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भावनात्मक नहीं ज्वलंत मुद्दों की बात करें राहुल

जब् अपनी सरकार की कोई उपलब्धि नहीं होती है और ऐसे समय में चुनाव होने वाले हों तो राजनीति का तकाजा यही होता है कि आम मतदाताओं को पार्टी के नेताओं द्वारा बरगलाया जाए अर्थात उन्हें भावनात्मक मुद्दों के आधार पर जोड़ने की कोशिश की जाए और विरोधियों को खरी-खोटी सुनाई जाए।

भावनात्मक नहीं ज्वलंत मुद्दों की बात करें राहुल
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जब् अपनी सरकार की कोई उपलब्धि नहीं होती है और ऐसे समय में चुनाव होने वाले हों तो राजनीति का तकाजा यही होता है कि आम मतदाताओं को पार्टी के नेताओं द्वारा बरगलाया जाए अर्थात उन्हें भावनात्मक मुद्दों के आधार पर जोड़ने की कोशिश की जाए और विरोधियों को खरी-खोटी सुनाई जाए। इससे दो बातें सधती प्रतीत होती हैं। पहली, सतही तौर पर यह आभास होता है कि पार्टी जनता और देश के प्रति चिंतित है और दूसरी, पार्टी थोड़े समय के लिए मतदाताओं से छद्म जुड़ाव महसूस करती है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी यही कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह याद रखना होगा कि चुनावों में वे इस तरह से लोगों का मनोरंजन तो कर सकते हैं, तालियां भी बटोर सकते हैं पर इसका लाभ नहीं मिलेगा। लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहा है। चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर चुका है। कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्र सरकार की हर मोर्चे पर नाकामी जगजाहिर है। राज्यों में भी कांग्रेस की सरकारों की स्थिति ठीक नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी चुनावी सभाओं में सरकार के काम काज को बताने की बजाय लोगों को भावनात्मक रूप से भड़का रहे हैं। इस तरह वे लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि कभी वे अपनी मां, सोनिया गांधी, की बीमारी की बात कर रहे हैं, कभी दादी, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, की हत्या की बात कर रहे हैं, कभी पापा, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, की हत्या की बात कर रहे हैं, तो कभी अपने को मारे जाने की बात कर रहे हैं। आज देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है वैसी स्थिति में लगता नहीं कि इसका उनको कोईज्यादा फायदा मिले। अजीबोगरीब स्थित है। वे जिम्मेवार पद पर बैठे हैं, पूरी कांग्रेस की कमान एक तरह से उनके हाथों में है, वे अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार हैं। ऐसे में राहुल गांधी को चाहिए की जरूरी मुद्दों पर बात करें। इंदिरा और राजीव की याद दिलाकर इमोशनल अत्याचार जैसी ओछी राजनीति उन्हें शोभा नहीं देती पर दुर्भाग्य हैकि केंद्र सरकार की ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है, जिसे वे गिनाएं, तो उन्हें ठीक लगता है कि वे इस तरह के मुद्दे उठाएं। इस तरह वे बहुत-सी ठोस हकीकतों को नजरअंदाज कर रहे हैं। उन्हें अपनी ही यूपीए सरकार-2 के कार्यकाल में 2जी, कॉमनवेल्थ गेम्स, मनरेगा और कोलगेट सरीखे ऐसे भ्रष्ट कांड हुए हैं, जिनका भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में कोई सानी नहीं मिलता। ब्यूरोक्रेसी व राजनेता के बीच एक ऐसा नापाक गठबंधन, इसी यूपीए-2 के कार्यकाल में उजागर हुआ है, जिसका कोई उदाहरण नहीं मिलता। आलम यह है कि वह आज तक इन मुद्दों से एक बार भी मुखातिब नहीं हुए। अब तक देखा गया है कि वे उन मुद्दों को कभी नहीं छूते, जिनका ताल्लुक उनकी अपनी पार्टी वाली सरकारों से है। उन्हें विपक्षी दलों की सरकारों और मंत्रियों के दागदार चेहरे दिखाई देते हैं, मगर अपनी सरकार और मंत्री के कारनामे दिखाई नहीं देते। वे युवा हैं, उन्हें चाहिए कि मुद्दों की राजनीति करें, उन ज्वलंत मुद्दों का, जिनसे देश आज जूझ रहा है। बड़े प्रश्नों पर नहीं बोलेंगे और चर्चा नहीं करेंगे तो देश उन्हें अपरिपक्व मानता रहेगा!

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