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पुलवामा आतंकी हमला : आस्तीन के सांपों को कुचलना जरूरी

कश्मीर के पुलवामा आतंकी हमले में 40 से ज्यादा जवान शहीद हुए, जबकि अभी तक करीब 20 जवान ज़ख्मी हैं। शहादत का आंकड़ा कहां जाकर थमेगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। यह अभी तक का सबसे भयावह, खौफनाक, वीभत्स आतंकी हमला है। यह कश्मीर की सरज़मीं का सबसे बड़ा आतंकी हमला है। यह कश्मीर और भारत के आस्तीन के सांपों का साजिशाना हमला है।

पुलवामा आतंकी हमला : आस्तीन के सांपों को कुचलना जरूरी
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Pulwama Terrorist Attack : कश्मीर के पुलवामा आतंकी हमले में 40 से ज्यादा जवान शहीद हुए, जबकि अभी तक करीब 20 जवान ज़ख्मी हैं। शहादत का आंकड़ा कहां जाकर थमेगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। यह अभी तक का सबसे भयावह, खौफनाक, वीभत्स आतंकी हमला है। यह कश्मीर की सरज़मीं का सबसे बड़ा आतंकी हमला है। यह कश्मीर और भारत के आस्तीन के सांपों का साजिशाना हमला है।

यह कश्मीर के स्थानीय नौजवानों को बहका, भटका कर पाकिस्तान का एक और छायायुद्ध है। कश्मीर के भीतर का आतंकवाद समाप्त होने के बजाय अफगानिस्तान, सीरिया, इराक और सोमालिया के स्तर का आतंकवाद बन रहा है। बेशक सेना, सुरक्षा बल और कश्मीरी पुलिस का ऑल आउट ऑपरेशन बेहद कामयाब रहा है। बीते साल 250 से ज्यादा आतंकियों को मौत के घाट उतारा गया।

इस साल 2019 में अभी तक 28 आतंकी ढेर किए जा चुके हैं, लेकिन जवानों की शहादत भी देश को झेलनी पड़ी है। बेशक आतंकियों की लाश्ों बिछाई जा रही हैं, लेकिन गद्दारों और आस्तीन के सांपों की भीतरी जमात अब भी बरकरार है। बीते साल 192 कश्मीरी आतंकी बने हैं, यह बेहद चिन्ता का सवाल है। यदि भेदिए नहीं होते तो सीआरपीएफ के 2547 जवानों और 78 वाहनों के काफिले की सटीक जानकारी कैसे लीक होती और आतंकियों तक पहुंचती?

चूंकि हमला सटीक और कारगर था, लिहाजा तय है कि आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर राजमार्ग के उस हिस्से की रेकी भी की होगी और अपनी रणनीति बनाने में कामयाब भी रहे। पाकिस्तान में अब भी सक्रिय आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद ने हमले की जिम्मेदारी ली है। पुलवामा में ही काकापोरा के रहने वाले सिर्फ 20 वर्षीय आदिल अहमद डार को आतंकी हमला अंजाम देने वाला माना जा रहा है।

उसने करीब 350 किलोग्राम विस्फोटक से भरी एसयूवी काफिले की बस से भिड़ा दी, नतीजतन बस के परखच्चे उड़ गए, धमाकों की आवाज़ 10 किमी तक सुनाई दी और देखते ही देखते राजमार्ग जवानों की लाशों से पट गया। विस्फोट के बाद भी आतंकियों ने काफिले पर फायरिंग की, लिहाजा साफ है कि आतंकियों की संख्या ज्यादा थी।

यह भी स्पष्ट है कि पाकिस्तान और जैश ने हमले की साजि़श्ा बदली हैं, क्योंकि सीमापार से घुसपैठ करना अब असंभव सा हो गया है। घुसपैठियों को सरहद पर ही ढेर कर दिया जाता है। रक्षा विश्ोषज्ञों का मानना है कि जब तक पाकिस्तान की मौत नहीं होगी, तब तक कश्मीर समस्या और आतंकवाद का स्थायी समाधान नहीं होगा।

जब तक पाकिस्तान जि़न्दा रहेगा। तब तक हमले जारी रहेंगे, लिहाजा पाकिस्तान के खिलाफ एक और नहीं, लगातार सर्जिकल स्ट्राइक की मांग देश कर रहा है। पाकिस्तान के अंदर घुसकर हमले बोलने होंगे। यह हमारे रक्षा विश्ोषज्ञों के आग्रह हैं। आर्थिक रूप से विपन्न पाकिस्तान पर हमलों का यह सही वक्त है। बहरहाल वह फैसला हमारी कैबिनेट सुरक्षा समिति और सेना आपस में विमर्श करके करेंगे।

बेशक हमारे 44 जवान शहीद हुए हैं। इतने जवान कितने कठिन प्रशिक्षण के बाद तैयार किए जाते हैं! 44 परिवारों, घरों, गांवों में मातम पसरा है। कई आंगनों में दीपक बुझ गए हैं, लिहाजा वहां सन्नाटे और अंधेरे हैं। बेशक देशभर में शोक की लहर है, लेकिन यह आंसू बहाने या छाती पीटने का वक्त नहीं है। गुस्सा और आक्रोश भी स्वाभाविक है।

यह बेहूदा राजनीति का भी वक्त नहीं है, लिहाजा फ़ारुक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और हुर्रियत के नेताओं को बेनकाब किया जाए। जो पत्थरबाजों, आतंकियों के समर्थक हैं। उन्हें जेल की सलाखों के पीछे फेंकने का वक्त आ गया है। आस्तीन के सांपों को पालने वाली ऐसी जमात को कुचलने का वक्त आ गया है, जो देश के टुकड़े–टुकड़े करने की हिमायती है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई मुख्यमंत्रियों ने आतंकी हमले की निन्दा की है।

प्रधानमंत्री ने इसे अमानवीय कृत्य करार दिया है और देश को भरोसा दिलाया है कि ये शहादतें व्यर्थ नहीं जाएंगी। कश्मीर में आतंकवाद को फैले 30 साल हो चुके हैं और करीब 45008 मासूम जानें जा चुकी हैं। बेशक अब आतंकवाद कश्मीर घाटी के मात्र 4–5 जिलों तक ही सिमट कर रह गया है। मात्र 10 फीसदी आबादी ही आतंकवाद समर्थक है, लेकिन वही खतरनाक और जानलेवा साबित होती रही है। लिहाजा रणनीतियां बदलनी पड़ेंगी। फिलहाल हिन्दुस्तान प्रतीक्षा कर रहा है कि हमारी सरकार और सेना, पाकिस्तान और आतंकियों के खिलाफ कैसा पलटवार करती हैं?

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