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आलोक पुराणिक का लेख : निजता संरक्षण का कानून हो

किसी कंपनी को कानून तोड़ने का दोषी तो तब ठहराया जा सकता है, जब संबंधित क्षेत्र के लिए कोई कानून हो, इसलिए पहले भारतीय संसद में निजता से जुड़े कानून पारित होने चाहिए। हर प्रयोक्ता को सावधानी बरतनी चाहिए और यह मानना चाहिए कि उसकी सारी सूचनाएं सार्वजनिक हो सकती हैं। जो भी सेवा मुफ्त में मिलती है, उसमें उत्पाद आप ही हो सकते हैं, यह बात कभी भुलायी नहीं जानी चाहिए। बाजार का उसूल यह है कि मुफ्त में यहां कुछ नहीं दिया जाता। फेसबुक और व्हाट्सअप यहां पर अपनेे संवर्धन के लिए हैं, आपकी निजता की रक्षा एक हद तक ही संभव है। उसकी भी कोई गारंटी नहीं है।

आलोक पुराणिक का लेख : निजता संरक्षण का कानून हो
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आलोक पुराणिक

व्हाट्सएप में निजता से जुड़े विवाद इन दिनों चर्चा में हैं। व्हाट्सएप द्वारा तमाम अखबारों में इश्तिहार दिए जा रहे हैं, जिनमें व्हाट्सअप प्रयोक्ताओं को आश्वस्त करने की कोशिश की जा रही है। गौरतलब है कि हाल में व्हाट्सअप पर आरोप लगे हैं कि वह प्रयोक्ताओं की सूचनाओं का कारोबारी इस्तेमाल कर रहा है। पूरा विवाद सिर्फ निजता और सार्वजनिकता का नहीं है, इसमें गंभीर कारोबारी मसले भी जुड़े हुए हैं। व्हाट्सअप, फेसबुक दोनों ही संस्थान संबंधित संस्थान हैं।

फेसबुक मूलत कारोबारी संस्थान है। फेसबुक बतौर कंपनी अमेरिका के स्टाक एक्सचेंज नासडाक में सूचीबद्ध है। इसके शेयर ने एक साल में करीब 13 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। रिटर्न प्रतिफल तब ज्यादा आता है कि जब किसी कंपनी की कारोबारी संभावनाएं बेहतर होती हैं। फेसबुक लोकतंत्र को बचाने के लिए बाजार में उतरा संस्थान नहीं है। यह विशुद्ध धंधे के लिए, कारोबार के लिए और मुनाफे को अधिकतम करने के लिए बाजार में उतरा संस्थान है। जाहिर है कोई कारोबारी संस्थान धर्मादा के लिए बाजार में नहीं उतरता, वह पैसे कमाने के लिए ही उतरता है। फेसबुक भी बाजार में कमाई के इरादे से ही उतरी कंपनी है। वह हर हाल में अपने मुनाफों को अधिकतम करना चाहेगी।

सूचनाओं का अपना अर्थशास्त्र होता है। आपके बारे में कुछ जानकारियां तमाम कारोबारियों के लिए बहुत महत्व की हैं। अमेजन वेबसाइट पर आप कोई किताब खरीदने जाते हैं तो किसी किताब की खरीद के बाद आपको सूचित किया जाता है कि जिन्होंने यह किताब खऱीदी उन्होने ये किताबें भी खरीदीं। हो सकता है कि इस सूचना के बाद आप उन किताबों में भी रुचि दिखाएं। यानी आपसे जुड़ी यह सूचना कई प्रकाशकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि आपकी रुचि किस टाइप की किताबों में है। सूचनाओं से पैसे कमाए जा सकते हैं, जानकारियों को मुनाफे में बदला जा सकता है। अमेजन कंपनी के जुड़े जेफ बीजोज दुनिया के बड़े अमीरों में सिर्फ इसलिए नहीं हैं कि उनकी कंपनी आपके घर में किताब या टीशर्ट डिलीवर कर सकती है। वह बहुत बड़े अमीर इसलिए हैं कि उनके पास करोड़ों लोगों के बारे में ऐसी सूचनाएं जिन्हें कभी भी मुनाफे में तब्दील किया जा सकता है। भारत में पेटीएम कंपनी ने भुगतान से काम शुरू किया था, अब पेटीएम के प्लेटफार्म से म्यूचुअल फंड भी बिक रहे हैं और शेयर भी। किसी कंपनी के पास किसी ग्राहक के बारे में जानकारियां हों, तो फिर यह तय करना बहुत आसान हो जाता है कि उसे कौन सी सेवाएं और कौन सी वस्तुएं बेची जा सकती हैं। पेटीएम जिन्हें म्यूचुअल फंड और शेयर बेच रही है, कल को उनके बैंक खाते भी पेटीएम बैंक में खुलवा सकती है, अगर पूरे बैंक के तौर पर काम करने का लाइसेंस पेटीएम को रिजर्व बैंक से मिल जाए तो। यानी सूचनाओं के सहारे किसी की जेब तक पहुंचा जा सकता है और उसे तरह-तरह के उत्पाद बेचे जा सकते हैं, इसलिए कई कंपनियां अपने उत्पादों और सेवाओं को मुफ्त में ही दे देती हैं, बस सूचनाएं ले लेती हैं प्रयोक्ताओं से। ये सूचनाएं ही आगे और कमाई करवाती हैं तरह-तरह से। आॅनलाइन कारोबार होने के चलते भौगोलिक सीमाओं का अर्थ नहीं रह गया है। बायजूस जो मूलत बेंगलुरु की कंपनी है, तकनीक के जरिये गाजियाबाद में अपनी सेवाएं बेच सकती है। यानी तकनीक के चलते बाजार विस्तृत हो गए हैं। सूचनाओं के चलते बाजार बहुत व्यापक हो गए हैं और सूचनाएं अपने आप में बहुत कीमती हो गई हैं।

कारोबार, मार्केटिंग की दुनिया में एक बात कही जाती है कि अगर आपसे किसी उत्पाद के पैसे नहीं लिए जाते, तो समझिये कि आप ही उत्पाद हैं और आपको ही बाजार में बेच दिया गया है। आप यानी आपसे जुड़ी जानकारियां, आपसे जुड़े तथ्य बाजार में बेच दिए गए हैं और उनका कोई कारोबारी इस्तेमाल कर रहा है। आपके फेसबुक खाते से कोई भी आपकी रुचियों का अंदाज कर सकता है, उनके अनुरूप आपको तमाम वस्तुओं और सेवाओं का आफर दिया जा सकता है। आपके राजनीतिक रुझान का अंदाज आपके फेसबुक खाते के कंटेट से लग सकता है, उसके अनुरूप आपको राजनीतिक संदेश दिए जा सकते हैं। व्हाट्सएप पर आपके संदेशों से भी आपकी रुचियों आदि का पता लगाया जा सकता है। तमाम कंपनियां, कारोबारी, राजनीतिक दल इस तरह की जानकारियों के लिए लाखों करोड़ों रुपये देने को तैयार हो जाते हैं। इंटरनेट पर अब सब कुछ बेचा जा सकता है विचार से लेकर अचार तक, बस ये सूचना होनी चाहिए कि आपके विचार किस तरह के लोगों की रुचि औऱ आपके अचार को वो लोग खऱीद सकते हैं, जो दूसरे अचार खरीद रहे हैं। दूसरे लोग कौन सा अचार खरीद रहे हैं, यह सूचना नए कारोबार के रास्ते खोलती है।

मूल सवाल यह है कि ये कंटेट निजी हैं या सार्वजनिक हैं। क्या इनका कारोबारी इस्तेमाल संभव है। कोई कितना आश्वस्त करे सच यह है कि आपकी जो भी सूचना इंटरनेट पर है, उसका कारोबारी इस्तेमाल संभव ही है। इसका कारोबारी इस्तेमाल तब संभव नहीं है, जब ऐसे इस्तेमाल के खिलाफ कड़े दंड और कड़े प्रावधान हों। ऐसा अनायास नहीं है कि तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां यूरोप या किसी विकसित देश के लिए अलग कानून का पालन करती हैं औऱ भारत जैसे विकासशील देश के लिए उनका रुख अलग होता है। यूरोप में निजता से जुड़े कानून बहुत कड़े हैं। कोई कंपनी अगर उनका उल्लंघन करती है, तो वह कड़े दंड की भागी होती है, पर भारत में निजी सूचनाओं के कारोबारी इस्तेमाल से जुड़ा कानून भी अभी अस्तित्व में नहीं है, इसलिए इस संबंध में तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मनमानी की इजाजत है।

किसी कंपनी को कानून तोड़ने का दोषी तो तब ठहराया जा सकता है, जब संबंधित क्षेत्र के लिए कोई कानून हो, इसलिए पहले भारतीय संसद में निजता से जुड़े कानून पारित होने चाहिए। इसके बावजूद हर प्रयोक्ता को सावधानी बरतनी चाहिए और यह मानना चाहिए कि उसकी सारी सूचनाएं सार्वजनिक हो सकती हैं। जो भी सेवा मुफ्त में मिलती है, उसमें उत्पाद आप ही हो सकते हैं, यह बात कभी भुलायी नहीं जानी चाहिए। बाजार का उसूल यह है कि मुफ्त में यहां कुछ नहीं दिया जाता। आपकी सूचनाएं बेची जा सकती हैं, यह अहसास सबको होना ही चाहिए। फेसबुक और व्हाट्सएप यहां पर अपनेे संवर्धन के लिए हैं, आपकी निजता की रक्षा एक हद तक ही संभव है। उसकी भी कोई गारंटी नहीं है और खासकर तब तो बिलकुल नहीं, जब इसे लेकर कोई कानूनी ढांचा ही उपलब्ध नहीं है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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