Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

दलितों के सवाल पर सियासत उचित नहीं

दलितों को एक बड़े वर्ग ने हमेशा दबाकर रखा। न उन्हें वाजिब सम्मान दिया और न मौके।

दलितों के सवाल पर सियासत उचित नहीं
X

सभी इस तथ्य से भली भांति अवगत हैं कि हमारे समाज का ताना-बाना किस तरह का रहा है। किस प्रकार की समस्याएं रही हैं। बहुत लंबा दौर ऐसा गुजरा है, जब खासकर दलितों को एक बड़े वर्ग ने हमेशा दबाकर रखा। न उन्हें वाजिब सम्मान दिया और न मौके। तरह तरह से उन्हें अपमानित किया जाता रहा। उन्हें समाज के ठेकेदारों ने ऐसे काम सौंपे, जिन्हें हेय माना जाता था।

खासकर ग्रामीण भारत में दलितों को साथ बैठाने, फैसलों में शामिल करने और मंदिरों आदि में समान रूप से पूजा-अर्चना तक की अनुमति नहीं दी जाती थी। ऐसे दृष्टांत तो अब भी सामने आते हैं, जब दलित परिवार को घुड़चढ़ी तक से रोक दिया जाता है। इस तथ्य से कौन इंकार कर सकता है कि अधिकांश गांवों में दलितों को बाहरी क्षेत्रों में ही अपने घर आदि बनाने को विवश किया जाता रहा है।

आजादी के बाद बेशक सभी क्षेत्रों में विकास हुए हैं। कहीं कम कहीं अधिक लेकिन स्वतंत्रता के बरसों बाद तक भी दलितों, पिछड़ों और महिलाओं को विकास धारा में शामिल होने से रोका जाता रहा। सदियों से उनके साथ जिस तरह का भेदभाव होता रहा, उसे देखते हुए ही उन्हें राजनीति, शिक्षा, नौकरियों आदि में आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। आवास बनाने के लिए जगह और धन उपलब्ध कराने की योजनाएं बनाई गईं, परन्तु इसमें भी रोड़े अटकाने के प्रयास होते रहे।
इस सबके बावजूद कह सकते हैं कि पिछले दो-तीन दशकों में उनकी माली हालत में गुणात्मक सुधार हुए हैं। सरकारी सेवाओं के साथ-साथ पढ़े-लिखे दलित वर्ग के युवाओं युवतियों को निजी क्षेत्र में भी सेवा के अवसर मिले हैं। दूसरे वर्ग के पढ़े लिखे लोगों की उनके प्रति दृष्टि भी बदली है।
चूंकि राजनीतिक तौर पर उनकी चिंताएं की जा जाने लगी हैं और अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम के बन जाने से उन पर होने वाले अत्याचारों के आरोपियों पर शिकंजा कसा जाने लगा है, इसलिए कानून के खौफ से एक बड़े वर्ग में यह संदेश भी चला गया है कि बरसों से प्रताड़ित इस वर्ग के साथ अब अन्याय नहीं किया जा सकता।
इस सबके बावजूद सामंती मानसिकता वालों की आज भी समाज में कमी नहीं है। यत्र-तत्र दलितों पर अत्याचार की घटनाएं होती ही रहती हैं। पहले मीडिया का इतना विस्तार नहीं था, जिसके चलते घटनाएं सामने नहीं आ पाती थीं। अब चाहे मारपीट की वारदात हो, यौन उत्पीड़न हो या किसी भी तरह की हिंसा हो, वह न केवल सामने आती है, बल्कि शासन-प्रशासन को त्वरित गति से उस पर कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ता है।
यह एक सामाजिक समस्या है, जिसका समय के साथ ही निराकरण होगा। बहुत बड़ा वर्ग दलितों को अब न केवल बराबरी का हक और सम्मान देता है, बल्कि घटना होने के बाद कंधे से कंधा मिलाकर उनके साथ खड़ा भी होता है लेकिन इधर के कुछ वर्षों में यह भी देखने को मिल रहा है कि राजनीतिक जमातें दलितों के खिलाफ होने वाली छोटी-बड़ी घटनाओं पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से बाज नहीं आती हैं। राजनीतिक लाभ लेने की उसमें ऐसी होड़ दिखाई देने लगी है कि इस चक्कर में वह ये भी भूल जाती हैं कि किसी घटना को हद से ज्यादा तूल देने से सामाजिक तनाव भी बढ़ सकता है।
कोई घटना होती है, तब कानून अपना काम करता ही है। मीडिया और दूसरे सामाजिक संगठनों के अपने दबाव ऐसे में काम करते ही हैं, परन्तु पार्टियों के झंडों के साथ जिस तरह संसद से लेकर सड़कों तक पर प्रदर्शन होने लगे हैं, वह चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। खासकर किसी प्रदेश में अगर चुनाव होने वाले हों, तब वहां के हालात इस तरह के धरने-प्रदर्शनों से और भी चिंताजनक हो जाते हैं। राजनीतिक दलों को सोचना होगा कि दलितों के सवाल पर सियासत कितनी उचित है।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलोकरें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story