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साहित्य और सोशल मीडियाः विधाओं में तोड़फोड़

रवीश कुमार की किताब ‘इश्क में शहर होना’ इस साल राजकमल प्रकाशन की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब है।

साहित्य और सोशल मीडियाः विधाओं में तोड़फोड़

प्रियदर्शन

हिंदी में इन दिनों लप्रेक की धूम है। रवीश कुमार की किताब ‘इश्क में शहर होना’ इस साल राजकमल प्रकाशन की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब है। राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम ने हाल ही में सोशल मीडिया पर यह जानकारी दी कि इस किताब की आठ हज़ार प्रतियां बिक चुकी हैं। रवीश एक संवेदनशील पत्रकार हैं और दृश्यों को अपने ढंग से देखने, वृत्तांतों को अपने ढंग से रचने का कौशल उन्हें आता है। उनकी कहानियां दिल्ली की अपनी धुकधुकी बनाती हैं।लप्रेक उर्फ़ लघु प्रेम कथा की इस शृंखला को राजकमल अपने उपक्रम सार्थक की मार्फ़त और आगे बढ़ा रहा है और उसने विनीत कुमार और गिरींद्र नाथ झा की किताबों की घोषणा भी कर दी है।

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सोशल मीडिया पर ये दोनों लेखक अपनी संवेदनशील लघु-कथा भाषा के लिए जाने जाते हैं। हालांकि हिंदी के कई पारंपरिक कथाकार इस बात से कुछ मायूस हैं कि लप्रेक ने लघुकथा आंदोलन की उनकी विरासत को हड़प लिया है। वे याद दिला रहे हैं कि एक दौर में उन्होंने लघुकथा आंदोलन को बिल्कुल राष्ट्रीय रूप दिया, लगातार उसके सम्मेलन किए, उनकी वजह से साहित्यिक पत्रिकाओं ने लघुकथा विशेषांक निकाले, लेकिन अचानक यह लप्रेक आकर ऐतिहासिक होने का संदिग्ध और गलत दावा कर रहा है।मगर लघुकथा आंदोलन और इस लप्रेक धारा का एक बड़ा फर्क यह है कि जहां लघु कथा आंदोलन साहित्य की मुख्यधारा से जैसे जुड़ा रहा और उसकी मान्यता चाहता रहा, वहीं यह लप्रेक कथा के पुराने अनुशासन से, साहित्य की पुरानी भाषा से लगभग निर्द्वंद्व ढंग से मुक्त है, इसे साहित्य की मुख्यधारा की मान्यता पाने की फिक्र नहीं है।

लघुकथा आंदोलन हिंदी के पारंपरिक मध्यवर्गीय समाज के भीतर, गांव-देहात की कशमकश में अपनी कहानियां खोजता था, जबकि लप्रेक मूलतः महानगरीय अभिव्यक्ति है- मेट्रो और बसो में दौड़ते-भागते जीवन के बीच फिसलते बिंबों को पकड़ने की कोशिश। बेशक, इसमें पुराने शहरों की यादें भी शामिल हैं और जड़ों से उखड़ने की कसक भी। लेकिन अंततः यह मेट्रो में बन रही नई चेतना की, इक्कीसवीं सदी के सोशल मीडिया से विकसित संवेदन संसार की कथा है जिसे छापने वालों को इसके टिकाऊ से ज़्यादा बिकाऊ होने की परवाह है- इसमें शक नहीं कि वह बिक रही है और हो सकता है, उसमें कुछ टिक भी जाए।बहरहाल, मुद्दा लप्रेक नहीं है, बल्कि सोशल और नए मीडिया के विस्तार के बाद, उसके दबाव में साहित्य की विधाओं पर पड़ रहा उसका असर है। कुछ साल पहले जयपुर के लिटफेस्ट में कहानी 140 के नाम से बाकायदा एक प्रतियोगिता हुई थी जिसमें कई युवा रचनाकारों ने हिस्सा लिया था। प्रभात रंजन और सत्यानंद निरुपम ने अपनी कई कहानियां वहां रखीं। यह दबाव सिर्फ हिंदी में नहीं, दूसरी भाषाओं में भी महसूस किया जा रहा है।

आधुनिकता में लोक भाषा का समागम

बाकायदा एक ट्विटर हैंडिल टेल्स ऑन ट्वीट के नाम से मौजूद है जिसे एक भारतीय मनोज पांडेय ही चलाते हैं। हाल में द गार्डियन ने ब्रिटिश लेखकों को ट्विटर फिक्शन लिखने का न्योता दिया। हिंदी में ट्विटर-कहानी लिखने की चुनौती भले किसी बड़े लेखक ने नहीं उठाई, लेकिन अंग्रेज़ी में सलमान रुश्दी तक ने इस विधा में हाथ आजमाया। उनके इस ट्वीट-फिक्शन पर भी उनकी अपनी छाप दिखाई पड़ता है- ‘वह मर गई। उसने उसका अंडरवर्ल्ड तक पीछा किया। उसने हदीस को तरजीह दी, लौटने से इनकार कर दिया। ठिकाने लगाए जाने से पहले लंबा सफ़र तय किया जाना था। (She died. He followed her into the underworld. She refused to return, preferring Hades. It was a long way to go to be dumped." )
टेल्स ऑन ट्वीट पर जीत तायल की एक कहानी पड़ी हुई है- ‘तो इस तरह ये ख़त्म होता है। तुम चांदनी रात में चीनी ढोलों की आवाज़ पर जागते होः तुम्हारी आवाज़ उसका नाम ले रही है, आह, कांग शा।‘

हालांकि पारंपरिक नज़रिए से देखें तो इनको मुकम्मिल कहानियों का या साहित्य का नाम देना मुश्किल है। ये बस प्रतिक्रियाएं या मन में उमड़ने वाली छायाएं हैं जिनमें एक तरह का लेखकीय कौशल ज़रूर झांकता है,. मगर वह समग्रता नहीं जो किसी रचना को साहित्य में बदलती है। बेशक, किसी बहुत समर्थ लेखक में शायद इस विधा के इस्तेमाल का फन भी हो, और तब इसकी संभावनाएं ठीक से खुलें, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि साहित्य की दुनिया इसके असर में बदल रही हैं। हिंदी में चलने वाली बहसों पर भी इसकी छाया है। कुछ अरसा पहले लखनऊ में हुए ‘कथाक्रम’ के आयोजन के एक सत्र में दिया गया वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा का एक वक्तव्य सोशल मीडिया के भीतर चर्चा का विषय बना रहा।

इस आयोजन में सोशल मीडिया पर बात करते हुए नासिरा शर्मा ने बड़ी सख्ती से कहा कि वे नई तकनीक के दबाव में ख़ुद को नहीं बदलेंगी। उनके वाक्य थे- 'नई दुनिया का ख़ौफ़ दिखाकर हमें मत डराइए। आज भी हिंदी में एक लेखकों की ऐसी पीढ़ी है जो क़लम से क़ाग़ज़ पर लिखती है, सम्मान से छपती है और उसके अपने पाठक हैं, ये नए नख़लिस्तान आपको मुबारक। हमें वहाँ जाने की जरूरत नहीं, अगर आपका दिल करे तो बता देना अपनी उस दुनिया को कि हम किस कब्रिस्तान में गड़े है'।
जाहिर है, सोशल मीडिया पर दिख रहा और उसके असर में बदल रहा साहित्य पारंपरिक ढंग से हो रहे लेखन के सामने एक दुविधा, एक द्वंद्व की स्थिति तो प्रस्तुत कर रहा है। हालांकि इस द्वंद्व को ठीक से समझने के लिए इसके सरलीकरणों के पार जाकर यह समझना होगा कि दोनों में नया क्या है, पुराना कितना है, कितना उपयोगी, बेमानी या फिर महान है।
इस लिहाज से अगर विचार करें तो हम पाते हैं कि दरअसल जिसे हम साहित्य की दो दुनियाओं की तरह देखने की कोशिश कर रहे हैं, वे एक-दूसरे से कटी या एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी दुनियाएं नहीं हैं। साहित्य की वह पहली दुनिया- जो पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के पारंपरिक संसार से निकली है- कई बार बेहद आधुनिक, क्रांतिकारी और अंतर्दृष्टि से भरी मिलती है- बल्कि वह परंपरा से हासिल ज्ञान से कहीं ज़्यादा समृद्ध् है और अक्सर सोशल मीडिया पर लिख रहे युवा रचनाकार उसे उत्साह से उद्धृत करते या उसी तर्ज पर कुछ और लिखने की कोशिश करते पाए जाते हैं। साहित्य की वह परंपरा इस लिहाज से इस नई परंपरा के लिए भी मशाल का काम कर रही है। इसी तरह सोशल मीडिया पर एक तकनीक-समृद्ध पीढ़ी जो कुछ लिख रही है, वह ज़रूरी नहीं कि हमेशा नया और अद्यतन हो, उसमें पुराने की छाया ही नहीं, कई बार कठमुल्लेपन का भी समर्थन ख़ूब मिलता है।
बेशक पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया और सोशल मीडिया के संसार में एक बुनियादी लगता फर्क है। पत्र-पत्रिकाओं में एक संपादक होता है जिसके पास अच्छे-बुरे के बीच चयन का विशेषाधिकार होता है। उसमें यह संभावना होती है कि ख़राब लेखन छांट दिया जाएगा और अच्छी रचनाएं सामने आएंगी। दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया अगाध निजी लोकतांत्रिकता का माध्यम है। हर कोई अपनी बेझिझक अपनी असंपादित रचना लगा सकता है और अपनी छोटी सी मित्र मंडली में खुश रह सकता है। इस सुविधा ने जहां कई नई और संभावनाशील कलमों से हमारा परिचय कराया है, वहीं बहुत बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया पर ऐसे साहित्य को प्रतिष्ठित किया है जो मूलतः कचरा है, पुराने की नकल है या उसका पुनरुत्पाद है।
लेकिन क्या पत्र-पत्रिकाओं की जो सुविचारित-सुसंपादित दुनिया है, वह ऐसे बेमानी साहित्य को कुछ कम प्रतिष्ठा देती है? हिंदी की औसत पत्रिकाओं को पढ़कर निराशा होती है। लगभग हर जगह बड़े पैमाने पर मामूली किस्म की रचनाएं बहुत आत्मविश्वास के साथ छापी जाती हैं और उन्हें साहित्य में भी बड़ा साबित करने के आलोचकीय उद्यम दिखाई पड़ते हैं। यह पत्र-पत्रिकाओं का ही नहीं, किताबों का भी मामला है। अगर आप बेशर्मी से अपनी समीक्षा लिखवा सकने वाले और संपादकों पर रोज़-रोज़ आग्रह का दबाव बना कर छपवा सकने वाले लेखक हैं तो आपकी किताब चर्चा में आ सकती है, लेकिन अगर आप संकोच कर जाते हैं, अगर आप यह चाहते हैं कि संपादक अपने विवेक से आपकी किताब चुनकर आलोचक के पास भेजे तो आप एक बड़ी भूल करते हैं। इस बात की संभावना नहीं के बराबर है कि साहित्य के मठाधीश आपकी चर्चा करें।
कुल मिलाकर दिखता यही है कि परंपरा से जो लेखन चला आया है, वह अपने अच्छे और बुरे दोनों रूपों में सोशल मीडिया पर मौजूद है। फिर भी कुछ फ़र्क हैं जिन्हें रेखांकित किया जाना ज़रूरी है। पत्र-पत्रिकाओं और किताबों की दुनिया अपने सारे निजी पूर्वग्रहों के बावजूद अंततः एक सांस्थानिक दुनिया है। स्वाभाविक तौर पर इस दुनिया के अपने आग्रहों-दुराग्रहों, अपने प्रचलनों का कहीं ज़्यादा असर लेखन पर पड़ता है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया की दुनिया बिल्कुल निजी प्रयत्नों की दुनिया है- लेखन वहां कहीं ज़्यादा स्वच्छंद, विधाओं के अनुशासन से मुक्त और इसलिए नई विधाएं गढ़ सकने में सक्षम दिखता है।
लप्रेक इसी अनगढ़ता की पैदाइश है। लेकिन वह अनगढ़ है, इसलिए कमतर नहीं है। बल्कि वह बदलती हुई संवेदना को शायद दूसरी ठहरी हुई विधाओं के मुक़ाबले बेहतर ढंग से पकड़ रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर और भी बहुत सारे लेखक हैं जो ऐसी नई विधाएं गढ़ रहे हैं। प्रमोद सिंह का लेखन इस लिहाज से विशिष्ट और उल्लेखनीय है। जो गद्य वह लिख रहे हैं वह नितांत पठनीय है और किन्हीं विधाओं की परिभाषा में नहीं आता। सच यह है कि सोशल मीडिया के संसार में वे शायद सबसे समृद्ध तोड़फोड़कार हैं। इस तोड़फोड़ के बीच आई उनकी किताब ‘अजाने मेलों में’ कहीं चर्चित नहीं हुई, लेकिन हिंदी की एक महत्त्वपूर्ण किताब है।
इसी सोशल मीडिया पर अजित वाडनेरकर शब्दों के सफ़र पर निकले और उन्होंने शब्दों की ऐसी चीरफाड की कि हम अपनी भाषाओं को फिर से समझ पाए। प्रत्यक्षा या मनीषा पांडेय जैसी लेखिकाएं मूलतः इसी सोशल मीडिया की संतानें है जो अपना एक पाठक वर्ग बना रही हैं। प्रत्यक्षा के तो अब तीन कहानी संग्रह आ चुके हैं। दरअसल सोशल मीडिया और पारंपरिक कथा संसार के बीच एक अटूट रिश्ता भी है। हालांकि पारंपरिक लेखक शायद सोशल मीडिया की तरफ से आ रहे लेखन को कुछ अनुदार होकर देखते हैं- जैसे वह लोकप्रिय या बाज़ारू हो। पिछले दिनों मूलतः सोशल मीडिया में सक्रिय अनु सिंह चौधरी के कहानी संग्रह ‘नीला स्कार्फ़’ की करीब 1500 प्रतियां हिंदी युग्म प्रकाशन की नेट-मार्केटिंग और लेखिका की अपनी नेट-पहचान के साझा संयोग से छपने से पहले ही बिक गईं। कायदे से पांच सौ और सात सौ किताबें बेचने वाले हिंदी के प्रकाशन संसार के लिए यह ख़बर थी। लेकिन किसी ने इसका नोटिस नहीं लिया।
2015 के शुरू की तमाम पत्रिकाओं में बीते साल के साहित्य का जायज़ा लेते हुए जो लेख छपे, उनमें भी इस संग्रह का कहीं ज़िक्र नहीं आया। शायद अब तक साहित्यिक पत्रिका में इसकी समीक्षा भी नहीं आई है। जाहिर है, सबने मान लिया कि यह एक लोकप्रिय- यानी चलताऊ- किस्म का कहानी संग्रह होगा। जबकि सच यह है कि अनु सिंह के संग्रह की लगभग सारी कहानियां 2014 में हिंदी की पत्रिकाओं में छपी 90 फ़ीसदी कहानियों से बेहतर और सुगठित हैं। उनका एक सामाजिक संदर्भ भी है जिसमें नए-पुराने दौर का मेल दिखता है। शायद इसलिए इन कहानियों ने अपना एक नया पाठक वर्ग भी बनाया है। यहां आकर यह बात दिखती है कि अपने समय की धुकधुकी को, ख़ासकर इक्कीसवीं सदी के मध्यवर्गीय और नागर युवा मानस को- सोशल मीडिया पर नज़र आ रही अभिव्यक्तियां कहीं ज़्यादा ईमानदारी, सघनता और संवेदनशीलता के साथ पकड़ती हैं। ये अपने समय की लड़कियों के प्रति, उनकी लैंगिक बराबरी के प्रति बेहद संवेदनशील हैं और न्याय और मानवाधिकार के तकाज़ों के प्रति भी।
बेशक, हाशिए पर पड़े समाजों को लेकर- अपनी दलित और आदिवासी बिरादरी को लेकर उन्हें काफी कुछ समझना बाकी है, लेकिन अगर ध्यान से देखें तो आंघ्र और तेलंगाना की फ़र्ज़ी मुठभेडों का मामला हो, हाशिमपुरा के इंसाफ़ का सवाल हो या बदायूं में मार कर पेड़ से लटका दी गई दो बहनों का मामला हो- सोशल मीडिया संचार और संवाद के अपने दूसरे सहोदरों और अग्रजों से कहीं ज़्यादा स्पंदित और संघर्षशील नज़र आता है। बेशक, इन दो दुनियाओं के बीच कई पुल भी हैं और बन भी रहे हैं। मूलतः ब्लॉगिंग और फेसबुक के ज़रिए पहचान बनाने वाली युवा कवयित्री बाबुषा कोहली को ज्ञानपीठ जैसे मूर्द्धन्य संस्थान ने कविता के लिए युवा ज्ञानपीठ देकर इसी की पुष्टि की है। दरअसल फिर दुहराने की ज़रूरत है कि साहित्य पारंपरिक असर में लिखा जाए, या सोशल मीडिया के दबाव में, टिकेगा तभी जब उसमें अपनी तरह की संवेदनशीलता और संप्रेषणीयता होगी।
रचना के आकार-प्रकार से उसकी हैसियत तय नहीं होगी। बीते दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया में ट्विटर कहानियों के बहाने एक लेख छपा जिसमें दुनिया की सबसे छोटी कथा का ज़िक्र है। बताया गया कि सिर्फ छह शब्दों की यह कहानी शायद अर्नेस्टे हेमिंग्वे ने लिखी है। कहानी बस इतनी सी है- फॉर सेल। बेबी शूज। नेवर वोर्न। (बिकाऊ हैं बच्चे के जूते। बिल्कुल अछूते।) जिस साहित्य में संवेदना की यह तीव्रता और सघनता होगी, वह बचा रहेगा बाकी समय के साथ छूटता चला जाएगा।
शुक्रवार मैगजीन से साभार
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