भीरतम आरोप लगाए। लेकिन भाषा की मर्यादा, संसदीय जिंदगी की पहली शर्त है।

इसी देश की इसी संसद में ऐसे लम्हे भी गुज़रे हैं जब सिर्फ एक रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेकर रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पद से इस्तीफा दे दिया था। एक वित्तमंत्री (टीटी कृष्णामाचारी) ने एक मामूली बीमा-कांड की नैतिक जिम्मेदारी उठाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया। एक प्रधानमंत्री (नेहरु) ने अपने निकटतम विश्वस्त मित्र एवं प्रतिरक्षा मंत्री (कृष्णा मेनन) से एक जीप-स्कैंडल में परोक्ष जिम्मेदारी के आधार पर त्याग-पत्र ले लिया था। यह सब मुमकिन है मगर मर्यादाओं की धज्जियांं उड़ाने का किसी को भी नैतिक, वैधानिक या संसदीय हक नहीं है।

इसी सदन में आचार्य कृपलानी ने जब अपने समय के प्रतिरक्षामंत्री कृष्णा मेनन के विरुद्ध तीखा हमला बोला था, तब सत्तापक्ष में बैठे किसी भी सदस्य ने टोका-टोकी नहीं की थी। आचार्य कृपलानी ने भारत-चीन युद्ध में भारतीय सेना की पराजय का सारा ठीकरा प्रतिरक्षामंत्री पर इस प्रबलता के साथ फोड़ा था कि श्री मेनन को नेहरु भी बचा नहीं पाए और उन्हें त्याग-पत्र देना पड़ा था, लेकिन आचार्य के भाषण में कहीं भी अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं हुआ था। डॉ. राम मनोहर लोहिया और पंडित जवाहर लाल नेहरु के प्रति देश की प्रति व्यक्ति आय को लेकर जो तीखी बहस चली थी, वह हमारी संसदीय जिंदगी का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। उस बहस में आंकड़ों का दबाव इतना था कि स्वयं पंडित नेहरु को भी अपनी भूल स्वीकार करनी पड़ी थी।

आचार्य कृपलानी, अटल बिहारी वाजपेयी, मधुलिममे, नाथपाई, एचवी कामथ, महावीर त्यागी, जॉर्ज फ़र्नांडीज आदि ऐसे असंख्य नाम हैं, जिन्हें संसदीय गरिमाएं आज भी सलामी देती हैं। यह सही है कि वे ज़माने लौटकर नहीं आएंगे। ‘नैतिक तकाज़े’ व ‘मर्यादाएं’ आदि लफ्ज़ तो संसदीय जिंदगी से कब के खारिज हो चुके, लेकिन यह तथ्य किसी भी शर्त पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ये सदन, तमीजदार, प्रबुद्ध एवं जवाबदेही वाली शख्सियतों के लिए गठित हुआ है। उसे तमाशे के मैदान में कभी भी बदला नहीं जा सकता। यह जिम्मेदारी सिर्फ विपक्ष की नहीं, सत्तापक्ष की भी है।

 ‘जो तटस्थ हैं, समय खिलेगा उनका भी अपराध’

कांग्रेस में वयोवृद्ध मोती लाल वोरा और गुलाम नबी आज़ाद की हैसियत अब कुछ भी नहीं है। वे उम्र के उस मोड़ पर हैं जहां खामोशी के साथ शेष उम्र काटनी होती है। वे कुछ नहीं बोलेंगे। अहमद पटेल के भी वे पुराने दिन नहीं रहे।

लेकिन संसद में सीताराम येचुरी व वी. राममूर्ति तो हैं। भले ही वामपंथी हैं, लेकिन उनकी बात सम्मान से सुनी जाती है। वे सब खामोश हैं। उनमें भी इतना मनोबल शायद शेष नहीं बचा कि वे दोनों पक्षों से विनम्र आग्रह कर सकें कि भाषा में संयम रखा जाए। इस दिशा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी पहल कर सकता है। संस्कृति व दार्शनिक चिंतन व सभ्य आचरण उसकी भी प्राथमिकता रखी है।

कांग्रेस के शिखर नेतृत्व को तो सिवाय समय के अब संभवत: कोई नहीं समझा सकता। जब एंटनी व मल्लिकार्जुुन खड़गे, हरीश रावत सरीखे धीरगंभीर नेता भी असमर्थ हैं तो अन्य दूसरी, तीसरी पंक्ति वालों की क्या बिसात, लेकिन संघ अपने संस्कारों में रचे बसे भाजपाई नेतृत्व को तो धीर गंभीर रहने की सीख दे सकता है। वैसे राजनेता कभी किसी से भी सीखते नहीं, न ही सीखना चाहते हैं। अब राहुल गांधी को कोई भी कांग्रेस नेता यह नहीं बताएगा कि संसद के भीतर उनकी आंख मारने या प्रधानमंत्री को ‘झप्पी’ देने की उनकी शैली, उनके प्रभामण्डल में कोई भी इज़ाफ़ा नहीं करती। रफेल-प्रकरण पर बहस के समय सदन में राहुल-ब्रिगेड के कुछ सांसदों द्वारा कागज के हवाई जहाज बनाकर उड़ाना एक बचकाना हरकत है और निंदनीय है। यह सब बताता है कि वे संसद की गरिमाओं का मर्म कतई नहीं समझते। उन्हें रोका भी नहीं गया। न राहुल ने रोका, न सोनिया गांधी ने और न ही खड़गे ने।

राजनेताओं को संभवत: ‘ईवैंट मैनेज़रों’ ने बताया है कि आक्रामक शैली न हो तो कोई नोटिस नहीं लेता। लेकिन नेताओं को यह भी समझना होगा कि संसद कोई ऐसी प्रदर्शनी नहीं जिसमें शख्सियतों को उत्पाद के तौर पर स्थापित किया जाना या बेचा जाना है। यहां के 120 करोड़ बाशिंदों की ज़िन्दगी, सहज, सार्थक व सुखद बनाने के फैसले होते हैं।


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