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अलका आर्य का लेख : सतर्कता से ही बचाव संभव

कोविड-19 से बचाव के लिए टीका कितना जरूरी है और इसके साथ-साथ मास्क पहनने, नियमित हाथ धोने व निर्धारित दूरी का पालन सरीखे नियमों का पालन अवश्य करें। भारत में शादी-समारोह व मृत्यु की रस्मों में सैकड़ों लोग इकट्ठा होने की परंपरा है। यह परंपरा अच्छी है या नहीं, इस वक्त इस बिंदु पर चर्चा करने से अधिक जरूरी मौजूदा समय की मांग पर ध्यान देना है। प्रभावशाली सामुदायिक नेता इस बात पर खास बल दे सकते हैं कि सामाजिक समारोहों में भीड़ का हिस्सा नहीं बने। दूर रहकर यानी अपने-अपने घरों से ही प्रतीकात्मक जिम्मेदारी का निर्वाह करें।

अलका आर्य का लेख : सतर्कता से ही बचाव संभव
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अलका आर्य

अलका आर्य

भारत में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर ढलान पर है और राज्यों ने विज्ञानियों द्वारा व्यक्त की गई तीसरी लहर की आंशका के मद्देनजर स्वास्थ्य तंत्र को बेहतर बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में बताया कि अगर कोविड-19 के रोजाना 35 हजार मामले भी आते हैं तो दिल्ली ने उस अनुपात में तैयार कर ली है। इसी तरह महाराष्ट्र में बच्चों के लिए खास तौर पर बाल कोविड वार्ड बनाए जा रहे हैं। बेंगलूरु में डाक्टरों को बच्चों में कोरोना होने पर कैसे इलाज करना है, इस बाबत प्रशिक्षण दिया जा रहा है। केंद्र व राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर दावा कर रही हैं कि आने वाले वक्त में आक्सीजन व जरूरी दवाइयों की किल्लत अब नहीं होगी। ऐसे वक्तव्य एक उम्मीद जगाते हैं मगर साथ ही अगर इस महामारी को हराना है, तो समाज, सामुदायिक नेताओं को आगे आकर लोगों के साथ बराबर संवाद बनाए रखना बहुत अहम है। उन्हें लोगों को यह समझाने के लिए कि कोविड-19 महामारी से बचने के लिए वैक्सीन लगवाने के साथ-साथ बिहेवियर चेंज बहुत जरूरी है, के वास्ते फ्रंट लाइन वकर्स वाली भूमिका निभानी चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार लोगों को याद दिलाता रहता है कि कोविड-19 महामारी से बचाव के लिए मास्क पहनना, सामाजिक दूरी, बार-बार हाथ धोना कितना जरूरी है, लेकिन आम जनता इन सब अहम दिशा-निर्देशों के प्रति कितनी लापरवाह है, यह किसी से छिपा नहीं है। मुल्क में कोराेना के मामलों में गिरावट के साथ ही अधिकतर राज्यों में चरणबद्व तरीके से अनलाॅक की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बाजारों व धार्मिक स्थलों पर इकट्ठी भीड़ कोरोना नियमों की परवाह नहीं कर रही है। हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि मुल्क में 50 फीसदी लोग मास्क नहीं पहन रहे हैं। मंत्रालय ने देश के 25 शहरों में 2000 लोगों पर यह सर्वे किया। सर्वे से पता चला कि 64 प्रतिशत लोग मास्क से केवल मुंह ही ढक रहे हैं, नाक को नहीं ढक रहे हैं। वहीं 20 प्रतिशत लोगों का मास्क ठुड्डी पर ही होता है और 2 प्रतिशत लोगों के मास्क गर्दन पर फंसे रहते हैं। केवल 7 प्रतिशत ही लोग ऐसे हैं, जो उचित तरीके से मास्क पहनते हैं।

दरअसल विशाल आबादी वाले इस मुल्क में कोविड नियत्रंण में सामाजिक भागीदारी की भूमिका बहुत अहम है। नेशनल कोविड-19 टास्क फोर्स के वरिष्ठ सदस्य डा. नरेंद्र कुमार अरोड़ा का इस बावत कहना है कि इस बात को इस तरह समझ सकते हैं कि बेहद कम समय में कोविड-रोधी वैक्सीन लाॅन्च कर दी गई है, लेकिन हम क्योंकि एक बड़ी आबादी वाले देश में रहते हैं, इसलिए सभी को वैक्सीन लगवाने में वक्त लग सकता है। इसका बेहतर तरीका है कि हम कोविड अनुरूप व्यवहार का पालन करें। वैक्सीन लगवाने के बाद भी दूसरों को संक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए मास्क का प्रयोग, नियमित हाथ धोना व निर्धारित दूरी का पालन करना जरूरी है। ये व्यवहार हमें संक्रमण से सुरक्षा देंगे और सरकारी प्रयासों की सफलता भी इस पर निर्भर करेगी कि हमने कितनी ईमानदारी से कोविड-19 अनुरूप व्यवहार का पालन किया। बीते साल कोविड-19 महामारी के पहले लाॅकडाउन में हजारों पैदल चलते प्रवासी मजूदरों की दिल दहला देने वाली तस्वीरें आज भी संवेदनशील इंसान के जेहन में ठिकी हुई हैं, बच्चों को गोद में लिए महिलाएं सैंकड़ों किमी पैदल जाती दिखी थीं। उसी साल कोलकाता में उनके सम्मान में एक दुर्गा पंडाल में एक मूर्ति लगाई गई थी और अभी हाल ही में कोरोना से बचाव के लिए मास्क लगाने का संदेश देने के लिए दुर्गा मां की इस मूर्ति पर मास्क लगा दिए गए हैं। दुर्गा मां का व उसके साथ नजर आ रहे तीनों बच्चों के मुंह व नाक मास्क से ढके हुए नजर आ रहे हैं। ये मास्क उचित तरीके से पहनाए गए हैं, ताकि आम जनता इसका अनुकरण कर सके।

दरअसल महामारी को फैलने से रोकने व उसके उन्मूलन के लिए समाजिक भागीदारी की भूमिका बहुत अहम होती है और पिछली महामारियां भी इसकी ओर इशारा करती हैं, लेकिन वक्त के आगे बढ़ने के साथ समाज, मुल्क व दुनिया इसे अधिक याद न रख विकास के नए कीर्तीमान गढ़ने में मशगूल हो जाती है। समाज के एक बहुत बड़े तबके को कोविड-19 अनुरूप व्यवहार के पालन के लिए तैयार करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों की राय में इसके लिए सामुदायिक नेताओं, धार्मिक नेताओं की भूमिका बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है। मिसाल के तौर पर बीते कई साल मुल्क में जो स्वच्छता अभियान चलाया गया, उसके प्रति जागरूकता फैलाने में ये लोग भी आगे आएं और उसका कुछ हद तक असर भी दिखा। मुल्क में पोलियो उन्मूलन में भी इन्होंने अपना सहयोग दिया और पोलियो को लेकर फैली अफवाहों, दुष्प्रचार को दूर करने का बीड़ा भी उठाया। आज वक्त की भी यही मांग है कि वे बड़ी संख्या में आगे आकर लोगों को समझाएं कि कोविड-19 से बचाव के लिए टीका कितना जरूरी है और इसके साथ-साथ मास्क पहनने, नियमित हाथ धोने व निर्धारित दूरी का पालन सरीखे नियमों का पालन अवश्य करें। भारत में शादी-समारोह व मृत्यु की रस्मों में सैकड़ों लोग इकट्ठा होने की परंपरा है। यह परंपरा अच्छी है या नहीं, इस वक्त इस बिंदु पर चर्चा करने से अधिक जरूरी मौजूदा समय की मांग पर ध्यान देना है। प्रभावशाली सामुदायिक नेता इस बात पर खास बल दे सकते हैं कि सामाजिक समारोहों में भीड़ का हिस्सा नहीं बने। दूर रहकर यानी अपने-अपने घरों से ही प्रतीकात्मक जिम्मेदारी का निर्वाह करें।

जनमानस को कोविड-19 अनुरूप व्यवहार के पालन करने के वास्ते यूनिसेफ ने यंग वारियर नामक आंदोलन शुरू किया है। भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि डा. यासमिन अली हक कहती हैं-यह यंग वारियर मुहिम पेन-इंडिया मुहिम है। इस मुहिम का मकसद भारत को मौजूदा महामारी कोविड-19 से बाहर आने में मदद करना है। इसके लिए पांच लाख युवाओं को साथ जोड़ा जा रहा है। ये युवा फेक न्यूज पुलिस, वैक्सीन के लिए प्रोत्साहित करने वाली भूमिका निभाएंगे। वे लोगों को वैक्सीन पंजीकरण की प्रक्रिया समझाने व कराने में भी मदद करेंगे। लोगों को मास्क पहनने के फायदे भी बताएंगे। इस मुहिम से एक लाख से अधिक युवा अभी तक जुड़ गए हैं और अपनी भूमिका निभा भी रहे हैं। एक अरब 38 करोड़ की विशाल आबादी वाले मुल्क में कोविड-19 महामारी के संक्रमण को रोकना आसान नहीं है, मगर अगर सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएं तो मानव जाति पर आया यह बड़ा संकट छोटा हो जाएगा। जितनी जल्दी इस महामारी का अंत होगा, उतना ही मानव जाति का नुकसान कम होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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