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संपादकीय: सकारात्मक संदेश देने से चूक गये प्रधानमंत्री

दस वर्ष के लंबे कार्यकाल में यह तीसरा मौका था जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह औपचारिक रूप से मीडिया से रू-ब-रू हुए हैं।

संपादकीय: सकारात्मक संदेश देने से चूक गये प्रधानमंत्री
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नई दिल्ली. अपने करीब दस वर्ष के लंबे कार्यकाल में यह तीसरा मौका था जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह औपचारिक रूप से मीडिया से रू-ब-रू हुए हैं। जिस तरह से उनकी पार्टी और सरकार तमाम मोचरें पर चुनौतियों का सामना कर रही है, उसे देखते हुए यह मंच एक बड़े मौके के रूप में उनके सामने था जिसका वे इस्तेमाल पार्टी और सरकार के प्रति देश की जनता को एक सकारात्मक संदेश देने के लिए कर सकते थे, परंतु इसमें वे चूक गये।


एक तरह से वे इस प्रेस वार्ता के जरिये अपनी नाकामियों पर परदा डालने की नाकाम कोशिश करते दिखे। प्रधानमंत्री यह मान रहे हैं कि देश में महंगाई बढ़ी है, भ्रष्टाचार बढ़ा है और रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। चार राज्यों में हार की वजह भी वे इन्हीं को मान रहे हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि इसके बावजूद वे कांग्रेस व अपनी सरकार की पीठ भी थपथपा रहे हैं।

घरेलू अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, महंगाई चरम पर है तो वे इसके लिए वैश्विक मंदी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। विपक्षी दल और मीडिया के बारे में कह रहे हैं कि उनके प्रति दोनों का रवैया निर्मम रहा है। प्रधानमंत्री के रूप में उन पर तीन प्रमुख आरोप लगते रहे हैं। पहला, वे हमेशा खामोश बने रहे। दूसरा, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ समय से कड़े फैसले नहीं लिये।

तीसरा, सरकार का मुखिया होने के नाते उन्होंने फैसले नहीं लिये। इन आरोपों पर उन्होंने देश को कोईठोस जबाव नहीं दिये, बल्कि सवालों से बचकर निकलने की कोशिश करते दिखे। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने रिटायरमेंट की घोषणा करके एक प्रकार से कांग्रेस के लिए राहुल गांधी का नाम बतौर प्रधानमंत्री उम्मीदवार आगे करने का रास्ता भी साफ कर दियाहै। उन्होंने कहा है कि उनके कार्यकाल और सरकार के प्रदर्शन का आंकलन इतिहास करेगा, यानी उन्हें इस देश की जनता और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया पर भरोसा नहीं है।

कितनी भी बड़ी राजनीतिक हस्ती क्यों न रही हो, उनका हमेशा से मानना रहा हैकि उसके कायरें का मूल्यांकन जनता करेगी पर डॉ. मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि उनका आंकलन इतिहासकार करेंगे कि उन्होंने कैसा काम किया है। नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा है कि उनका प्रधानमंत्री बनना देश के लिए घातक होगा, यह दर्शाता है कि कांग्रेस मोदी से बुरी तरह भयभीत है। डॉ. मनमोहन सिंह को अहमदाबाद की सड़कों पर जो हुआ वह याद है, परंतु बतौर प्रधानमंत्री उन दंगों को याद करना भूल जाते हैं जो कांग्रेस की सरकारों के कार्यकाल में हुए हैं और जिनकी भीषणता गुजरात दंगों से भी भयावह रही है। मेरठ के हाशिमपुरा-मलियान दंगा, भागलपुर दंगा, 1984 सिख विरोधी दंगा और असम में नरसंहार कुछ उदाहरण हैं।

अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए कांग्रेस का नेतृत्व इन दंगों का जिक्र तक नहीं करता है। ऐसे हालात में जबकि कांग्रेस की चार राज्यों में बुरी पराजय हुई है, उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री जब मीडिया के समक्ष होंगे तो ईमानदारी से उन कारणों की चर्चाकरेंगे, जिनसे जनता ने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया। साथ ही कुछ ऐसे कदमों का ऐलान करेंगे जिससे मतदाताओं का भरोसा वापस पाया जा सके। वैसे तो प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह मीडिया के सवालों से हमेशा भागते रहे हैं और अब तक के कार्यकाल में मात्र तीन बार औपचारिक रूप से मिले हैं तो कहा जा सकता है कि उन्होंने महत्वपूर्णमौका गवां दिया है।

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