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विकेश कुमार बडोला का लेख : चीन को घेरेगी क्वाड चौकड़ी

हाल ही में जापान की राजधानी टोक्यो में क्वाड राष्ट्रों के विदेश मंत्रियों के बीच प्रत्यक्ष बैठक हुई। बैठक मूलतः हिंद प्रशांत, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी लद्दाख स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के आक्रामक सैन्याचरण को देखते हुए की गई थी। बैठक में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के चार प्रमुख लोकतांत्रिक राष्ट्रों ने स्थिरता सुनिश्चित करने का संकल्प लिया गया है। क्वॉड देशों का चीन के विरुद्ध उभरा आक्रामक अभियान अन्य कारणों से भी प्रेरित है। इनमें प्रमुख कारण है महामारी कोरोना। कोरोना उत्सर्जन और प्रसारण के सिद्धदोषों से चीन कूटनीतिक प्रयासों से मुक्त नहीं हो पा रहा।

विकेश कुमार बडोला का लेख : चीन को घेरेगी क्वाड चौकड़ी
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विकेश कुमार बडोला

राष्ट्र-परराष्ट्रों में समाचारों और जानकारियों का मकड़जाल इस प्रकार फैल चुका है कि मीडिया में विश्व जगत की प्रमुख घटनाओं की उद्देश्यपरक और सार्वभौमिक कल्याणकारी विवेचना हो ही नहीं पा रही। विश्व की ऐसी ही एक प्रमुख घटना 6 अक्टूबर को जापान की राजधानी टोक्यो में क्वाड राष्ट्रों नामतः अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों के बीच प्रत्यक्ष भेंटवार्ता के रूप में सम्पन्न हुई। कोरोना के उत्तर काल में इन चार राष्ट्रों के लिए इस मंच के अन्तर्गत यह भेंटवार्ता अति अनिवार्य थी। भारत के विदेश मन्त्री एस. जयशंकर ने क्वॉड की बैठक में चीन के दुराचरण से संबंधित समस्त क्षेत्रीय और समुद्री गतिविधियों पर गंभीर आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि भारत क्वॉड हो या कोई अन्य वैश्विक मंच, सभी स्थानों से नियमों पर आधारित विश्व व्यवस्था, क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के मान-सम्मान तथा किसी भी क्षेत्र अथवा विषय के विवादों के शान्तिपूर्ण हल हेतु प्रतिबद्ध है। बैठक में भारत की प्रमुख चिंता चीन का आक्रामक और मनमाना आचरण ही था। इस संबंध में जयशंकर ने कहा कि भारत ऐसी नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने के लिए कटिबद्ध है जिसमें विधि के शासन, पारदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय समुद्रों में नौवहन की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के प्रति विश्व के प्रमुख राष्ट्र सम्मान भाव रखें।

क्वॉड की यह बैठक मूलतः हिंद प्रशांत, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी लद्दाख स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के आक्रामक सैन्याचरण को देखते हुए की गई थी। चार राष्ट्रों की इस भेंटवार्ता में चीन की भूमिमूलक आक्रामक विस्तारवादी नीतियों पर बहुविध संयुक्त प्रयासों के माध्यम से अंकुश लगाने की कार्यनीतियों पर व्यापक सहमति बनी। इस बैठक में नए जापानी प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा, जापानी विदेश मंत्री तोशीमित्सु मोटेगी, भारतीय विदेशी मंत्री एस. जयशंकर, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और आस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री मारिस पैने ने भागीदारी की थी। जापान शासन ने टोक्यो में सम्पन्न बैठक के उपरान्त जो क्वॉड-वक्तव्य प्रस्तुत किया उसके अनुसार हिंद-प्रशांत क्षेत्र के चार प्रमुख लोकतांत्रिक राष्ट्रों ने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने का संकल्प लिया है, जिसके अन्तर्गत क्वॉड राष्ट्रों के 2014 से पहले लिए गए संयुक्त कार्यकारी संकल्पों को भी पुनः क्रियान्वयन की परिधि में लाना सुनिश्चित हुआ है। इसमें मालाबार संयुक्त सैन्य अभ्यास के अंतर्गत चारों राष्ट्रों की थल, जल और नभ सेना का पारस्परिक चरणबद्ध सैन्य अभ्यास प्रमुख है। साथ ही हिंद प्रशांत क्षेत्र में समुद्री मार्गों सहित मुख्य भूमिगत मार्गों पर चीन की सामरिक और व्यापारिक एकाधिकारमूलक कार्यनीति पर संयुक्त अंकुश लगाने के कार्यक्रम भी सम्मिलित हैं।

उल्लेखनीय है कि 2007-2008 में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे की पहल पर आरंभ हुए क्वॉड समूह का प्रमुख उद्देश्य हिंद प्रशांत क्षेत्र में एक संतुलित सामरिक और व्यापारिक वातावरण बनाकर राष्ट्रों के लिए उनकी अभिक्षमता के अनुरूप प्रगति अवसर उपलब्ध कराना था। आरंभ में इस उद्देश्य हेतु सहयोग करने तत्कालीन अमेरिकी उप-राष्ट्रपति डिक चेने, आस्ट्रेलियाई प्रधानमन्त्री जॉन हावर्ड और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी आगे आए, परंतु शीघ्र ही चीन ने अपने कूटनीतिक प्रयासों से चारों राष्ट्रों की क्वॉड आधारित एकता को तोड़ना आरंभ कर दिया। चीन की इस कूटनीतिक विजय पर ग्रहण तब लगा जब भारत में मोदी और अमेरिका में ट्रंप सत्तारूढ़ हुए। फलस्वरूप जापान और आस्ट्रेलिया भी क्वॉड के आधारभूत क्षेत्रीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पुनः भारत और अमेरिका के साथ मिलकर काम करने लगे।

क्वॉड मंत्रीसमूह की बैठक के अतिरिक्त भारतीय व अमेरिकी विदेश मंत्रियों के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी हुई, जिसमें अमेरिकी विदेश मन्त्री माइक पोम्पियो ने भारत को अवगत करवाया कि चीन उसके साथ शांतिवार्ता करने के प्रति किंचित भी गंभीर नहीं। अमेरिका ने अपने अनुसंधान के आधार पर हिंद प्रशांत क्षेत्र सहित दक्षिण चीन सागर और पूर्वी लद्दाख में चीन की गुप्त कार्रवाइयों के बारे में जो भी जानकारियां भारत को उपलब्ध कराई, उससे गलवान संघर्ष के उपरान्त भारत-चीन के विदेशी व रक्षा मंत्रियों के साथ-साथ सैन्य कमांडरों व जनरलों के मध्य होनेवाली और हो रही शांतिवार्ताओं का अनुपयोगी सत्य उजागर हुआ है। इस संदर्भ में अमेरिकी विदेशी मंत्री ने क्वॉड बैठक के एक हफ्ते के बाद जो स्पष्टीकरण दिया है वह चीन के विश्वासघाती चरित्र का स्पष्ट प्रमाण है। पोम्पिया के अनुसार हिंद प्रशांत, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी लद्दाख में चीन की विस्तारवादी कार्यनीतियों को केवल शांति वार्ताओं के माध्यम से कभी भी नहीं सुलझाया जा सकता, बल्कि इसके लिए चीन पर आक्रामक होना समय की मांग है। पोम्पियो के अनुसार चीन ने पूर्वी लद्दाख सीमा पर अपने 60 हजार सैनिकों की तैनाती कर रखी है। वस्तुतः क्वॉड के इतर पोम्पियो और जयशंकर के बीच जो भी चर्चा हुई थी, उसका प्रमुख बिंदु चीन पर क्वॉड राष्ट्रों द्वारा संयुक्त सैन्याक्रामक कार्रवाई करने से ही संबंधित था।

सत्य यह है कि हिंद प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा उत्सर्जित क्षेत्रीय समस्याएं व्यापक व्यापारिक दृष्टिकोण को देखते हुए अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान और भारत सहित अनेक अन्य दक्षिण एशियाई देशों की समस्याएं भी हैं, जबकि पूर्वी लद्दाख सहित अन्य भारतीय सीमा-क्षेत्रों में उत्पन्न चीनमूलक समस्याएं मूलतः भारत की समस्याएं है। भारत को दोनों ही मोर्चों पर चीन के अतिक्रमण से मुक्ति चाहिए। अतः अमेरिका भारत से यह अपेक्षा कर रहा है कि क्वॉड सहित अन्य बहुपक्षीय व एकपक्षीय मंच से चीन के विरुद्ध सैन्याक्रामक रूप में मुखर होने की जो भी निर्णायक नीति बननी है, वह भारत की स्पष्ट सहमति से ही बननी है। क्वॉड देशों का चीन के विरुद्ध उभरा आक्रामक अभियान अन्य कारणों से भी प्रेरित है। इनमें प्रमुख कारण है सदी की महामारी कोरोना। कोरोना उत्सर्जन और प्रसारण के सिद्धदोषों से चीन लाख कूटनीतिक प्रयासों से मुक्त नहीं हो पा रहा।

चीन इस बात से भलीभांति अवगत है। इसी पृष्ठभूमि में उसके राष्ट्रपति शी चिनफिंग की नवंबर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अप्रत्यक्ष रूप में वीडियो माध्यम से भेंटवार्ता होनी है। हालांकि भारत और विश्व के लिए यह चीन की एक और समय-व्यतीत करने वाली चाल होगी, जिससे उसके विस्तारवादी मूल चरित्र में परिवर्तन आने वाला नहीं है। चीन पर जैसा नियंत्रण क्वॉड राष्ट्र चाहते हैं, उसके लिए चीन से कोई भी शांति वार्ता नहीं की जानी चाहिए। यदि क्वॉड राष्ट्र कर सकें तो हिंद प्रशांत, दक्षिण चीन सागर सहित पूर्वी लद्दाख में स्थित चीन की अवैध सैन्य दल तैनाती एवं अवसंरचनाओं की स्थिति को ध्वस्त करने हेतु एक संयुक्त सैन्य कार्रवाई कर ही दें। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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