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सीताराम व्यास का लेख : वर्तमान भारत एवं महर्षि अरविन्द

अरविन्द घोष का राष्ट्रवाद उच्च स्तर का है। उनकी राष्ट्रवाद की व्याख्या एक ईश्वरीय विधान है। उनके शब्दों में ‘राष्ट्रवाद एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है, राष्ट्रवाद एक धर्म है जो ईश्वर की ओर से आया है। राष्ट्रवाद एक ऐसा धर्म है जिसका जीवन में पालन करना होगा। यदि तुम एक राष्ट्रवादी बनना चाहते हो, यदि तुम राष्ट्रवाद के धर्म को स्वीकार करना चाहते हो तो ऐसा तुमको धार्मिक भावना के साथ रहना चाहिये। तुम्हें याद रखना चाहिए कि तुम ईश्वर के यन्त्र हो। राष्ट्रवाद का दमन नहीं किया जा सकता। राष्ट्रवाद ईश्वरीय बल से जीवित रहता है।

सीताराम व्यास का लेख : वर्तमान भारत एवं महर्षि अरविन्द
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सीताराम व्यास 

सीताराम व्यास

देश 75वां स्वतन्त्रता दिवस मनाने जा रहा है। संजोग से इसी दिन महर्षि योगी अरविन्द का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में डाॅ. कृष्णनघोष के घर हुआ। अरविन्द घोष भारत की आध्यात्मिक-सांस्कृतिक चेतना के संवाहक थे। वे भारत के राष्ट्रवाद के अग्रदूत कहे जाते हैं। इस दिन उनका जन्म होना भी दैवीय विधान है। फिर भी 15 अगस्त को उनकी याद किसी को नहीं आती। अभी तक लाल किले की प्राचीर से किसी भी प्रधानमंत्री ने उनके नाम का उल्लेख नहीं किया है। वर्तमान भारत और विश्व में घटित हो रही घटना में महर्षि अरविन्द के सन्देश की महती आवश्यकता है। उनके मानवतावाद और स्वातन्त्र्य-चेतना से युक्त सन्देशों ने तत्कालीन भारतीय परिवेश को तो प्रभावित किया ही, आज भी उनका महत्व अक्षुण्ण है। द्वितीय महायुद्ध में मित्र राष्ट्रों को विजय दिलाने में उनकी आध्यात्मिक साधना का योगदान है। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात मानवता, गरीबी, बीमारी, विषमता से पीड़ित होती दिखाई दे रही है। सत्ता पिपासा, साम्राज्यवादी शक्तियां कमजोर देशों को शक्ति के बल पर निगल रही है।

विगत दो वर्षों में मानवता महा बीमारी कोविड से ग्रसित है। विश्व के चिकित्साशास्त्र के विशेषज्ञ भी महामारी के कारणों का पता लगाने में असफल होते जा रहे हंैै। विषम परिस्थितियों में वेदान्त विशारद, कर्मयोगी, युगद्रष्टा महर्षि अरविन्द घोष का सन्देश त्रस्त मानवता में नई संजीवनी शक्ति का संचार करता है। महर्षि ने कहा था रामकृष्ण परमहंस के जन्म 1836 से भारत के उत्थान का प्रारम्भ है, उनके जन्म के 175 वर्ष बाद भारत विश्व का शक्तिशाली देश बनेगा। आज उनका कथन सत्य सिद्ध हो रहा है। भारत ने कोविड काल में विश्व को परिवार मानकर पीड़ित मानवता की सहायता और सेवा की है। विश्व के सभी देश भारत की उदारता तथा सेवा-भावना की प्रशंसा कर रहे हैैं।सर्वप्रथम अरविन्द घोष का जीवनचरित प्रेरणा देने वाला है। उनके पिता डा.कृष्णघन घोष अंग्रेजी-संस्कृति से प्रभावित और नास्तिक विचारों के थे। उनकी माता स्वर्णलता प्रसिद्ध ब्रहृम समाजी राजनारायण बसु की पुत्री थी। वह दयालु, शिक्षित, विदुषी थी। अरविन्द तथा उनके दोनों भाइयों को दार्जलिंग में लोरेन्टो कॉन्वेट स्कूल में भेज दिया। 1879 में सात वर्ष की आयु में इन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया। उनको ईसाई घर में रखा। वहां उन्हें मात्र इतनी जानकारी थी कि भूमंडल पर भारत भी एक देश है। अरविन्द चौदह वर्ष तक इंग्लैंड में रहे। इस काल खंड में अपने देश की संस्कृति तथा परंपरा से अछूते रहे। कैम्िब्रज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1890 मे आईसीएस की प्रतियोगिता में बैठे। प्रतियोगिता परीक्षा में रिकॉर्ड स्थापित किया। उनकी इच्छा सरकारी नौकरी करने की नहीं थी इसलिये घुड़सवारी में जानबूझकर सम्मिलित नहीं हुए। अपने आपको अयोग्य करा दिया।

संयोगवश बड़ोदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से भेंट हुई। उन्हें बड़ोदा बुला लिया। 1893 से 1906 तक बड़ोदा कॉलेज मेे प्राध्यापक, राजस्व सचिव, तथा महाराजा के निजी सचिव रहे। 1906 में बंग-भंग आन्दोलन में भाग लेने के लिए पद त्याग कर कलकत्ता आ गए। बड़ोदा के तेरह वर्षों में अरविन्द घोष का पूर्णतया भारतीयकरण हो गया। वहां पर योग, रामायण, महाभारत, भवभूति साहित्य, कालीदास साहित्य का गहन अध्ययन किया। आप 1894 में मुम्बई से प्रकाशित इन्दुप्रकाश में राष्ट्रवाद के समर्थन में न्यू लेम्प फॉर आल्ड के नाम से उग्र लेख लिखने लगे। वे इन लेखों में उदारवादी कांग्रेसियों की नीति प्रेयर, पेटीशन, प्राेटेस्ट की कटु आलोचना करते थेे। इन लेखों से रानाडे जैसे कांग्रेसी नेता नाराज हुए तथा अरविन्द पर राजद्रोह का मुकदमा चलाने की धमकी दी। 1902 में लोकमान्य तिलक के संपर्क में आए। संभवतया भगिनी निवेदिता ने उनको क्रांतिकारी आन्दोलन में भाग लेने की प्रेरणा दी। अरविन्द ग्रीष्मावकाश में क्रांतिकारी आन्दोलन को सशक्त करने के लिए खुलना, ढ़ाज़, मिदनापुर इत्यादि स्थानों पर प्रवास करते थे। देश स्वतन्त्र करवाने की उदात्त भावना से विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये स्वराज की अलख जगाते थे। उनके सुझाव पर सखाराम गणेश देवस्कर ने दे शेर कथा नाम पुस्तक लिखी। इस पुस्तक ने युवज़ें के हृदय में देशभक्ति का भाव संचारित किया।

उनका राजनीति तथा क्रांतिकारी गतिविधियों में कार्यकाल 1906-10 तक रहा। बंगाल नेशनल कॉलेज के प्राचार्य पद का दायित्व निभाते हुए छात्रों को राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत किया। वन्देमातरम पत्र के सम्पादक के नाते उन्हें एक माह का कारावास मिला। उनको सरकार ने बम षडयन्त्र केस में सन्देह के आधार पर अलीपुर जेल में (मई 1908 से 1909 ई) डाल दिया। देशबन्धु सीआर दास की वकालत के फलस्वरूप रिहा हो गए। अलीपुर जेल उनके जीवन को नया मोड़ देने वाली साबित हुई। कारावास में आध्यात्मिक साधना ने अरविन्द की समस्त शंकाओं का निवारण किया। उन्होंने पुनश्च: 'कर्मयोगी' तथा 'धर्म' नाम के दो साप्ताहिक पत्र निकालने प्रारम्भ किए। इन पत्रों की लोकप्रियता बढ़ी। सरकार पुन: उनको गिरफ्तार करने की योजना बना रही थी। भगिनी निवेदिता ने उनको शीघ्र देश छोड़ने की सलाह दी। उनकी सलाह मानकर शीघ्र ही चन्द्रनगर के लिए रवाना हो गए। 4 अप्रैल 1910 को पांडिचेरी में पहुंच गए। यहां से उनकी आध्यात्मिक साधना का का़ल शुरू हुआ। राजनीतिक कार्याें से अपने आपको मुक्त कर लिया। 1920 के कांग्रेस नागपुर में अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए डा.केशवराव बलिराम हेडगेवार व डा. मुंजे ने पांडिचेरी जाकर उनसे आग्रह किया था। उन्होंने राजनीति से परिपूर्ण संन्यास ले लिया था, इसलिए उनके आग्रह को अस्वीकार कर दिया।

अरविन्द घोष का राष्ट्रवाद उच्च स्तर का है। उनकी राष्ट्रवाद की व्याख्या एक ईश्वरीय विधान है। उनके शब्दों में 'राष्ट्रवाद एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है, राष्ट्रवाद एक धर्म है जो ईश्वर की ओर से आया है। राष्ट्रवाद एक ऐसा धर्म है जिसका जीवन में पालन करना होगा। यदि तुम एक राष्ट्रवादी बनना चाहते हो, यदि तुम राष्ट्रवाद के धर्म को स्वीकार करना चाहते हो तो ऐसा तुमको धार्मिक भावना के साथ रहना चाहिये। तुम्हें याद रखना चाहिए कि तुम ईश्वर के यन्त्र हो। राष्ट्रवाद का दमन नहीं किया जा सकता। राष्ट्रवाद ईश्वरीय बल से जीवित रहता है। महर्षि अरविन्द ने खंडित भारत को स्वीकार नहीं किया। 5 दिसम्बर 1950 को उनके ब्रह्मलीन होने के पश्चात श्री मां ने पांडिचेरी आश्रम का कार्यभार संभाला। महर्षि अरविन्द घोष ने ब्रह्म, जीव, को सत्य मानते हुए सकारात्मक विचारों का पक्ष लिया। उनकी आध्यात्मिकता का मूल उद्देश्य ही स्वातन्त्र्य-चेतना पर अवलम्बित था। उन्होंने स्पष्ट लिख है 'मैं इस राष्ट्र और हिन्दू धर्म का उत्थान कर रहा हूं। सनातन धर्म विश्व पर छा जाएगा।' वेदान्त के समता, स्वतन्त्रता, आत्मोद्धार, देशोद्धार और विश्वोद्धार के आदर्शों को राष्ट्रीय स्वतन्त्रता-आन्दोलन के माध्यम से नई ऊर्जा, ऊष्मा और शक्ति प्रदान करने वाले ऐसे लब्ध प्रतिष्ठ व्यक्तित्व को उनके जन्मदिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित करना और उनके महान्ा विचारों का अनुसरण करके भारतीयता के उच्च आदर्शों की समस्त विश्व में प्रतिष्ठा करना हम सबका महत्वपूर्ण दायित्व है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)


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