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नरेंद्र सिंह तोमर का लेख : आज भी कुशाभाऊ ठाकरे के सिद्धांत सार्थक

कुशाभाऊ ठाकरे ने जीवनपर्यंत मूल्यों पर आधारित राजनीति का अनुसरण किया। त्यागमय जीवन और उनके राजनीतिक एवं सामाजिक अवदान का पुनर्पाठ अथवा पुनर्वाचन उन राजनीतिक मान्यताओं की पुनर्स्थापना के लिए जरूरी है, जो सार्वजनिक जीवन में तेजी से गुम होती जा रही हैं। उनके राजनीतिक-व्यक्तित्व का दूसरा उल्लेखनीय पहलू यह है कि वो पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के पक्षधर थे। उनका यह मत था कि संगठन के स्तर पर एक बार जो फैसला हो जाए, उससे डिगना नहीं चाहिए। उनकी कथनी और करनी में एकरूपता उनकी सबसे बड़ी धरोहर थी। 

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नरेंद्र सिंह तोमर

नरेन्द्र सिंह तोमर

देश में राजनीतिक संक्रमण के इस दौर में, जबकि सार्वजनिक जीवन में नैतिक और राष्ट्रीय मूल्यों का तेजी से क्षरण हो रहा है, हम भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे की जन्म शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का शुभारंभ कर रहे हैं। राष्ट्रीय, सामाजिक और नैतिक मूल्यों के इस महाशिल्पी के पुण्य स्मरण का यहृ संयोग सार्वजनिक जीवन में उन प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करने का एक अवसर प्रदान करता है, जिनकी कमी को यह देश शिद्दत से महसूस कर रहा है। ठाकरे के त्यागमय जीवन और उनके राजनीतिक एवं सामाजिक अवदान का पुनर्पाठ अथवा पुनर्वाचन उन राजनीतिक मान्यताओं की पुनर्स्थापना के लिए जरूरी है, जो सार्वजनिक जीवन में तेजी से गुम होती जा रही हैं। उनकी जीवटता हमें चौंकाती है। सिद्धांतों के प्रति उनकी सजगता, सतर्कता और समर्पण सार्वजनिक जीवन में हमें विरले ही देखने को मिलती है।

कुशाभाऊ ने जीवनपर्यंत मूल्यों पर आधारित राजनीति का अनुसरण किया। मूलतः वो संगठन के आदमी थे। संगठन से दूर सत्ता के साकेतों मे उन्हें घुटन सी महसूस होती थी। कई मर्तबा उन्हें सत्ता के साकेतों की ओर ढकेलने के प्रयास हुए, हर बार उन्होने संगठन के आश्रम में लौटना पसंद किया। किसी भी संगठन को गढ़ने के लिए जरूरी अहर्ताएं उनमें कूट-कूट कर भरी थी। उनकी सादगी के सभी लोग कायल थे। वो कभी थकते नहीं थे। संगठन की जड़ों को मजबूत करने के लिए वो प्राणपण जुटे रहते थे। शायद इसीलिए कार्यकर्ताओं से काम लेने की उनकी क्षमता बेमिसाल थी। आज वो हमारे बीच मे नही हैं, फिर भी अनगिनत भाजपा कार्यकर्ता होंगे, जिन्हें कभी भी अलग से कुशाभाऊ ठाकरे को याद करने की जरूरत नहीं होती है। अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं के बीच वो हम सब लोगों की राजनीतिक-दिनचर्या का हिस्सा बनकर कहीं भी कभी भी सामने खड़े हो जाते हैं।

उनके साथ काम करने और संगठन को खड़ा करने का अनुभव आज भी हम सब लोगों को दिशा-निर्देश देता है कि अमुक राजनीति-समस्या के निदान के लिए कौन से मार्ग अख्तियार करना बेहतर होगा? कई राज्यों में यदि भाजपा संगठन और उसकी सरकारें नैतिक धरातल पर यदि काम कर रही हैं, तो उसका एकमात्र कारण यही है कि अनेक महत्वपूर्ण स्थानों पर वो लोग काम संभाल रहे हैं, जिनकी राजनीतिक-परवरिश कुशाभाऊ ठाकरे जैसी शख्सियत की देख-रेख में हुई है। उन्होंने इन कार्यकर्ताओं के राजनीतिक-संस्कारों को तराशा है। वो आजीवन सत्य के पक्षधर बने रहे। सत्य और संगठन के हितों की खातिर वो कोई समझौता नही करते थे। ठाकरे सत्ता और संगठन के शिखर के आसपास उनके प्रभावी और कार्यशील उपस्थिति के बावजूद अंहकार और निरंकुशता जैसे दुर्गुणों से कोसों दूर थे। दो जोड़ी धोती-कुर्ता और चादर-चड्डी तक सीमित टीन के एक छोटे से बक्से में समा जाने वाली उनकी छोटी सी दुनिया के नैतिक धरातल कितने विशाल, व्यापक और विराट थे। शायद ठाकरे जैसे राजनीतिक-कर्मयोगी के उद्दात व्यक्तित्व की बदौलत ही भाजपा खुद को पार्टी विद डिफरेंस के रूप में प्रस्तुत करने का दंभ पालती थी।

उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का जो परचम फहरा रहा है, उसमें कुशाभाऊ की राजनीतिक-साधना का महत्वपूर्ण योगदान है। ठाकरे का सम्पूर्ण जीवन भाजपा को ही समर्पित रहा है। संगठन ही उनके परिवार था और उनकी सारी जिंदगी भारतीय जनता पार्टी के आंगन में ही बीती थी। वे जनसंघ के जमाने से संगठन के लिए समर्पित भाजपा की संगठनात्मक-संरचना के प्रमुख शिल्पकारों में एक थे। भाजपा को वर्तमान रूप में ढालने में ठाकरेजी की विशेष योगदान रहा है। खासतौर से मध्यप्रदेश सहित उत्तर भारत के सारे राज्यों में भाजपा को खड़ा करने में उनकी भूमिका अहम रही है। उनका सार्वजनिक जीवन पैंसठ साल लंबा रहा है। वो भाजपा के छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं मे कोई फर्क नही करते थे। उनके नजदीक काम का महत्व ज्यादा था। सामान्य कार्यकर्ता के साथ भी बड़े पदाधिकारियों जितना ही खुश रहते थे। उन्हें पहली मर्तबा जैसा देखा था, ठाकरे अंतिम समय तक वैसे ही बने रहे। उनके भीतर के अपने संघर्ष, शारीरिक-पीड़ाएं और परेशानियां कभी भी मुखर होकर उनकी ऱाजनीतिक और सामाजिक साधना में व्यवधान पैदा नहीं कर पाईं। उनकी संवेदनाएं मनुष्यता के लिए कल्याण के लिए हर वक्त बेचैन रहती थीं। शायद इसीलिए समीक्षक उनको भारतीय गणतंत्र के निस्पृही राजनीतिक-संन्यासी मानते हैं। वो समाज मे जन-कल्याण की भावनाओं से आच्छादित राजनीति रोपना चाहते थे। भारतीय संस्कृति की मूल भावना भी इसी सिद्धांत को प्रतिपादित करती है। ठाकरे के नेतृत्व में जमीन से उठकर शिखर तक पहुंचने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या अनगिनत है, लेकिन सत्ता के शिखर के निकट उनकी अभिलाषाएं शून्य थीं। लोग उन्हे किंग-मेकर कहते थे, लेकिन ऐसे संबोधनों से उन्हें परहेज था।

उनके व्यक्तित्व के कई आयाम थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वो सारे काम निरपेक्ष भाव से करते थे। वर्तमान में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की दूसरी और तीसरी पीढ़ी के जो नेता सक्रिय हैं, उन्हें ठाकरे ने ही तराशा और खड़ा किया है। कुशाभाऊ के राजनीतिक-व्यक्तित्व का दूसरा उल्लेखनीय पहलू यह है कि वो पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के पक्षधर थे। वो अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को उसके हित मे बेबाक राय देने में विश्वास रखते थे। इस मामले में वो भले-बुरे की परवाह नही करते थे। उनका यह मत था कि संगठन के स्तर पर एक बार जो फैसला हो जाए, उससे डिगना नहीं चाहिए। सरकार में यह सामर्थ्य होना चाहिए को वो लोगों में अपनेपन का विश्वास पैदा कर सके। भाजपा के सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान नेता होने के बावजूद ठाकरे अप्रतिम रूप से सामूहिक-निर्णयों में विश्वास रखने वाले नेता थे। उनकी कथनी और करनी में एकरूपता उनकी सबसे बड़ी धरोहर थी।

आडंबरहीन त्याग की भावनाओं ने भारतीयों को युगों तक प्रेरित किया है, जहां साधु-संन्यासियों को राजाओं से ऊंचा स्थान प्राप्त है। ठाकरे ने आजीवन में संत कबीर के जीवन-दर्शन के अनुरूप जीवन-यापन किया। वीणा के तार जब न अधिक कसे होते हैं और न ढीलें होते हैं, तभी संगीत पैदा होता है। जीवन में संगीत जैसी लय हासिल करने का सूत्र भी यही है। जो योग के माध्यम से पांचों इंद्रियों को संतुलन में रखता है, उसे ही जीवन का अमृत प्राप्त होता है। यह संतुलन ठाकरेजी की जिंदगी का पर्याय था। सार्वजनिक जीवन मे यह दीप-स्तंभ हमेशा जलता रहेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।

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