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पंजाबी कहानी : बेबसी

नटनी अपने सिर पर तीन घड़े उठाए हवा में लंबित रस्सी के बीचों-बीच खड़ी है। वह कहती है जब तक उसे फ्लैट नहीं मिलता,आगे नहीं बढूंगी

पंजाबी कहानी : बेबसी
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-रतन सिंह-

जलसे की कार्यवाही को देखकर यह अहसास होता था कि कोई बुनियादी जरूरतों और खुशियों की बाल्टी अपने सिर पर रखे आगे बढ़ता तो है लेकिन रास्ते असमतल होने के कारण कभी वह बाल्टी गिर जाती है, कभी छलक जाती है और आबेहयात वहां तक पहुंच नहीं पाता, जहां उसे पहुंचना चाहिए। और नटनी अपने सिर पर तीन घड़े उठाए हवा में लंबित रस्सी के बीचों-बीच खड़ी है। वह कहती है जब तक उसे फ्लैट नहीं मिलता, आगे नहीं बढूंगी।
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सिर पर पानी की भरी हुई बाल्टी रखे यह बूढ़ी औरत बैठै-बैठे ही हाथों के बल पर जब आगे सरकती है, तो बाल्टी के संतुलन को कायम रखने के लिए इसे अपनी गर्दन को अकड़ाकर रखना पड़ता है। ऐसा करते हुए उसकी गर्दन की नसें फूल जाती हैं और कंधों के पट्ठे बार बार अकड़ते सिकुड़ते हैं गर्दन में निरंतर तनाव के कारण दर्द होता रहता है, लेकिन क्या मजाल कि पानी की बाल्टी सिर से गिर जाए।
गिरना तो दूर रहा, वह इस सावधानी से आगे बढ़ती है कि आज तक किसी ने पानी छलकते भी नहीं देखा। और अगर कभी बाल्टी गिरी भी हो या पानी छलक भी गया हो तो किसी के देखने से भी क्या होता है जी। और फिर अगर उसे कोई देख भी ले तो इससे बुढ़िया को शर्मिंदगी क्यों हो? आखिर वह कोई खेल तो दिखा नहीं रही।
यह तो उसकी अपनी जरूरत है। जब हालात ने उसे ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां उसे अकेले ही जिंदगी की लाश को ढोना है, तो पानी अपने सिर पर उठाकर झोपड़ी तक पहुंचाना उसके लिए जरूरत बन गया है।अगर उसकी गर्दन का संतुलन बिगड़ जाए, पानी की बाल्टी गिर जाए, तो हो सकता है, उसकी टेढ़ी-मेढ़ी, असमतल पगडंडी पर ऐसी फिसलन हो जाए कि वह फिसलन उसे मौत की गहरी घाटियों में ढकेल दे।

अपाहिज तो वह पहले से ही है। जरा सी चूकी, तो वह संभलेगी कैसे? और फिर इस तरह नल और झोपड़ी का दरम्यानी फासला उसकी उम्र की तरह लंबा नही हो जाएगा? अत: उसके लिए यह जरूरी है कि नल से लेकर झोपड़ी तक के दरम्यानी फासले में उसकी गर्दन और कंधों के पट्ठो में चाहे जितनी ऐंठन हो, चाहे जितना दर्द हो, लेकिन सिर पर रखी पानी की बाल्टी जो उसके लिए आबेहयात अमृत का दर्जा रखती है, गिरने न पाए। और वाकई उस औरत की जितनी तारीफ करनी चाहिए कि उस आबेहयात का बोझ लेकर वह दिन में कई बार चलती है, सुबह और शाम, और पानी की हर बूंद को लेकर वह झोपड़ी में पहुंच जाती है।
झोपड़ी, जहां उसका तीन पत्थरों का बनाया हुआ चूल्हा, जिसमें आग जलाकर वह अपने लिए खाना बनाती है। खाना जो जिंदगी की बुनियादी जरूरत है। शहर के लिए, मैदान के किनारे उस बुढ़िया की झोंपड़ी है। यह एक बहुत बड़ा मैदान है। इस झोपड़ी के एक तरफ रेलवे स्टेशन के चार मंजिल क्वार्टरों का है।
दूसरी तरफ आलीशान कोठियों की और जिस सड़क के किनारे यह मैदान स्थित है, उसकी दूसरी तरफ एक सिनेमाघर है, और एक बच्चों का स्कूल। इसलिए उस मैदान में काफी रौनक रहती है। कहीं बंदरिया और भालू का नाच होता है, तो कहीं मदारी मजमा लगाए अपनी वाक्पटुता से तमाशाइयों का गिरोह अपने गिर्द इकट्ठा किए रहते हैं।
और फिर जब कभी राजनीतिक जलसे होते हैं, तो उस मैदान में इतनी भीड़ हो जाती है कि इंसानों की उस भीड़ में उस बुढ़िया की झोपड़ी कहीं छिप सी जाती है। जैसे, थोड़ी देर के लिए यह बुढ़िया उस भीड़ से अपनी टूटी हुई झोपड़ी को बचाने के लिए अपने सिर पर उठाकर किसी दूसरी जगह ले जाती हो। जो बूढ़ी औरत अपने अपाहिज जिस्म पर आबेहयात की भरी हुई बाल्टी उठाए पैदाइश से बुढ़ापे का लंबा सफर कर सकती है, उसके लिए थोड़ी देर के लिए झोंपड़ी को उठाकर दूसरी जगह रख देना कौन सा मुश्किल काम है? और फिर मुश्किल तो उन लोगो के लिए चिंताजनक होती है, जिन्हें उनको हल करने की अक्ल न हो, मुश्किलों को हल करने का फन न आता हो। और मुश्किलों को हल करने का फन न आता हो तो जिंदगी वाकई अजीर्ण हो जाती है।
कुछ इसी तरह के हालात से इन दिनों उस मैदान में एक बंदर नचानेवाला दो-चार है। बंदर की बंदरिया से शादी हो गई है। बंदर दूल्हा बना, सिर पर टोपी पहने, एक पंजे से सोटी पकडेÞ जब बंदरिया को साथ लेकर चलने लगा, तो बंदरिया ने पूछा, ‘तुम्हारा घर कहां है?’ बंदर ने बुढ़िया की झोपड़ी की तरफ इशारा कर दिया कि वह है। इस पर बंदरिया ने ससुराल जाने से इनकार कर दिया। और जब बंदर ने पूछा कि तुम किस तरह के घर में रहोगी, तो बंदरिया ने पहले कोठियों की तरफ इशारा किया। बंदर ने जबाव दिया, ‘यह तो मेरी औकात के बाहर है।’ उस पर बंदरिया ने रेलवे फलैटों की तरफ इशारा किया कि कम से कम ऐसा घर तो हो ही।
बंदर ने मजबूर होकर हां कर दी और उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। जब फिर भी बंदरिया अपनी जगह से टस से मस न हुई तो बंदर ने पूछा, ‘अब क्या मसला है?’ बंदरिया ने सड़क पर जाती हुई कार की तरफ इशारा किया, जिसका मतलब था, ‘दुलहिन बन कर जा रही हूं। कार लाओगे तो चलूंगी।’ इस पर बंदर तो बंदर, खुद बंदरिया नचाने वाले ने अपना सिर पीट लिया और बोला, ‘हे भगवान, फ्लैट और कार तो इस दिशा में सौ में से निन्यायवे आदमियों को नसीब नही है तो ये चीजें तुम्हें कैसे मिल जाएंगी?’
लेकिन बंदरिया थी कि अपनी बात पर अड़ गई और मदारी के लाख समझाने और बंदर के लाख मिन्नत-मलानत के बावजूद ससुराल जाने के लिए तैयार न हुई, और आखिर हारकर मदारी को तमाशा अधूरा ही खत्म करना पड़ा।अगर बंदरिया ससुराल जाने के लिए राजी हो जाती, तो मदारी डुगडुगी बजाता हुआ उस दुलहिन को तमाशियों के पास पैसे मांगने के लिए भेजता, लेकिन जब बंदरिया ने ही जिद पकड़ ली, तमाशाई भी एक एक करके खिसकने लगे और और मदारी बेचारे को उस रोज अपनी मेहनत की पूरी मजदूरी न मिल सकी।
अगर यह एक दिन की बात होती, तो कोई बात नहीं थी। सुना है कि तमाशे में जब भी ससुराल जाने की बात आती है, तो बंदरिया कोठी और कार की मांग कर देती है, और तमाशा अधूरा ही रह जाता है। मदारी अपनी जगह परेशान है। उसे बंदरिया को सधाना और नचाना तो आता है, लेकिन बंगला और कार कैसे हासिल हो सकती है, यह फन उसे नहीं आता। इसलिए उसका तमाशा अधूरा रह जाता है तो आमदनी अधूरी रह जाती है। उधर बंदर परेशान है। शादी हुई है लेकिन दुलहिन से मिलन नसीब नहीं।
और फिर जब बच्चों ने जाकर उस बुढ़िया को बता दिया कि बंदरिया भी उसकी झोपड़ी में आकर रहने के लिए तैयार नहीं, तो कभी कभी बुढ़िया के सिर पर रखी बाल्टी भी डोलने लगती है और उसके लिए ऐसे मौकों पर बाल्टी का संतुलन कायम रखना मुश्किल हो जाता है। इसीलिए इधर कुछ दिनों से जब बंदर नचाने वाला नहीं आया तो इस बुढ़िया ने बड़ी राहत महसूस की है। अब उसी जगह, जहां बंदर का तमाशा होता था, वहां दोपहर के वक्त डुगडुगी के बजाय ढोलक की थप गूंजती है और तमाशा होने लगता है।
पहले अपने वर्जिशी जिस्म को तोड-मरोड़ कर दिल को हिला देने वाला करतब करता है फिर जब काफी भीड़ इकट्ठी हो जाती है, तो नटनी तीन मीटर तनी हुई रस्सी पर संतुलन कायम रखते हुए जब एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ आहिस्ता आहिस्ता बढ़ती है, तब नट जोर-जोर से ढोलक बजाता है और नटनी जब अपनी जान जोखिम में डालकर जिंदगी के दुर्गम रास्ते पर चलती है, तब नट घूम-घूम कर तमाशाइयों से पैसे वसूल करता है।
इस बुढ़िया को रस्सी तो नहीं दिखाई देती। उसे तो ऐसा लगता है जैसे नटनी हवा में लटकी हो या हवा में चल रही हो। कभी-कभी नटनी अपने सिर पर तीन मटके रखकर और हाथ में लंबा सा बांस लेकर संतुलन रखती हुई जब आगे बढ़ती है तो नटनी तो नटनी, खुद तमाशाइयों की सांसें थम जाती है और जब वह सकुशल दूसरे सिरे पर पहुंच जाती है, तो तालियां बजती है। वाह-वाह होती है और नट ढोल बजाता हुआ पैसे इकट्ठे करता है। कुछ दिन तो यह खेल चलता रहा।
नट बहुत खुश था कि इस मैदान में जब से उसने खेल दिखाना शुरू किया, तब से अच्छी आमदनी होने लगी है। इर्द-गिर्द के लोग खुशहाल हैं । इसलिए पैसे भी दिल खोलकर देते हैं । लेकिन एक दिन फिर वही हुआ, जो बंदर नचाने वाले के साथ हुआ था, यानी नटनी अपने सिर पर तीन घडेÞ उठाए जब रस्सी के ऐन बीच में पहुंची तो उसके पांव रुक गए।
नट जोर-जोर से ढोल पीटने लगा और उसे आगे बढ़ने के लिए ललकारने लगा, लेकिन नटनी के पांव वहीं जमकर रह गए। नट घबराया, कहीं नटनी के पांव कमजोर तो नहीं पड़ गए। कहीं उसके पांव में प्रकंपन तो नहीं आ गया। कहीं वह अपने हाथों में थमे हुए बांस के सहारे संतुलन कायम रखना तो नहीं भूल गई, लेकिन ऐसा कु छ नहीं हुआ था।
तब नटनी ने भी पूछने पर यही कही था, ‘मैं इतना मुश्किल करतब दिखाती हूं मुझे भी सामने खड़ी इमारतों में जगह मिलनी चाहिए।’ नट ने बहुत समझाया, ‘हम लोग हमेशा से ही झोपड़ियों में रहते आए हैं। यह बड़ी-बड़ी इमारतें बड़े लोगों को शोभा देती हैं।’ लेकिन नटनी टस से मस न हुई। और आखिर नट का खेल भी उस दिन अधूरा ही रह गया।
नटनी तो वहीं से कूदकर जमीन पर उतर आई। लेकिन नट ने समझा, जैसे उसके सिर पर रखी बाल्टी छलक गई हो। उसे चिंता हो आई कि अब हम लोगों का गुजारा कैसे चलेगा?जिस दिन नटनी ने अपना करतब अधूरा छोड़ा उसके कुछ दिनों बाद ही उसी मैदान में बहुत बड़ा अवामी जलसा हुआ, जैसे कि अकसर हुआ करता था, उस दिन हमेशा ही बड़ी भीड़ थी और उस भीड़ में अपाहिज बुढ़िया की झोपड़ी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।
राजधानी से शायद कोई बड़ा नेता आया था। इसलिए सरकारी कर्मचारियों की भी खासी तादाद उस भीड़ में मौजूद थी, और वे साफ-सुथरे कपडेÞ, बड़े सजग सचेत, फुर्ती से इधर-उधर यों ही चल-फिर रहे थे, जैसे वह अपनी जिम्मदारी की बाल्टी अपने सिर पर बड़ी होशियारी से उठाए हुए हों। इसके बावजूद उस जलसे में अव्यवस्था की यह हालात थी कि उस मैदान मेंं जितनी सफाई होनी चाहिए, उतनी हो नहीं पाई थी। जगह-जगह गंदगी बिखरी हुई थी।
किसी को भी यह ख्याल नहीं आया था कि जहां गरमी के दिनों में इतनी भीड़ होगी, वहां पीने के पानी का प्रबंध भी होना चाहिए। थोड़ा बहुत पीने के पानी का प्रबंध किया भी तो वहां मंच पर, जहां नेता का आना था। मैदान की तरफ आने वाली सड़क के ऊपर से लीपा पोती बैठे जरूर हुई थी, फिर भी अगर कोई सावधानी न कर पाए तो पांव ऊपर-नीचे पड़ने की आशंका थी और फिर जब कार्यवाही शुरू हुई तो कुछ माइकों ने काम करना बंद किया, कुछ ने नहीं किया।
रोशनियां कहीं पूरी जल रही थीं कहीं आधी और कहीं-कहीं तो अंधेरा भी था। ऐसे में जनता में कुछ लोग काली झंडियां लिए आए नेता के खिलाफ नारे लगा रहे थे और कार्यवाही में खलल डालने की कोशिश कर रहे थे और पुलिस के कर्मचारी थे कि बेबस और प्रकटत: घबराए हुए अपनी जगह पर खड़े बेचैन हो रहे थे।यह सब देखकर ऐसा लगता था, जैसे वे लोग, जिनके जिम्मे इस जलसे में, रोशनी वगैरह का काम है, उनके सिरों पर रखी उनकी जिम्मेदारी की बाल्टी या तो रास्ते में गिर गई है या काफी हद तक छलक गई है, जिनके कारण सब प्रबंध अधूरा सा है। इस जलसे में राजधानी से आए हुए नेता ने जो भाषण दिया, उसका सारांश था कि हम गरीबी और दरिद्रता को दूर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सदियों की गुलामी और पीढ़ियों की गरीबी को दूर करने के लिए कुछ वक्त तो चाहिए।
हमने बडेÞ-बड़े बांध बनाए हैं, ताकि बिजली पैदा हो और अंधेरा दूर हो। बड़े बड़े कारखाने बनाए हैं। उनकी तेज रफ्तार मशीनों के साथ कौम में हरकत पैदा हो। नए-नए स्कूल और यूनिवर्सिटियां खोली हैं, ताकि मस्तिष्कों में विद्या की रोशनी आए, लेकिन क्या करें मसले बड़े गंभीर और उलझे हुए हैं, इसलिए इन सबको फायदा अभी नहीं मिल पाया।
इस जलसे की कार्यवाही को देखकर यह अहसास होता था कि कोई बुनियादी जरूरतों और खुशियों की बाल्टी अपने सिर पर रखे आगे बढ़ता तो है लेकिन रास्ते असमतल होने के कारण कभी वह बाल्टी गिर जाती है, कभी छलक जाती है और आबेहयात वहां तक पहुंच नहीं पाता, जहां उसे पहुंचना चाहिए। और बंदरिया है कि कोठियों में रहने के सपने देख रही है। और... और... नटनी अपने सिर पर तीन घड़े उठाए हवा में लंबित रस्सी के बीचों-बीच खड़ी है। वह भी कहती है, जब तक उसे फ्लैट नहीं मिलता, आगे नहीं बढूंÞगी। नट ढोल पीट रहा है और नटनी पर असर नहीं होता।
और इस जलसे के बाद अपने घरों को लौटने वाली भीड़ के बीच में से होती हुई एक अपाहिज बुढ़िया अपने हाथों के बल पर चलती हुई अपने सिर पर पानी की भरी हुई बाल्टी रखे बडेÞ इत्मीनान से ऊंची-नीची डगर से गुजरती हुई अपनी झोपड़ी की तरफ बढ़ रही है। और आश्चर्य है कि वह पानी की बाल्टी न गिर रही है, न डोल रही है, और न छलक रही है।
अनुवाद-सुरजीत
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