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राकेश राणा का लेख: राजनीति के योद्धा चौधरी चरणसिंह

चौधरी साहब के प्रयास से उपज के उचित दाम से लेकर, भू-सुधार, चकबंन्दी, भूराजस्व और भूमि-अधिग्रहण तथा जमींदारी उन्मूलन जैसे साहसी और क्रांतिकारी निर्णय हुए।

राकेश राणा का लेख: राजनीति के योद्धा चौधरी चरणसिंह
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चौधरी चरणसिंह जानते थे कि देश की समृद्धि का रास्ता गांव, खेत-खलिहानों से ही निकलेगा। इसलिए जीवन भर यही कोशिश करते रहे कि कैसे किसानों को खुशहाल बनाया जाए। चौ. चरणसिंह को जब-जब सत्ता में रहने का अवसर मिला उन्होनें किसानों और गरीबों के जीवन स्तर को उठाने वाली नीतियों को आगे बढ़ाया। चौधरी साहब के प्रयास से उपज के उचित दाम से लेकर, भू-सुधार, चकबंन्दी, भूराजस्व और भूमि-अधिग्रहण तथा जमींदारी उन्मूलन जैसे साहसी और क्रांतिकारी निर्णय हुए।

23 दिसंबर 1902 को बुलंदशहर के नूरपुर में जन्में चरणसिंह जब आगरा विश्वविद्यालय से कानूनी शिक्षा पूरी कर सन्ा 1928 से गाजियाबाद कोर्ट में वकालत करने और 1929 से ही राष्ट्रीय आन्देलन में सक्रिय हो गए। 1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून तोड़ने का एेलान किया गया तो चौधरी चरण सिंह ने हिण्डन नदी पर नमक बनाया। जिस आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 6 माह की जेल हुई। फिर 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में चौधरी चरण सिंह गिरफ्तार कर लिए गए। उसके बाद 1942 में अगस्त क्रांति के दौरान पुनः चौधरी साहब को गिरफ्तार कर लिया गया और फिर डेढ़ वर्ष की सजा हुई। अपने जेल प्रवास के दौरान ही चौधरी साहब ने जीवन-विद्या से जुड़ी पुस्तक शिष्टाचार लिखी। पहली बार उन्होंने 1937 में उत्तर प्रदेश के छपरौली से विधानसभा का चुनाव जीता। फिर तो 1946, 1952, 1962 और 1967 में छपरौली ने एक-छत्र राज देश के किसानों के दिल में बसकर किया।

स्वतंत्रता के बाद जब चौधरी चरण सिंह को 1951 में उत्तर-प्रदेश सरकार में न्याय एवं सूचना विभाग दिया गया तो उन्होनें कैबिनेट मंत्री के रूप में यह दायित्व संभाला। फिर उसके बाद 1952 में डॉ. सम्पूर्णानंद की कैबिनेट में राजस्व और कृषि विभाग के दायित्व का निर्वहन करने का अवसर मिला। किसानों की किस्मत बदलते हुए चौ. चरणसिंह ने 1 जुलाई 1952 को उत्तर प्रदेश में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर डाला। इसी दिशा में उनका अगला क्रांतिकारी फैसला 1954 का उत्तर-प्रदेश भूमि संरक्षण कानून था। चौधरी साहब किसान परिवार में पैदा ही नहीं हुए थे बल्कि वह स्वभाव से किसान थे। 1960 में जब सीबी गुप्ता मुख्यमंत्री बने उनकी सरकार में चौ. चरणसिंह को गृह एवं कृषि मंत्रालय संभालने का दायित्व मिला तो उन्होंने कई क्रांतिकारी बदलावों का मसौदा पेश किया। राजनीति के जरिए गांव-गरीब के सेवादार के रुप में विभिन्न पदों पर रहते हुए चौधरी चरण सिंह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और देश के पांचवे प्रधानमंत्री। उनका सर्वोंच्च सत्ता पर विराजमान होना देश में खेती-किसानी के सम्मान में राजनीति का किसान को राजतिलक था।

तीन अप्रैल 1967 को पहली बार वे उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। चौधरी साहब को उनकी निर्णायक प्रशासनिक क्षमता की धमक के लिए आज भी जाना जाता है। वर्ष 1967 में पूरे देश में दंगे हुए तब भी प्रदेश में कहीं शोर-शराबा नहीं हो पाया। 17 अप्रैल 1968 को उन्होनें मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया तो मध्यावधि चुनाव हुए। दोबारा 17 फरवरी 1970 को पुनः मुख्यमंत्री बने। उन्हें राजनीति के चौधरी साहब ऐसे ही नहीं कहा जाता है बल्कि अपने सिद्धांतों और मर्यादित व्यवहार के कारण उनकी चौधराहट चलती थी। आपात्ाकाल के बाद जब वर्ष 1977 में चुनाव हुए और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और चौ. साहब गृहमंत्री। उन्होनें एक योद्धा की तरह समाज में बदलाव लाने वाले निर्णयों की झड़ी लगा दी। वह दूर-दृष्टा थे उन्हें मालूम था यह देश कैसा है, इसे कैसे चलाना है। उन्होनें गृहमंत्री बनते ही मंडल आयोग और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की।

1979 में चौधरी साहब को वित्तमंत्री और उप-प्रधानमंत्री का दायित्व मिला तो उन्होंने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक नाबार्ड जैसी परिणामी परिकल्पना को मूर्त रुप दिया। जो आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जीवनदाता की भूमिका में है। 28 जुलाई 1979 को जब चौधरी चरण सिंह समाजवादी दलों, कांग्रेस यू के प्रधानमंत्री बने तो यह किसानी के प्रतिष्ठित होने का सुअवसर था। जो इस वर्ग की राजनीतिक अस्मिता को स्थापित करने में निर्णायक क्षण बना। आज 29 मई को दो महान किसान नेताओं की पुण्यतिथि है विजयसिंह पथिक और चौधरी चरणसिंह। दोनों का जीवन किसान संघर्षों को समर्पित रहा। दोनों ही जनपद बुलन्दशहर के एक ही क्षेत्र में पैदा हुए और जीवन भर गांव, गरीब और किसान-मजदूरों की बेहतरी के लिए संघर्षरत रहे। दोनों धरती पुत्रों को उनकी पुण्यतिथि पर शत्ा-शत्ा नमन।

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