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पुलवामा आतंकी हमले के सबूत : पठानकोट और उरी के सबूत पर नापाक ने नहीं उठाए कोई कदम

क्या कारण है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को पुलवामा आतंकी हमले पर सफाई देनी पड़ रही है। क्या वजह है कि वह भारत से मिन्नतें कर रहे हैं कि वह पाकिस्तान का हाथ होने के सबूत दे तो वह हर किस्म की जांच करवाने को तैयार हैं। क्या भारत ने मुंबई हमले के सबूत पाकिस्तान को नहीं सौंपे थे। संसद पर हुए अटैक के अकाट्य सबूत नहीं दिए थे।

पुलवामा आतंकी हमले के सबूत : पठानकोट और उरी के सबूत पर नापाक ने नहीं उठाए कोई कदम

क्या कारण है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को पुलवामा आतंकी हमले पर सफाई देनी पड़ रही है। क्या वजह है कि वह भारत से मिन्नतें कर रहे हैं कि वह पाकिस्तान का हाथ होने के सबूत दे तो वह हर किस्म की जांच करवाने को तैयार हैं। क्या भारत ने मुंबई हमले के सबूत पाकिस्तान को नहीं सौंपे थे। संसद पर हुए अटैक के अकाट्य सबूत नहीं दिए थे।

पठानकोट और उड़ी के तथ्य उसे नहीं सौंपे थे? पठानकोट एयरबेस पर हमले के बाद तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के कहने पर पाकिस्तानी जांच एजेंसिंयों तक को घटनास्थल तक जाने की इजाजत दी गई थी, जिसकी बाद में आलोचना भी हुई परंतु पाकिस्तान ने क्या किया। क्या एक भी मामले में आज तक ट्रायल शुरू कर वहां छिपे गुनहगारों को सजा दी? वह सबूत किस बात के मांगता है।

क्या यह पर्याप्त नहीं कि वहां जन्म लेने वाले आतंकी यहां वारदातें कर रहे हैं और पकड़े जा रहे हैं अथवा मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। आतंकियों के रूट का सिरा पाकिस्तान के किसी न किसी ट्रेनिंग कैंप से जाकर जुड़ता है। उनके पास से जो हथियार और विस्फोटक मिल रहे हैं, वह पाकिस्तान के हैं। जिनसे वे दिशा निर्देश लेते हैं, उनके ठिकाने पाकिस्तान में हैं और वहां की सेना उन्हें संरक्षण और सुरक्षा उपलब्ध करा रही है।

पूरी दुनिया जानती है कि हाफिज सईद, मौलाना मसूद अजहर और दाऊद इब्राहिम जैसे आतंकवादी पाकिस्तान में छिपे हुए हैं। इनमें से कुछ तो सार्वजनिक रूप से सभाएं करते हैं और भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। क्या इमरान खान नहीं जानते कि पाक सेना की देखरेख में कहां-कहां आतंकवादी प्रशिक्षण कैंप चलाए जा रहे हैं और उन्हें किस तरह सेना सीमा पार कराकर तबाही के लिए भारत भेजती है।

क्रिकेटर से नेता और अब प्रधानमंत्री बने इमरान खान लाख सफाई दें कि पुलवामा हमले से उनके देश का कुछ लेना-देना नहीं है परंतु तथ्य इसकी गवाही दे रहे हैं कि चालीस जवानों के कातिल सीमा पार से आए थे और जिस विस्फोटक का इस्तेमाल किया गया है, वह भी पाकिस्तानी सेना ने आईएसआई के जरिए जैश ए मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को उपलब्ध कराया था।

जो दो आतंकवादी दो दिन पहले सेना ने पुलवामा के ही एक गांव में मार गिराए हैं, उनमें से कामरान पाकिस्तानी था और पुलवामा हमले से पहले लगातार मसूद अजहर से निर्देश ले रहा था। भारतीय सेना और सुरक्षाबल हर उस जख्म का जवाब सूद समेत देने में सक्षम है, जो सीमा पार से दिया जाता है। पुलवामा का हिसाब भी किया जाना तय है। भारत की मौजूदा सरकार जीरो टोलरेंस पर काम कर रही है।

पिछले चार-साढ़े चार साल में जितने आतंकवादी घाटी में मारे गए हैं, उतने इस अवधि में कभी नहीं मारे गए। पुलवामा की घटना कोई छोटी नहीं है, जिसे भुला दिया जाए। एक साथ इतने जवान यदि शहीद कर दिए जाएं तो इसका खामियाजा भुगतने के लिए दुश्मन को तैयार रहना चाहिए। पूरे देश में जिस तरह का आक्रोश है,

उसे शांत करने का एक ही तरीका है कि पुलवामा का ऐसा बदला लिया जाए कि जो भी इसके पीछे रहे हैं, उनकी रूह कांप जाए और आगे से इतनी बड़ी गलती करने की हिमाकत कभी नहीं कर पाएं। जहां तक बातचीत और जांच कराने की इमरान खान की पेशकश का सवाल है, इस सबके पीछे कोई और नहीं कायर पाकिस्तानी सेना है,

जिसे बड़ा खामियाजा भुगतने का डर सता रहा है। इमरान खान हों या उनसे पहले के प्रधानमंत्री, वे सेना की कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं हैं। भारत को अब सख्त से सख्त कदम उठाने और आतंकियों, उनके आकाओं और पाक सेना को कड़ा सबक देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। और यही इस समय पूरा देश चाहता है।

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