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फेसबुक वॉल पर प्रेमचंद जयंती, जानें किसने क्या कहा

प्रेमचंद ने लिखते हुए एक तरफ इस किसान के दुःख दर्द और सामजिक-आर्थिक विडम्बनाओं को एकदम सीधे सीधे दर्ज किया

फेसबुक वॉल पर प्रेमचंद जयंती, जानें किसने क्या कहा

नई दिल्ली. अशोक कुमार पांडेय लिखते हैं कि प्रेमचंद ने लिखते हुए एक तरफ इस किसान के दुःख दर्द और सामजिक-आर्थिक विडम्बनाओं को एकदम सीधे सीधे दर्ज किया तो दूसरी तरफ उस समय की राजनीतिक सामजिक जीवन की साम्प्रदायिकता, जाति प्रथा, आर्थिक विषमता आदि को भी कहानियों में ही नहीं बल्कि अपने लेखों में भी दर्ज किया और साथ ही अपनी प्रतिबद्धता भी साफ़ की।

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यह उनकी सफलता है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन हमारे समाज और राजनीति की विफलता है. आज अगर वह होते तो ज़ाहिर तौर पर उस समय से अधिक उद्विग्न होते कि मुसीबतें तो नए नए रूपों में सामने उपस्थित हैं लेकिन स्वप्न सारे खंडित. दूर तक निगाह में कोई नवनिर्माण का दृश्य नहीं दीखता।

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आजादी के बाद जो उम्मीद थी "अपने" शासकों से उसका शतांश भी पूरा नहीं हुआ. नब्बे का दशक शासकीय नीतियों के लगातार पूंजीपतियों के पक्ष में झुकते जाने और इसके साथ साथ साम्प्रदायिकता के उभार का दशक था और यह प्रक्रिया सत्ताओं के परिवर्तनों के बावजूद अब तक ज़ारी है. वह होते तो खिन्न होते पर संघर्षरत होते. आज भी बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहने से नहीं रुकते।

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वह नहीं हैं..और हम हैं. खुद को उनकी परम्परा का कहने वाले. ज़रा झाँक ले अपने मन में और पूछें कहीं सच में बिगाड़ के डर बेईमानी तो नहीं करने लगे हैं हम?

वहीं इस संबंध में सूरज प्रकाश कहते हैं कि प्रेमचन्द (धनपतराय) (नायाब राय) (1880 - 1936) से पहले हिंदी में काल्पनिक, एय्यारी और पौराणिक धार्मिक रचनाएं ही की जाती थी।

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